स्त्री-संघर्ष का नया सौन्दर्यशास्त्र रचती कविताएँ

सरला जी की कविताओं में कुंठित और निराश औरतें नहीं हैं, ये एक खास बात है। संघर्षशीलता कुंठा को खत्म करती है। ...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

सरला जी की कविताओं में कुंठित और निराश औरतें नहीं हैं, ये एक खास बात है। संघर्षशीलता कुंठा को खत्म करती है। इस संग्रह में शामिल कविताओं में जो औरतें आई हैं, उनका संघर्ष कई स्तरों पर चलता है। भले ही उनका जीवन दुख और अंधकार से भरा हुआ है, पर संघर्षों से उन्हें रोशनी मिलती है और वे आगे कदम बढ़ाने को तैयार दिखती हैं। वे व्यवस्था को चुनौती देती हैं, यद्यपि उनकी ताकत कम है, पर हर तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी वे जीत के प्रति आशान्वित रहती हैं। ये आशा कैसी है, ये हुलास कैसा है, यह ‘आओ मनाए जश्न जिंदगी की जीत का’ कविता में देखा जा सकता है।

 

स्त्री के संघर्षशील जीवन की कविताएँ हैं सरला माहेश्वरी की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा

मनोज कुमार झा

‘आओ आज हम गले लग जाएँ’ सरला माहेश्वरी का चौथा कविता-संग्रह है। इसके पहले ‘आसमान के घर की खुली खिड़कियाँ’, ‘तुम्हें सोने नहीं देगी’ और ‘लिखने दो’ संग्रह काफी चर्चित रहे हैं।

सरला माहेश्वरी की कविताएँ हिन्दी की परम्परागत प्रगतिशील-जनवादी कविता से अन्तर्वस्तु और शिल्प के स्तर पर काफी अलग किस्म की हैं। गत दशकों में प्रगतिशील और जनवादी कविता पर एक तरह के रूपवाद, कलावाद और नये कलेवर में छायावादी भाव-बोध का जो प्रभाव बना रहा है, जिसे सरला जी की कविताएँ तोड़ती नज़र आती हैं।

हिन्दी की प्रगतिशील कविता में चंद कवियों को छोड़ दें तो ज्यादातर कवि सुविधाभोगी रहे और विश्वविद्यालयीय आलोचकों को आशीर्वाद से आगे बढ़ने के साथ पुरस्कृत भी होते रहे। जबकि सच्चाई ये है कि उनकी कविताएँ पाठकों से दूर रहीं। ऐसी कविताएँ कवियों से कवियों के बीच और तथाकथित आलोचकों के बीच ही घूमती रहीं। वैसे सच्चे जनधर्मी कवियों की भी कोई कमी नहीं रही, पर प्राय:  वे उपेक्षित ही रहे। आलोचना की पुस्तकों में उनके नाम नहीं आए, न ही उन्हें कोई पुरस्कार मिला, पर जन से उनका सीधा जुड़ाव बना रहा। इस रूप में उनका महत्त्व उन कवियों से कहीं ज़्यादा रहा जो आलोचकों के प्रिय रहे हैं, क्योंकि आम जन उनकी कविताओं में रस लेता है और उनसे अपने को सीधा जुड़ा पाता है। ऐसे कवियों ने कविता को निम्न मध्यवर्गीय जकड़न से निकालने का काम किया है। जनता से सीधे जुड़े होने के कारण उनके पास स्पष्ट दृष्टि है और उनकी भाषा भी पूरी तरह जनाभिमुख है।

सरला जी की कविताएँ ऐसी ही कविताएँ हैं। उनकी कविताएँ जन से संवाद स्थापित करने वाली हैं, सत्ताधारियों से सीधे सवाल पूछने वाली हैं, उन्हें खुली चुनौती देने वाली हैं और उनमें जनता को सजग करने के साथ ही वर्ग-चेतना से लैस करने की ताकत भी है।

