नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द

उग्रपंथियों का संघर्ष वैसे लोगों का संघर्ष है, जो शहरी जीवन से बेहद दूर पर्वतीय इलाके में सरकारी तंत्र और शोषण का अनाचार सहते रहे हैं।...

अतिथि लेखक

नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द

- कृष्ण किसलय

आधुनिक हिंदी कहानी की यात्रा 20वीं सदी के आरंभ के साथ ही हुआ। बीते करीब सवा सौ सालों में हिंदी कहानी ने आदर्शवाद, यथार्थवाद, प्रगतिवाद, मनोविश्लेषणवाद आंचलिकता आदि धाराओं के दौर से गुजरते हुए अपनी सुदीर्घ यात्रा की है, अनेक उपलब्धियां हासिल की है और विश्व कहानी के स्तर पर भी पूरे दम-खम के साथ खड़ी हुई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी (इंदुमती, 1900 ई) को हिन्दी की पहली कहानी माना है। हालांकि किशोरीलाल गोस्वामी की ही लिखी कहानी (प्रणयनी परिणय, 1897) भी कथावस्तु और शिल्प की दृष्टि से हिन्दी की पहली मौलिक कहानी कही जा सकती है, मगर इस पर कथासरित्सागर के प्रभाव, इसकी पारंपरिक कथा शैली और भरतवाक्य से इस कहानी के समापन के कारण इसे कहानी का दर्जा देने के मामले में हिन्दी आलोचकों में मतैक्य नहींरहा है। यह दो प्रेमियों की कहानी है, जिसमें प्रेमी प्रेमिका के घर में प्रवेश कर रहा था कि राजा द्वारा चोर समझ कर पकड़ा गया और उनके प्रगाढ़ प्रेम को देखकर राजा ने दोनों का विवाह करा दिया।

1916 में प्रेमचंद की पहली कहानी (सौत) प्रकाशित हुई

प्रेमचंद के आगमन से हिन्दी कहानी समाज सापेक्ष सत्य की ओर मुड़ी। 1916 में प्रेमचंद की पहली कहानी (सौत) और आखिरी कहानी (कफन) 1936 में प्रकाशित हुई थी। हिन्दी कहानी के लिए वह कालखंड आदर्श और यथार्थ के द्वन्द्व का था। देश के आजाद होने के बाद हिन्दी कहानी विस्तृत दौर खत्म होता है और 1950 के बाद हिन्दी कहानी परिपक्वता के दौर में प्रवेश करती है। युग परिवर्तन के साथ हिन्दी कहानी की प्रवृत्तियों का बदलना स्वाभाविक ही है। हिन्दी कहानियों में प्रसन्नता, अवसाद, विरोधी के स्वर बढ़ते गए और 20वींसदी खत्म होते-होते राष्ट्रीय आकांक्षाओं से पूरी तरह मोहभंग हो चुका था।

नई 21वींसदी में तो सामाजिक जीवन ज्यादा जटिल, ज्यादा यांत्रिक हो गया और आदमी की आइडेन्टिटी (पहचान) कहीं गुम हो गई। आधुनिकता ने व्यक्तिगत जीवन में ऊब, घुटन व व्यर्थता की खामोश रिक्तता भर दी और सामाजिक जीवन में असंतोष, आक्रोश, संघर्ष, टकराव, हिंसा का उफनता साम्राज्य बना दिया। इसी दौर में राष्ट्र-समाज में नक्सलपंथ, उग्रपंथ और आतंकपंथ परवान चढ़ता है। जाहिर है, कहानी में अपने देश-काल की इस परिस्थिति को अभिव्यक्ति मिली। चिंतरंजनलाल भारती का कहानी संग्रह (पूर्वोत्तर का दर्द) इसी अभिव्यक्ति का समुच्य है। इस संग्रह में 11 कहानियां 1. पूर्वोत्तर का दर्द, 2. घर की ओर, 3.पेंडुलम, 4. लौट आओ, 5. मत्स्य न्याय, 6. आत्मसमर्पण, 7. फिर भी भय, 8. पोस्टर, 9. अंत, 10. नींव का पत्थरस और 11. विजिटिंग कार्ड संग्रहित हैं। हालांकि सभी कहानियां एक ही विषय विस्थापन और अलगाववाद की पीड़ा और त्रासदी पर केंद्रित हैं, मगर इनकी भाव-भूमि अलग-अलग है। सदियों से भारत-भूमि की मुख्यधारा से अलग-थलग, पर केंद्रीय सांस्कृतिक धारा से जुड़े रहे पूर्वोत्तर प्रांत असम ने अब शेष भारत के साथ बेहद संवाद और सामंजस्य कायम कर लिया है। इस बात को भी इस कहानी संग्रह में सकारात्मक तरीके से घर-परिवार-समाज की कथा को अभिव्यक्त किया गया है।

पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक धमनियों में सदियों से भक्ति का रस प्रवाहित करने वाले भक्त कवि शंकरदेव हिन्दी पट्टी के रससिद्ध चितेरे सूरदास के समकालीन थे। बीती सदी में असम के सामाजिक जीवन में भूपेन हजारिका ने राष्ट्रीय सुर-स्वर का संचार किया तो नई 21वींसदी में देबजीत साहा, जुबिन गर्ग आदि ने इस स्वर को और ऊंचाई-गहराई प्रदान की।

एक सशक्त संपर्क भाषा के रूप में है आज असम में हिन्दी की उपस्थिति

इस कहानी संग्रह (पूर्वोत्तर के दर्द) की भूमिका में असम की सामाजिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए चितरंजनलाल भारती ने लिखा है कि आज असम में हिन्दी की उपस्थिति एक सशक्त संपर्क भाषा के रूप में है, जो जीवन के विविध क्षेत्रों में इस पूर्वोत्तर प्रांत की सफलता का कारण भी है। इस कहानीसंग्रह की भूमिका में हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत ने लिखा है कि चितरंजनलाल भारती के कहानी-लेखन में जीवन का अनुभव उत्तरोत्तर समृद्ध और परिपक्व हुआ है।  

कहानीकार चितरंजनलाल भारती अपनी भाषा से पृथक और अपनी जमीन अर्थात बिहार के डालमियानगर (रोहतास जिला) से बहुत दूर प्रांत देश के पूर्वोत्तर प्रांत असम में गैर हिन्दी भाषियों के बीच रहकर अहिन्दी भाषी कार्मिकों के लिए भारत सरकार द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अंतर्गत हिन्दी शिक्षण का कार्य करते हैं। कहानी के अलावा साहित्य की अन्य विधाओं (कविता, व्यंग्य, उपन्यास) में भी कलम चलाने वाले श्री भारती तीन दशक से भी अधिक समय से कथा लेखन में सक्रिय हैं और हिन्दी कहानी के क्षेत्र में देश के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। इनका पहला कहानी संग्रह (किस मोड़ तक) 1987 में और दूसरा कहानी संग्रह (अब और नहीं) 2001 में प्रकाशित हुआ था। तीन कहानी संग्रहों के अलावा 1993 में इनका लघुकथा संग्रह (आम जनता के लिए) और 2004 में उपन्यास (नई यात्रा) प्रकाशित हुआ था।

सामाजिक चेतना है इन कहानियों में

Poorvottar ka dardबहरहाल, कहानीकार के जीवन-यापन के लिए सुदूर असम में रहने से उनकी कहानियों में जो परिवेश निर्मित हुआ है, समाज का जो हृदय धड़क रहा है, समय का जो नब्ज स्पंदित हो रहा है, वह हिन्दी पाठकों के लिए निश्चिय ही किसी नए लोक के अनुभव से गुजरने जैसा है। इन कहानियों में सामाजिक चेतना है, निष्ठुर पर्वतीय परिवेश है, अस्मिता का सवाल है, जिजीविषा है।

शांति और अहिंसा के साथ भारत के संविधान से भी भरोसा खो देने वाले दशकों से संघर्षरत नक्सलपंथ, उग्रपंथ के परिवेश से गुजरती इन कहानियों में कथा-चरित्रों के साथ सहानुभूति का बीज-तत्व भी मौजूद हैं।

दरअसल, उग्रपंथियों का संघर्ष वैसे लोगों का संघर्ष है, जो शहरी जीवन से बेहद दूर पर्वतीय इलाके में सरकारी तंत्र और शोषण का अनाचार सहते रहे हैं।

हिन्दी पट्टी से अलग लंबे समय से सुदूर प्रवास करने के कारण पूर्वोत्तर के समाज से लेखक का जो अंतरंग रिश्ता बना है, देखने-समझने का जो व्यापक नजरिया तैयार हुआ है, वह इस कहानीसंग्रह के, इस कहानीकार (चितरंजनलाल भारती) के कथ्यांकन-शिल्पांकन की सफलता है।

- कृष्ण किसलय, समूह संपादक,

सोनमाटी (पाक्षिक), सोनमाटीडाटकाम (न्यूजपोर्टल)

पुस्तक परिचय

पूर्वोत्तर का दर्द (कहानी संग्रह)

लेखक : चितरंजनलाल भारती

प्रकाशक : यशराज पब्लिकेशन, पटना

कीमत : 300 रुपये

समीक्षक : कृष्ण किसलय (वरिष्ठ संपादक एवं कथाकार)

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