कविताओं में लोक की गाथा - जनपद झूठ नहीं बोलता

जहां आदिवासी है, वहां शोषण जरूर होगा। वहां वे कॉरपोरेट भी होंगे जो संसाधनों के दोहन के लिए तत्पर होंगे...

      - स्वप्निल श्रीवास्तव

इधर सुशील कुमार की ख्याति एक आक्रामक समीक्षक के रूप में बन रही है। वे आलोचना के गढ़ और मठ में प्रवेश कर उसकी संरचना पर अपनी असहमति दर्ज कर रहे हैं। वस्तुत: आलोचना का इलाका सहमति और असहमति का केंद्र है। जो आलोचना को सहमति का शास्त्र मानते हैं, उन्हें आलोचना से कुछ नहीं हासिल होगा। बस, वे आलोचकों के भक्त और चारण बन कर रह जाएंगे। वैसे भी शीर्ष आलोचकों को कोई चुनौती नहीं देना चाहता। इसके लिए साहस की जरूरत होगी। जब तक आलोचना में वाद-विवाद-संवाद नहीं होगा, आलोचना में यथास्थिति बनी रहेगी। आलोचना का विकास नहीं होगा। जरूरी यह भी है कि ऐसे समीक्षकों को ठीक से होमवर्क करना चाहिए, अन्यथा उनकी गलती पकड़ी जाएगी।

सुशील कुमार समीक्षक के साथ कवि भी हैं। उनका यह कवि रूप समीक्षक से एकदम भिन्न है और इस पर ताज्जुब होता है। यह भाव उनके कविता संग्रह ‘जनपद झूठ नही बोलता’ के बाद सहज ही होता है। वे अपनी आलोचना में जितने आक्रामक हैं, अपनी कविता में उतने ही तरल हैं।

उनके इस संग्रह में जनपद के दुख-सुख के साथ आदिम समाज का संघर्ष और शोषण है। जहां आदिवासी है, वहां शोषण जरूर होगा। वहां वे कॉरपोरेट भी होंगे जो संसाधनों के दोहन के लिए तत्पर होंगे

इस संग्रह को पढ़ते हुए त्रिलोचन का कविता संग्रह ‘उस जनपद का कवि हूं’ की याद आना स्वभाविक है। इस संग्रह में अवध क्षेत्र का इलाका है। वहां की संस्कृति है। त्रिलोचन के जीवन और समाज के दुख हैं। लेकिन सुशील कुमार का इलाका उससे ज्यादा बीहड़ है। वहां दुख और दैन्य ज्यादा है।

सुशील कुमार की कविताओं में अनेक विवरण करुण प्रसंग की तरह आते हैं। चूंकि वे उसी इलाके के नागरिक हैं, इसलिए उनके शब्द वास्तविक लगते हैं।

सुशील कुमार की कविताओं में गहरी स्थानीयता है। लोकजीवन के बिम्ब और मुहावरे हैं। ये मुहावरे कवि के बनाये हुए नहीं हैं। उनका अपना लोक और समाज हैं। उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है।

झारखंड हो या छत्तीसगढ़, दोनों इलाके इस समय धधक रहे हैं

जनपद झूठ नही बोलता ( कविता संग्रह ) कवि - सुशील कुमार  प्रकाशक - हिंद–युग्म     1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली – 110016मुहावरों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। वे जब कविता में आते हैं, उनकी अर्थवत्ता बढ़ जाती है। इस संग्रह में बिम्बों और मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया गया है। सुशील कुमार इस कला में दक्ष हैं। उनकी कविताएं पढ़ते हुए हम झारखंड के उस दुर्गम क्षेत्र में पहुंच जाते हैं, जहां कविता कम पहुंच पाती है। झारखंड हो या छत्तीसगढ़, दोनों इलाके इस समय धधक रहे हैं। पूंजीपतियों को पनाह देने और संसाधनों की लूट के लिए सरकार कृतसंकल्प है। ये क्षेत्र खनिजों के लिए विख्यात है। इस कार्य के लिए सैकड़ों गांव उजाड़े जा रहे हैं। लोगों को विस्थापित किया जा रहा है। इन मजलूमों के दुख में माओवादी शरीक हो रहे हैं। सरकारी दमन चल रहा है। माओवादियों की हिंसा जारी है। लेकिन जानबूझकर सरकार वास्तविक कारणों के तह में नहीं जा रही है।