सरला जी की कविताएँ बहुत ही ठोस सवालों से जूझने वाली ज़मीन से जुड़ी कविताएँ हैं। इस संग्रह की ख़ासियत ये है कि इसमें सिर्फ स्त्री विषयक कविताओं का संकलन किया गया है। हिन्दी में स्त्री विषयक कविताओं को लेकर अजीब ही स्थिति दिखाई पड़ती है। ऐसे कवियों और कवयित्रियों की कोई कमी नहीं जो स्त्री पर लिखने का मतलब यौन पर लिखना समझते हैं। ये नारीवादी कवयित्रियाँ कई बार प्रेम आदि विषयों पर लिखते हुए जुगुप्सा की हद तक स्त्री के गोपनीय अंगों और यौन क्रियाओं का चित्रण करने लगती हैं। इसे वे क्रान्तिकारिता और बोल्डनेस मानती हैं, पर उनकी कविताओं में कभी भी श्रमशील स्त्रियों के जीवन का चित्रण नहीं होता। स्त्रियों के जीवन के दुख, उनके संघर्ष, उनके जीवन में छाई रिक्तता और सामाजिक परिवेश में उनकी जीवंत भूमिका कभी सामने नहीं आ पाती, बल्कि वे एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में ही सामने आती हैं और उनकी मुक्ति का मुख्य स्वर ये होता है कि उन्हें यौन आजादी हासिल हो। इसमें एक ऐसा अतिरेक होता है, जो उनकी भाषा को भी दूषित कर देता है। पर विश्वविद्यालयों में जमे हुए मठाधीश आलोचकों ने स्त्री-मुक्ति के नाम पर लिखी जा रही ऐसी कविताओं को मान्यता दे रखी है। इस तरह का लेखन करने वाली कवयित्रियों की संख्या अच्छी-खासी है जो महानगरों में रहती हैं और प्राय: उच्च वर्ग से आती हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता से पूरी तरह दूर सिर्फ़ यौन कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाली ऐसी कविताएँ पुरस्कृत भी होती हैं और प्रगतिशील भी मानी जाती हैं।

बहरहाल, हमारा उद्देश्य इनकी चर्चा करना नहीं, सिर्फ़ इस कुप्रवृत्ति की तरफ़ इशारा भर करना है।

जहाँ तक सरला माहेश्वरी की स्त्री विषयक कविताओं का सवाल है, ये कविताएँ स्त्री के संघर्षशील जीवन की कविताएँ हैं। इन कविताओं में जो स्त्रियाँ आती हैं, वे अलग-अलग वर्ग और समुदाय की हैं। उनमें इरोम शर्मिला है तो सेवैया की औरतें भी हैं, लेसली उडविन है तो बिलखती बुढ़िया माँ भी है। बलात्कार पीड़िता औरते हैं जो जज को चुनौती देती हैं, वहीं ‘अनारकली ऑफ आरा’ भी है जो किसी न किसी रूप में प्रतिरोध को स्वर देती है।

सरला जी के इस संग्रह में जहाँ ‘एक अकेली औरत का होना’ क्या मायने रखता है, ये बताया गया है, वहीं ‘आदमी और हैवान’ का फ़र्क भी बताया गया है।

 सरला जी के इस संग्रह में जहाँ  स्त्री ‘अकेली जलती हुई मशाल’ के रूप में है तो वह ‘अपने बचपन’ में भी है। इसमें औरतों की ‘बर्बादी की कहानी’ है तो यह दर्द भी है कि ‘कोई हमें सताए क्यों’। स्त्री जीवन के इतने विविध रंग हैं कि यहाँ सबका उल्लेख कर पाना संभव नहीं, पर कहा जा सकता है कि यह संग्रह हिन्दी कविता की एक उपलब्धि है। इससे खासकर उन कवि-कवयित्रियों को सीख मिल सकती है कि स्त्री विषयक कविता का सही जनवादी रूप क्या है। नारीवाद जो संघर्षों से विमुख हो और सेक्स की मुक्ति में ही स्त्री की मुक्ति को देखता है, एक पतनशील विचारधारा है। सरला जी ने जिन औरतों का जो रूप सामने रखा है, वह कुछ इस प्रकार है –

चिता की तरह

सज गयी औरतें

लकड़ी की तरह

जल गयी औरतें

मंदिर की मूर्ति

बन गयी औरतें

 

जिंदगी की चौसर पर

बाज़ी की तरह लगती

औरतें

बाजार सी सजती

और बिकती औरतें

 

मान-अभिमान, अविश्वासों की

अग्नि-परीक्षाओं से

गुज़रती औरतें

शापों-अभिशापों का

ज़हर पीती

पत्थर बन गयी औरतें

....................................

