महिषासुर से संबंधित मिथक व परंपराओं पर शोधग्रंथ

मिथकों को गैर ऐतिहासिक कहकर कर टाल देने की परम्परा अब लद चुकी है। दलित-बहुजन समाज इतिहास में अपनी उपस्थिति के प्रति पहले की तुलना मे अब काफी सजग हो चुका है...

अतिथि लेखक

पुस्तक समीक्षा

 -इमामुद्दीन

मिथकों को गैर ऐतिहासिक कहकर कर टाल देने की परम्परा अब लद चुकी है। दलित-बहुजन समाज इतिहास में अपनी उपस्थिति के प्रति पहले की तुलना मे अब काफी सजग हो चुका है। भारतीय वैचारिक विमर्शों  के दायरे उसका बढ रहा है।  ‘महिषासुर: मिथक और परम्परायें’ इसी की एक कड़ी है। ज्यादा दिन नहीं हुए  जब महिषासुर के बारे में    जे.एन.यू. में हुए कार्यक्रम का  विरोध  हुआ व इसके बाद होने वाले घटनाक्रमों  (जिसमें फारवर्ड समूह भी शिकार हुआ) की धमक संसद से सड़क तक सुनाई दी। पहली बार लोगों के अन्दर जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर यह मसला क्या है। वर्तमान चुनौतियों को बखूबी समझते हुए फारवर्ड प्रेस समूह की मदद से तरक्कीपसन्द चिन्तकों के श्रमसाध्य लेखों का संग्रह इस किताब में  किया गया है। इनकी प्रमुख मान्यता- भारतीय समाज सांस्कृतिक रूप से गुलामी से मुक्त हुए बिना सामाजिक-आर्थिक बराबरी के लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं कर सकता, उसे संस्कृति पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व के किले को ढहाना ही होगा।

किताब का पहला भाग यात्रा वृतांत है। महिषासुर से जुड़े हुए प्रतीकों, पुरातत्व, अवशेषों, समाज में प्रचिलत मान्यताओं का बारीकी से लेखकों- पत्रकारों द्वारा अध्ययन किया गया है। किताब बताती है कि बुंदेलखंड के महोबा क्षेत्र में लगभग 20-25 वर्ष पूर्व दुर्गा-पूजा का त्यौहार मनाये जाने की परम्परा प्रारम्भ हुई है। इसी प्रकार झारखंड के असुर नामक आदिवासी समुदाय के लोग परंपरागत रूप से दुर्गा-पूजा के उत्सवों में शामिल नहीं होते। महोबा में पुरातत्व विभाग द्वारा महिषासुर स्मारक के साथ ही अनेकों महिषासुर मन्दिर व उनके मानने वाले मिलते हैं। असुर आदिवासी समुदाय की सबसे बड़ी खासियत जाति व पितृसत्ता के बन्धनों से मुक्त होना है। इस जनजाति में औरतों को बराबरी के अधिकार प्रदान किये गये हैं। आज ब्राह्मणवादियों द्वारा इस क्षेत्र को सांस्कृतिक उपनिवेश बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।

पुस्तक का दूसरा भाग ‘मिथक और परम्पराओं’ पर केन्द्रित है। सारगर्भित लेखों में ‘गोंडी पुनेम दर्शन दर्शन और महिषासुर’ एक विस्तृत लेख हैं। इसमें लेखक संजय जोठे ने बताया है कि मिथक और परम्परायें कैसे स्थापित की जाती हैं, भारत में यह कार्य किस प्रकार घटित हुआ है। भारतीय समाज पर नियंत्रित करने की इनकी प्रणाली को चुनौती देने वाले लोकायत दर्शन-बौद्ध-श्रमण आदि परम्पराओं का शोधपरक अध्ययन किया गया है। ‘हमारा महिषासुर दिवस’ में सुषमा असुर महिषासुर के उत्सव के बारे में वृहद जानकारी देते हुए इससे जुड़े पहलुओं को भी रेखांकित करती हैं। ‘दुर्गा सप्तशती का पाठ’ आदिवासियों की उन प्रचिलत कहावतों को दरकिनार कर दुर्गा सप्तशती की कथा को स्थापित करने की ओर इशारा करता है। दो भैंसों द्वारा स्त्री की रक्षा व संताल आदिवासियों का दुरगा सरदार की कहावतें जिन्हें मनुवादियों ने स्वीकार नहीं किया। आदिवासी समाज स्त्री के बारे में जो दृष्टिकोण रखता है, उसके खांचे में ब्राह्मणवादियों की दुर्गा का मिथक मेल नहीं खाता। गौरी लंकेश भी महिषासुर के दावे को मजबूती से स्थापित करती हैं। वे देवताओं को एक छटे दर्जे का कायर बताती हैं। हाल ही में  इनकी हिन्दू कट्टरपंथियों पर बेबाकी से राय रखने के कारण  हत्या कर दी गई। ‘कर्नाटक की बौद्ध परम्परा और महिष’ में महिषासुर को मैसूर का महान शासक बताया गया है। अशोक ने बौद्ध दर्शन पर आधारित कल्याणकारी राज्य की स्थापना का दायित्व महादेव नामक बौद्ध भिक्षु को सौंपा था। ऐसा उसने कर दिखाया, महिष मण्डल राज्य की स्थापना की। आज का मैसूर यही है। 1584 में चामराज वाडियार ने महिषासुर नगर की स्थापना की। डी.एन.झा अपने लेख में हिन्दू धर्मग्रन्थों का हवाला देते हुए हिन्दू देवताओं को अत्यधिक शराब पीने वाला बताते हैं। वैदिक साहित्य, जातक साहित्य, कालिदास व अन्य लेखकों की रचनाओं में शराब पीने के बारे में बार-बार जिक्र आया है। काल भैरव की प्रतिमा पर आज भी शराब चढ़ायी जाती है।