सुशील कुमार की कविताएं पढ़ते हुए हमें ऐसे तमाम स्थल मिलेंगे जो वहां हो रहे शोषण का पता देंगे। उनकी कविताओं में पहाड़, नदी, पेड़ और दियारे के कई दृश्य दिखाई देंगे। लेकिन उनकी कविताओं में ये दृश्य मोहक नहीं दिखेंगे, बल्कि उनके विनाश के मंजर नजर आएंगे। आादिवासियों की दुर्दांत गरीबी में सरकार ही नहीं, महाजन भी है।

पर बेबस पहाड़िया

निकल पड़ता है मांझी – थान में खायी हुई कसमें तोड़

हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में

भोजन-भात कर, गिदरा गिदरी को सोता छोड़

पहाड़न से झगड़ कर

महाजन के साथ बीहड़ जंगल ( पहाड़िया )

यह कविता हमारे सामने एक आख्यान की तरह आती है और पहाड़ के इलाके में हो रहे शोषण को उजागर करती है। पहाड़ी जीवन भले ही देखने में खूबसूरत लगे, लेकिन उसके पीछे गहरी यंत्रणा है। इस कविता में उस जीवन के शब्द हैं। उनके बिना कविता मुकम्मल नहीं हो सकती।

नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं, जीवन-रेखा हैं

स्वप्निल श्रीवास्तव आदिवासी जीवन की कल्पना नदी, पहाड़, पेड़ के बगैर नहीं की जा सकती है। यह उनके जीने मरने का हिस्सा है। सुशील कुमार की कविता में नदियां खूब आती हैं। नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं, जीवन-रेखा हैं। नदियां जहां आदिवासियों को बचाती हैं, वहीं उन्हें विस्थापित भी करती हैं। हिंदी में नदियों पर ज्यादा कविताएं नहीं लिखी गई हैं। मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘कुआनो नदी’ की याद आ जाती है। वह नदी पर अब तक लिखी गई सबसे लम्बी कविता है। हिंदी कविता निरंतर प्रकृति से दूर होती गयी है। उसका स्थान नागर कविताओं ने ले लिया है। छायावादी कवियों के यहां खूब नदियां आती थीं। प्रसाद हों या पंत या निराला, उनके यहां नदियों की उपस्थिति थी। लेकिन जब से हमारा जीवन कठिन होना शुरू हो गया, नदियां हमारे भीतर सूखती चली गईं।

सुशील कुमार की नदियां भूगोल की मशहूर नदियां नहीं हैं, लेकिन उनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। वे एक ऐसी नदी – बांसलोय का वर्णन अपनी कविता ‘बांसलोय में बहत्तर ऋतु’ में करते हैं। यह नदी पाकुड़ और दुमका को विभक्त करती है। इस कविता में नदी का आदि सौंदर्य देखें ‌-

 एक रजस्वला नदी हो तुम

 नाम तुम्हारा बांसलोय है

 बांस के झाड़ – जंगलों से निकली हो

 रेत ही रेत है तुम्हारे गर्भ में

 काईदार शैलों से सजी हो

 तुम्हारे उरोज पर

 रितु किलकती है केवल

 बरसात में

पहाड़ी नदियों का सौंदर्य आम नदियों से अलग होता है। वे जंगलों के बीच से बहती है और लोकजीवन को जीवंत बनाती है। इन नदियों का जीवन सुरक्षित नहीं है। वहां खनन माफिया पहुंच चुके हैं और उनका दोहन कर रहे हैं। हमारे इतिहास की नदियां लुप्त हो चुकी हैं। यह पर्यावरण का भयानक संकट है। कविता के अंत की पक्तियां देखें –