ज्वालामुखी सी

धधक रही औरतें

मुक्ति का औज़ार

बन रही औरतें

अवरोधों को

तोड़ रही औरतें

गर्म लावा बन

बह रही औरतें

ये है सरला जी की कविताओं में आई औरतों का असली चेहरा और चरित्र। सरला जी की कविताओं में कुंठित और निराश औरतें नहीं हैं, ये एक खास बात है। संघर्षशीलता कुंठा को खत्म करती है। इस संग्रह में शामिल कविताओं में जो औरतें आई हैं, उनका संघर्ष कई स्तरों पर चलता है। भले ही उनका जीवन दुख और अंधकार से भरा हुआ है, पर संघर्षों से उन्हें रोशनी मिलती है और वे आगे कदम बढ़ाने को तैयार दिखती हैं। वे व्यवस्था को चुनौती देती हैं, यद्यपि उनकी ताकत कम है, पर हर तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी वे जीत के प्रति आशान्वित रहती हैं। ये आशा कैसी है, ये हुलास कैसा है, यह ‘आओ मनाए जश्न जिंदगी की जीत का’ कविता में देखा जा सकता है। ‘आओ आज हम गले लग जाएँ’ इस संग्रह की प्रतिनिधि कविता है और वह उस संघर्ष की कविता है जो हर उत्पीड़ित स्त्री का संघर्ष है।

इस संग्रह के बारे में सुशील कुमार ने सच ही लिखा है – “जिन पाठकों ने इनकी कविताओं को ठीक से पढ़ा है, उनको मालूम होगा कि सरला की कविताएँ पाठकों से सीधे संवाद करती हैं, कला की सीमाओं के पार भी जाकर संवाद करती हैं और मन के अंदर एक उत्प्रेरणा को जन्म देती हैं। यह एक आर्टलेस आर्ट की बानगी है। उनकी कहन के शिल्प और उनके अंदाजेबयाँ ने उनके कवि-मन को स्त्री-विमर्श की उन कवयित्रियों से अलग किया है जो स्त्रीवाद का एक विशेष घेरा रचती हो और अपने सृजन को उसी का परिधि में कैद कर लेती हो!” सरला जी की कविताओं के बारे में वीणा भाटिया लिखती हैं – “इनकी कविताओं की खासियत है कि साहित्य का कोई ज्ञान नहीं रखने वाला पाठक भी जब उन्हें पढ़ना शुरू करता है, तो पढ़ता ही चला जाता है। विषय और भाव से उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है। उसे लगता है कि यह तो उसकी ही बात कही जा रही है, कविताएँ पढ़ते हुए समाज-व्यवस्था और राजनीति का छल-छद्म उसके सामने खुलता चला जाता है।“ सरला माहेश्वरी के इस संग्रह में शामिल कविताओं का कथ्य इतना ठोस है, इतना वास्तविक और जीवंत है कि उन्हें शिल्प के नाम पर रंग-रोगन और पच्चीकारी की कोई ज़रूरत नहीं। कविता शब्द-दर-शब्द अपने संपूर्ण अर्थों के साथ खुलती जाती है और पाठक के साथ उसका सामान्यीकरण सहज हो जाता है।

सरला जी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता रही हैं। राजनीति से उनका सीधा जुड़ाव रहा है, पर कविता को वह एक ‘बेचैन आत्मा की शरण-स्थली’ मानती हैं। वे लिखती हैं, “स्वतंत्र स्त्री के छोटे से छोटे रूप के साथ अपनी संवेदना के तारों को जोड़ने में कविता की यह विधा मेरे लिए जितनी सहयोगी और आश्वस्तिकारक बनी है, उसका बयान नहीं कर सकती। कहा जा सकता है कि सरला जी की ये कविताएँ एक नया सौन्दर्यशास्त्र रच रही हैं और यह भी तय कर रही हैं कि कविता का भविष्य श्रमशील-संघर्षशील स्त्रियों के हाथों ही सुरक्षित रहेगा।

 

आओ आज हम गले लग जाएँ – सरला माहेश्वरी

प्रकाशक – सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर 2-017

मूल्य – 250 रुपए

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