यहां से देखो इस्लाम और मुसलमान विरोधी घृणा

इस्राइल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है। मध्य-पूर्व का संकट इस्राइल और अमरीका की देन है।अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण...

इस्राइल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है। मध्य-पूर्व का संकट इस्राइल और अमरीका की देन है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

एडवर्ड सईद ने ''कवरिंग इस्लाम''(1997) में विस्तार से भूमंडलीय माध्यमों की इस्लाम एवं मुसलमान संबंधी प्रस्तुतियों का विश्लेषण किया है।

सईद का मानना है भूमंडलीय माध्यम ज्यादातर समय इस्लामिक समाज का विवेचन करते समय सिर्फ इस्लाम धर्म पर केन्द्रित कार्यक्रम ही पेश करते हैं। इनमें धर्म और संस्कृति का फ़र्क नजर नहीं आता। भूमंडलीय माध्यमों की प्रस्तुतियों से लगता है कि इस्लामिक समाज में संस्कृति का कहीं पर भी अस्तित्व ही नहीं है। इस्लाम बर्बर धर्म है। इस तरह का दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के बारे में नहीं मिलेगा। ब्रिटेन और अमरीका के बारे में यह नहीं कहा जाता कि ये ईसाई देश हैं। इनके समाज को ईसाई समाज नहीं कहा जाता। जबकि इन दोनों देशों की अधिकांश जनता ईसाई मतानुयायी है।

अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण

भूमंडलीय माध्यम निरंतर यह प्रचार करते रहते हैं कि इस्लाम धर्म, पश्चिम का विरोधी है। ईसाईयत का विरोधी है। अमरीका का विरोधी है। सभी मुसलमान पश्चिम के विचारों से घृणा करते हैं। सच्चाई इसके विपरीत है। मध्य-पूर्व के देशों का अमरीका विरोध बुनियादी तौर पर अमरीका-इस्राइल की विस्तारवादी एवं आतंकवादी मध्य-पूर्व नीति के गर्भ से उपजा है। अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण।

एडवर्ड सईद का मानना है 'इस्लामिक जगत' जैसी कोटि निर्मित नहीं की जा सकती। मध्य-पूर्व के देशों की सार्वभौम राष्ट्र के रूप में पहचान है। प्रत्येक राष्ट्र की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। यहाँ तक कि जातीय, सांस्कृतिक और भाषायी परंपराएं अलग-अलग हैं। अत: सिर्फ इस्लाम का मतानुयायी होने के कारण इन्हें 'इस्लामिक जगत' जैसी किसी कोटि में 'पश्चिमी जगत' की तर्ज पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखें तो पाएंगे कि भूमंडलीय माध्यमों का मध्य-पूर्व एवं मुस्लिम जगत की खबरों की ओर सन् 1960 के बाद ध्यान गया। इसी दौर में अरब-इस्राइल संघर्ष शुरू हुआ। अमरीकी हितों को खतरा पैदा हुआ। तेल उत्पादक देशों के संगठन'ओपेक' ने कवश्व राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरु की। तेल उत्पादक देश अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे वहीं पर दूसरी ओर विश्व स्तर पर तेल संकट पैदा हुआ। ऐसी स्थिति में अमरीका का मध्य-पूर्व में हस्तक्षेप शुरू हुआ।

अमरीकी हस्तक्षेप की वैधता बनाए रखने और मध्य-पूर्व के संकट को 'सतत संकट' के रुप में बनाए रखने के उद्देश्य से भूमंडलीय माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।

मध्य-पूर्व का संकट इस्राइल और अमरीका की देन

यही वह दौर है जब भूमंडलीय माध्यमों से इस्लाम धर्म और मुसलमानों के खिलाफ घृणा भरा प्रचार अभियान शुरु किया गया। माध्यमों से यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि मध्य-पूर्व के संकट के जनक मुसलमान हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मध्य-पूर्व का संकट इस्राइल की विस्तारवादी-आतंकवादी गतिविधियों एवं अमरीका की मध्य-पूर्व नीति का परिणाम है।

सईद ने लिखा है पश्चिमी जगत में इस्लाम के बारे में सही ढंग से बताने वाले नहीं मिलेंगे। अकादमिक एवं माध्यम जगत में इस्लामिक समाज के बारे में बताने वालों का अभाव है।

भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम विरोध की यह पराकाष्ठा है कि जो मुस्लिम राष्ट्र अमरीका समर्थक हैं उन्हें भी ये माध्यम पश्चिमी देशों की जमात में शामिल नहीं करते। यहाँ तक कि ईरान के शाह रजा पहलवी को जो घनघोर कम्युनिस्ट विरोधी था और अमरीकापरस्त था, बुर्जुआ संस्कार एवं जीवन शैली का प्रतीक था, उसे भी पश्चिम ने अपनी जमात में शामिल नहीं किया। इसके विपरीत अरब-इस्राइल विवाद में इस्राइल को हमेशा पश्चिमी जमात का अंग माना गया और अमरीकी दृष्टिकोण व्यक्त करने वाले राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत किया गया।

इस्राइल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है

आमतौर पर इस्राइल के धार्मिक चरित्र को छिपाया गया। जबकि इस्राइल में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें अरब देशों से ज्यादा गहरी हैं। इस्राइल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है।

आमतौर पर लोग यह भूल जाते हैं कि गाजापट्टी के कब्जा किए गए इलाकों में उन्हीं लोगों को बसाया गया जो धार्मिक तौर पर यहूदी कट्टरपंथी हैं।

इन कट्टरपंथियों को अरबों की जमीन पर बसाने का काम इस्राइल की लेबर सरकार ने किया, जिसका तथाकथित 'धर्मनिरपेक्ष' चरित्र था। इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी भूमंडलीय प्रेस यह प्रचार करता रहा कि मध्य-पूर्व में किसी भी देश में जनतंत्र कहीं है तो सिर्फ इस्राइल में है।

मध्य-पूर्व में पश्चिमी देश इस्राइल की सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं। अन्य किसी राष्ट्र की सुरक्षा को लेकर वे चिंतित नहीं हैं। अरब देशों की सुरक्षा या फिलिस्तीनियों की सुरक्षा को लेकर उनमें चिंता का अभाव है। इसके विपरीत फिलिस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को अमरीका ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है।

आज अमरीका ने अरब देशों और फिलिस्तीनियों की सुरक्षा की बजाय इस्राइल की सुरक्षा के सवाल पर आम राय बना ली है। इस इलाके में अमरीका पश्चिम का वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। वे यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि 'ओरिएण्ट' के ऊपर 'पश्चिम' का राज चलेगा।

दूसरा भ्रम यह फैला रहे हैं कि पश्चिम की स्व-निर्मित इमेज सर्वश्रेष्ठ है।

तीसरा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि इस्राइल पश्चिमी मूल्यों का प्रतीक है।

एडवर्ड सईद ने लिखा कि इन तीन भ्रमों के तहत अमरीका का सारा प्रचारतंत्र काम कर रहा है। इन भ्रमों के इर्द-गिर्द राष्ट्रों को गोलबंद किया जा रहा है।

ध्यान रहे माध्यमों में जो प्रस्तुत किया जाता है वह न तो स्वतःस्फूर्त होता है और न पूरी तरह स्वतंत्र होता है और न वह यथार्थ की तात्कालिक उपज होता है। बल्कि वह निर्मित सत्य होता है। यह अनेक रुपों में आता है। उसके वैविध्य को हम रोक नहीं सकते। इसकी प्रस्तुति के कुछ नियम हैं जिनके कारण हमें यह विवेकपूर्ण लगता है। यही वजह है कि वह यथार्थ से ज्यादा सम्प्रेषित करता है। उसकी इमेज माध्यम द्वारा प्रस्तुत सामग्री से निर्मित होती है। वह प्रच्छन्नत: उन नियमों के साथ सहमति बनाता है या उनको संयोजित करता है जो यथार्थ को 'न्यूज' या'स्टोरी' में रुपान्तरित करते हैं। चूँकि माध्यम को सुनिश्चित ऑडिएंस तक पहुँचना होता है,फलत: उसे इकसार शैली में यथार्थ अनुमानों से नियमित किया जाता है।

इकसार छवि हमेशा संकुचित और सतही होती है। इसी कारण जल्दी ग्रहण कर ली जाती है,मुनाफा देने वाली होती है और इसके निर्माण में कम लागत लगती है।

इस तरह की प्रस्तुतियों को वस्तुगत कहना ठीक नहीं होगा। बल्कि ये विशेष राजनीतिक संदर्भ और मंशा के तहत निर्मित की जाती हैं। इसके तहत यह तय किया जाता है कि क्या प्रस्तुत किया जाय और क्या प्रस्तुत न किया जाय।

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