मुझे दुख है

अपनी छाया में फली फूली

आदिम सभ्यता के मनोहर चित्र

रेत के ववंडरों से पाटती हुई

लोककथाओ में तुम स्वयं एक दिन

किवदंती बन कर दर्ज हो जाओगी

इसी क्रम में उनकी कविता ‘कोसी शोक में डूबी एक नदी का नाम है’ को पढ़ कर यह जाना जा सकता है कि नदियां हमारे जीवन में बाढ़ भी लाती हैं। कोसी नदी एक कुख्यात नदी है, उसमें बाढ़ प्रलय की तरह आते हैं, बाढ़ विस्थापन का कारण बनते है। दुनियां में ऐसी कई नदियां हैं जो देखने में सुंदर लगती हैं, लेकिन बाढ़ के समय वे मनोहारी नहीं रह जाती हैं।

नदियों पर लिखी उनकी कविताएं पढ़ने के बाद उनकी कविता दियारा का पाठ दिलचस्पहोगा। बाढ़ के बाद जो दियारा पैदा होता है, वह बहुत भयावह है। दियारा का सन्नाटा रात में अत्यंत घना हो जाता है। कवि कहता है – मौसम के सिवा यहां कुछ भी खुशगवार नहीं / रेत होती दियारावासियों की जिंदगी में खुशियां कम गम ज्यादा हैं।

 एक दृश्य देखें –

 लोग घर-बार छोड़ भागने लगते हैं

 लील जाती है कई बार हहाराती गंगा

 पूरा का पूरा दियारा

 बह जाती है कई जानें – माल मवेशी

किसानों के संजोये सपने भी (दियारा में रेत होती जिंदगी)

इस संग्रह में संकलित ‘असम से लौटकर हरिया सोरेन’ मेरी मनपसंद कविता है। यह कविता असम में रोजी-रोटी के लिए गए एक आदमी की ट्रैजिडी है। यह कविता नहीं आख्यान है, जिसमें असम के उपद्रवियों द्वारा सताये गये झारखंड के लोगों की व्यथा का वर्णन है। इस कथा में हरिया सोरेन अकेला नहीं है। उसके दिल में कई लोगों के दर्द हैं, जिसे हरिया बांसुरी की तान में भुलाता रहता है। कहा जाता है कि संगीत दुख का अचूक इलाज है। इस कविता में धनकटनी के दृश्य हैं, लेकिन इसमें हरिया सोरेन सम्मिलित नहीं है। किसी सामूहिक उत्सव में हरिया का न रहना चिंतित करता है। हरिया कहां है? बांसुरी और मांदल बजानेवाला हरिया क्यों चुप है? इसका उत्तर इस कविता में मौजूद है।

इस बार हरिया चुप चुप रहता है

न कहीं आता जाता है

न गीत रचता है परब के

नीमिया के नीचे दिनभर दालान में

महुआ के मद में ओघराया

कभी जमीन टकटोरता तो

कभी आकाश निहारता

इस कविता को पढ़ते हुए जब हम अंतिम पक्तियों में पहुंचते है तो हरिया की तकलीफ हमारे सामने आती है।

उसकी ललछौह आंखों से ढरक आते हैं आंसू

उसके स्याह होठ तक और पठार सी

उसकी काया थरथराने लगती है

उसकी संतानें सुखमुनी, बिटिया और पत्नी सुगिया भी

उसके साथ सिसकने लगते है।

सुशील कुमार की कविता में आदिम राग है जो कई रूप में प्रकट होता है। किसी कवि की कविता उसके विजन के कारण महत्वपूर्ण होती है, अन्यथा वह एक शब्दपुंज बनके रह जाती है। उनकी कविता में आदिवासी समाज के अनेक दृश्य हैं और दृश्यों के पीछे यातना के स्थल भी हैं।

