Guru Dutt: A Life in Cinema - कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ..

शायद कभी किसी के बारे में इस कदर नहीं सोचा, जितना गुरुदत्त के बारे में..जैसे शरत चंद का काल्पनिक चरित्र देवदास किवदंती बन गया...

हाइलाइट्स

गीता दत्त की आवाज़ के साथ ही गुरुदत्त की मुस्कान से परिचय क्या हुआ जैसे.. बहुत कुछ मिल गया..बहुत कुछ घट गया..

दोनों कब चले गए पता ही नहीं चला..जब लखनऊ के मेफेयर सिनेमाहॉल में प्यासा देखी तो एक बार में मन नहीं भरा..मॉर्निंग शो था केवल..इंटर की परीक्षा सिर पर सवार..पर सात दिन रोज प्यासा को निहारा..और इंटर में फेल हो गया..

Guru Dutt: A Life in Cinema, Nasreen Munni Kabir

राजीव मित्तल

गुरुदत्त-गीतादत्त...

शायद कभी किसी के बारे में इस कदर नहीं सोचा, जितना गुरुदत्त के बारे में..जैसे शरत चंद का काल्पनिक चरित्र देवदास किवदंती बन गया है तो इसी दुनिया में 44 साल जिये गुरुदत्त कसक का प्रतिरूप बन गए हैं..

पता नहीं उम्र के किस साल..महीने..या दिन.. एक आवाज़ कानों से होती हुई दिल में समा गयी..

..कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ..

गीता दत्त की आवाज़ के साथ ही गुरुदत्त की मुस्कान से परिचय क्या हुआ जैसे.. बहुत कुछ मिल गया..बहुत कुछ घट गया..

दोनों कब चले गए पता ही नहीं चला..जब लखनऊ के मेफेयर सिनेमाहॉल में प्यासा देखी तो एक बार में मन नहीं भरा..मॉर्निंग शो था केवल..इंटर की परीक्षा सिर पर सवार..पर सात दिन रोज प्यासा को निहारा..और इंटर में फेल हो गया..

खनकती गीता को सुनना और गुरुदत्त को देखना..पढ़ना और फिर दोनों को गुनना..शगल बन चुका था..

नसरीन मुन्नी कबीर की क़िताब .. Guru Dutt: A Life in Cinema, Nasreen Munni Kabir का मिलना.. चमत्कार से कम नहीं था..मुम्बई के फ्लैट से कबाड़ी को बेची जा रही क़िताब लखनऊ कैसे पहुंची..छोड़िये..

गुरुदत्त अपनी पहली फिल्म बाज़ी के निर्देशन में जुटे थे..किसी गाने की रिकॉर्डिंग में सचिनदेव बर्मन ने उन्हें गीतारॉय से मिलवाया..1951 की 21 अगस्त को गुरुदत्त ने गीता को पहला ख़त लिखा..एक प्रेम का आगमन..53 में दोनों का विवाह..

कभी inland पर तो कभी अपने मोनोग्राम वाले पैड पर .. और कई बार किसी होटल के पन्नों पर गीतादत्त को और अपने बच्चों को गुरुदत्त ने करीब पैंतीस चिट्ठियां लिखीं..1962 का छब्बीस अक्तूबर..आखिरी ख़त..

दोनों ने अपना अंत तलाश लिया था..इस ख़त को लिख दो साल बाद गुरुदत्त ने जान दे दी..जिसको लिखा.. दस साल बाद शराब ने उसे मार दिया...

...जाँ न कहो अनजान मुझे..जान कहां रहती है सदा..

नसरीन कबीर को गुरु और गीता के छोटे बेटे अरुण ने इतने ही ख़त सौंपे..बड़े संभाल कर रखे गये ये ख़त अरुण को अपनी माँ की अलमारी से मिले थे..अफ़सोस गीता का लिखा एक भी ख़त अरुण को नहीं मिला..

क्या किया जाए..गुरुदत्त की लिखी चिट्ठियां भी किसी अनमोल ख़जाने से कम नहीं..

 

इस क़िताब के लिये शुक्रिया नीतू...

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