हमारे समाज का दुर्भाग्य कहा जायेगा कि अंबेडकर के विचारों को इतिहासकारों ने समुचित स्थान नहीं दिया, इतिहास के स्रोतों- पुरातत्व व साहित्य के अध्ययन में बहुजन वर्ग के हितों को उपेक्षा की गयी। अब अंबेडकर के सपने साकार करने वाले मजबूत स्थिति में पहुँच चुके हैं। ‘डॉ. अंबेडकर और असुर’ लेख में असुर समाज के बारे में चिन्तन से उनके विलक्षण प्रतिभा का पता चलता है। अंबेडकर के ‘अछूत कौन और कैसे’ पुस्तक का हवाला देते हुए अनार्य, असुर, दास और नागों को द्रविड़ों का पर्याय बताया गया है। नाग और द्रविड़ एक ही जाति के थे। उत्तर भारत से समस्त दक्षिण भारत पर इनका एकछत्र राज्य था।

तीसरा भाग ‘आन्दोलन किसका और किसके लिए’ विषय पर आधारित है। महिषासुर विमर्श की प्रासंगिकता व इस बारे में उठने वाले प्रश्नों का जवाब दिया गया है। भारतीय इतिहास के बारे में वामपन्थी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को खारिज कर जो दृष्टि स्थापित करते हैं, वह द्विज अथवा उच्च वर्ग के साथ खड़ा दिखाई देता है। यही नहीं वे मार्क्स के सिद्धान्तों की अनदेखी करने से भी नहीं चूकते, बल्कि बहुजनवादी दृष्टिकोण ज्यादा वैज्ञानिक व तर्कसंगत दिखाई देता है। सांस्कृतिक वर्चस्व भौतिक साधनों पर वर्चस्व का वैचारिक आधार होता है। इसकी स्वीकृति मार्क्सवाद में भी मिलती है। लेखक पहचान का प्रश्न व अस्मिता की राजनीति पर एक तर्कसंगत व सकारात्मक नजरिया प्रस्तुत करता है। वे नकरात्मक आधार पर होने वाले अस्मिता के नाम पर ब्राह्मणवादियों द्वारा बहुजनों के शोषण व अल्पसंख्यकों की हिंसा की तरफ भी इशारा करते हैं। ‘भारत माता की बगावती बेटियाँ’ में निवेदिता मेनन भारतीय समाज की स्त्री व भारत माता की प्रतीक दुर्गा के बीच विरोधाभास को उजागर करती हैं। महिलाओं के बारे में मनुवादियों के दोयमदर्जे के व्यवहार पर तीखा कटाक्ष किया है। नूर जहीर अपने लेख में दलित मुस्लिमों की बात करती हैं। भारतीय समाज का क्रूर चेहरा जितना दलितों पर कहर ढाता है उतना ही दलित मुस्लिमों पर भी। हिन्दुओं के प्रमुख त्यौहारों में इनके जुड़ाव को रेखांकित किया गया है।

चौथा भाग ‘संस्कृति व समकाल’ है। असुर समाज का जीवन, उत्सव, लोकगीत, लोकसाहित्य के बारे में व्यापक रूप से प्रकाश डाला गया है। ‘शापित असुर: शोषण का राजनैतिक अर्थशास्त्र’ में असुरों की समाजिक और आर्थिक दृष्टि से अध्ययन किया गया है। खनन के नाम पर इनके क्षेत्र का दोहन किया जा रहा है। भारतीय हुक्मरानों द्वारा इनके श्रम की लूट ऐसी है कि ब्रिटिश हुक्मरान भी शर्मिन्दा हो जाये। स्त्रियों की हालत तो और भी खराब है। एक स्त्री की कहानी इसमें दी गयी है, जो शहर में रहकर आयी है, कैसे आदिवासी औरतों के साथ क्रूरता से पेश आया जाता है। नौजवानों की हालत इससे कम बुरी नहीं है।

ज्योतिबा फुले, संभाजी भगत, छज्जूलाल, कंवल भारती, रमणिका गुप्ता, विनोद कुमार व संजीव चन्दन की असुर समाज समाज से जुड़े रचनाओं- प्रार्थना, गीत, रागिणी, कवितायें व नाटक हैं।

हालांकि पुस्तक में कई बातों का दुहराव भी हुआ है, लेकिन इसके बावजूद भी यह पुस्तक किसी शोधग्रन्थ व कोश से कम नहीं है।

किताब : महिषासुर मिथक व परंपराएं (लेख-संग्रह)

संपादक : प्रमोद रंजन
पृष्ठ संख्या : पृ.360

मूल्य : 350 रुपए (पेपर बैक), 250 रुपए (किंडल)
पुस्तक सीरिज : फारवर्ड प्रेस बुक्स, नई दिल्ली

प्रकाशक व डिस्ट्रीब्यूटर : द मार्जिनलाइज्ड, वर्धा/दिल्ली, मो : +919968527911 (वीपीपी की सुविधा उपलब्ध)

किंडल :  https://www.amazon.in/dp/B077XZ863F

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