इस संग्रह से गुजरते हुए, कब लौटेगी सुगनी, यहां कभी बसंत नही आता, मां, हृदय का पक्षी, बीज, महुआ फूलने के मौसम में जैसी कविताओं पर हमारा ध्यान जाता है। ये कविताएं कवि की संवेदना और दृष्टि को समझने का अवसर देती है। कब लौटेगी सुगनी गांव कविता में सुगनी शहराती अजनबी के साथ दिल्ली चली जाती है। इस तरह की घटना वहां के समाज के लिए नई नहीं है। प्राय: इस तरह की घटनाओं के बारे में हम अखबारों में पढ़ते रहते हैं। लोभ और लालच से वशीभूत होकर औरतें चली जाती हैं। वहां उनके साथ कई स्तरों पर शोषण होता है। आदिवासी समाज की प्रचंड गरीबी के सामने कोई नैतिक मूल्य नहीं रह जाते। भूख नैतिकता से बड़ी हो जाती है। सुगनी जैसी औरतों के जाने से समाज में जो खला पैदा हो जाती है, उसका स्वाद बहुत करुण है।

इस कविता का अंश देखिए।

पूरा पहाड़, नदी, झरना, ताल तलैया

यानी कि तराई पर का पूरा गांव ही

उजाड़ सा दिखता है तुम बिन

सब के सब तुम्हारे लौटने की

बाट जोह रहे हैं कब से

सुशील कुमार की कविताओं में प्रेम के कई स्थल हैं, जिसमें कवि की सघन सम्वेदना प्रकट होती है। ऐसी एक कविता है - मै सच हूं तुम्हारी। इस कविता में ऐन्द्रिक सम्वेदना है – एक खास तरह की मांसलता है। तुमने छुआ मुझे / और मैं नदी बन गई / तुमने छुआ मुझे / और मैं सागर बन गयी / तुमने छुआ मुझे / और मैं सितार की तरह / बजने लगी।

प्राय: हिंदी कवियों में मां और पिता पर कविताएं लिखने का चलन है। अधिकांश कविताएं फैशन के तहत लिखी गई हैं। सुशील कुमार की मां पर लिखी कविता भिन्नहै। इस कविता में परदेस कमाने गया बेटा अपनी मां के साथ बिताए गए वक्त को याद करता है। उसे ब्रेड और सॉस की जगह मां के हाथ का बथुआ–मेथी का साग और सोंधी लिट्टी, आलू-बैंगन का भुरता, आम की चटनी और मच्छी रोटी की याद आती है।

इस संग्रह में कवि ने लोकजीवन से लोकचेतना का सफर तय किया है। इस संग्रह में प्रकृति के मोहक रूप ही नहीं, उसके हिंसक रूप भी दिखाई देते हैं। सुशील कुमार की कविताएं हमें बताती हैं कि किस तरह आदिवासी इलाके में संगठित रूप से शोषण का तंत्र काम कर रहा है और जिस व्यवस्था को उनकी बेहतरी के लिए काम करना चाहिए, वह शोषण की मुख्य भूमिका में है। सुशील कुमार का यह कविता संकलन पाठकों को निश्चित रूप से पसंद आएगा। उनकी कविताओं में जीवन और समाज की गाथा है। इसलिए कहानी पढ़ने का सुख सहज मिल जाता है। एक तरह से उनकी कविताएं जनपदीय इतिहास को वास्तविक ढंग से सामने लाती हैं। उनकी कविता में स्थानीय शब्द आते हैं जो कविता को विश्वसनीय बनाते हैं।

जनपद झूठ नही बोलता ( कविता संग्रह )

कवि - सुशील कुमार

प्रकाशक - हिंद–युग्म

    1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली – 110016

     मूल्य- 250 रुपए

समीक्षक- स्वप्निल श्रीवास्तव

 

 

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