............... मुल्क को ईदी कौन देगा ......???....

अतिथि लेखक

इस मुल्क की राजनीति की नींव ही सांप्रदायिकता पर टिकी हुई है

संजीव मजदूरझा

कहते हैं कि नयी व्यवस्था में शोषण के तरीके भी नए होते हैं और यह शोषण भी किसी काला-जादू से कम नहीं, फिर चाहे वह राज्य द्वारा किया जा रहा हो अथवा पूंजीपतियों द्वारा.

जितनी ख़तरनाक बात है चालाकी से हमारा शोषण किया जाना उससे अधिक खतरनाक बात है हम लोगों का चालाक होना.

यह चालाक होना ही राजनैतिक जीत है, जिसने हमें बहुत ही सलीके से एक-दूसरे के प्रति चालाक बना दिया है.

यह चालाकी प्रथमतः और अंततः हमारे ही विरोध में और सत्ता के पक्ष में होता है और इस बात से बेख़बर हम चालाकी किये जाते हैं. नहीं तो यह संभव ही नहीं कि अनगिनत सांप्रदायिक दंगों की लपटों में बैठा यह देश एक दूसरे को मुबारक देने में मशगूल होता.

कहने को कहा जा सकता है कि आखिर ऐसा क्यूँ नहीं किया जा सकता है?

लोग नफ़रत भूलकर क्या फिर से सामान्य जिन्दगी नहीं जी सकते हैं? बिलकुल ऐसा किया जा सकता है लेकिन यह तब संभव होता है जब लगातार समस्याएं ना हों, अथवा समस्यायों का कोई निदान निकल चुका हो.

जिस तरह से राजनीति की जीवंतता को बरकरार रखने के लिए सांप्रदायिकता एक जरूरी हथियार बन गया है ठीक उसी तरह से हिन्दू-मुस्लिम भेद-भाव, राष्ट्रवाद, जातिवाद आदि मसले भी सामाजिक-समरसता का दुश्मन बना हुआ है.

किसी समस्या पर परदा डालने से यह तो तय नहीं किया जा सकता कि समस्या ख़त्म हो गयी है. हम जिस समाज में जी रहे रहे हैं वहाँ का दुर्भाग्य यह है कि कभी भी यह ख़बर आ सकती है कि किसी अखलाक की बर्बरता-पूर्ण तरीके से हत्या की जा चुकी है, या किसी नए मुजफ्फरनगर और नए गोधरा में हिन्दू और मुसलमानों ने एक-दूसरे के चीथड़े उड़ा दिए.

ऐसे माहौल में हम किस जश्न को जायज ठहरा रहे हैं?

क्या यहाँ ठहरकर सोचने की जरूरत नहीं है या हम यह मान लें कि जो भी हो रहा है हमें उसे स्वीकार कर लेने की जरूरत है.

ऐसा नहीं है कि दुनियाँ भर में धर्म के विरोध पर नहीं लिखा गया या राज्य का किस तरह का हस्तक्षेप हो, इस पर बात नहीं की गयी, लेकिन जिन्होंने की उनसे नफ़रत की गयी. कभी हमने यह पलट कर सोचने तक की जहमत नहीं उठाई कि जो लोग धर्म को अलग रूप से देखने की कोशिश कर रहे हैं उनकी दृष्टि के केंद्र में आखिर क्या है?

आश्चर्य की बात है कि ऐसे महान विभूतियों से नफ़रत सिर्फ उन्हीं लोगों ने नहीं किया जो धर्म के ठेकेदार हैं बल्कि उन लोगों ने भी किया जिन्होंने समय-समय पर अपने परिवार को दंगों में खोया है.

जिस अल्लाह या राम अथवा स्वर्ग या नर्क के जाल में हमें उलझाकर सियासी खेल खेला जाता है उस खेल को क्या पलटकर हमने यह देखने की कोशिश की कि हमारे समाज से बड़ा नर्क तो कुछ हो ही नहीं सकता.

आश्चर्य से कम नहीं कि जिस समाज में कभी भी किसी की हत्या धर्म के नाम पर की जा सकती है, भारत-माता की जय कहते हुए किसी भी स्त्री का बालात्कार किया जा सकता है, अलग धर्म के होने के कारण जिन्दा जलाया जा सकता है उस समाज में भी नर्क का भय कायम है.

इसी भय-भावना पर प्रेमचंद ने कहा था कि—

“ यह भय-भावना आज तक हमारे दिलों पर हावी है. यह उसी भावना का प्रताप है कि हमें नरक का भय दिखाकर आज करोड़ों पाखण्ड हमें उल्लू बना रहे हैं.”

कहने की आवश्यकता नहीं कि हमने धार्मिक मसलों में प्रश्न खड़ा करना कब का बंद कर दिया है. वर्तमान स्थिति से यह तो स्पष्ट है कि हमारे बीच इस खौफ़नाक सांप्रदायिकता को ख़त्म करना हमारी राजनीति के बूते की बात नहीं है क्योंकि इस मुल्क की राजनीति की नीव ही सांप्रदायिकता पर टिकी हुई है.

ऐसे में इस रोग से मुक्त होने के लिए हमें अपने ही समाज में लौटना होगा. लेकिन जब हम अपने समाज में लौटते हैं तो हम पाते हैं कि हम सभी चालाक और दुमुहें चरित्र के हो चुके हैं. बेधड़क हम होली और ईद पर मुबारकबाद का लेन देन करने में मशगूल हैं.

और इस लेन-देन में हमने कभी इसपर विचार ही नहीं किया कि जो नफ़रत लेकर हम नकली भाईचारा निभाने का नाटक कर रहे हैं यह नाटकीयता हमारे ही समाज के लिए एक दिन अभिशाप बनेगा.

मुसलमानों के ईद पर हिन्दुओं का मुबारकबाद देना और हिन्दुओं की होली पर मुसलमानों का, देखने-सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन एक हिन्दू और मुसलमान होते हुए तो एक दूसरे की ज़िन्दगी तो मुबारक नहीं हो सकती. और यदि एक दूसरे की ज़िन्दगी मुबारक हो इससे इन्हें कोई मतलब नहीं तो फिर यह बधाई हो, मुबारक हो इसका फ़र्जी विज्ञापन क्यों?

क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि बधाई देने वाले अधिकांश लोग इस बात को कहने से तनिक भी नहीं हिचकिचाते कि ‘जो भी कहिये मुसलमान कट्टर तो होते ही हैं, आतंक से इनका रिश्ता हिन्दुओं से ज्यादा खतरनाक होता है’. इस तरह की मानसिकता को पाले यदि हमारा समाज एक साथ उत्सव मनाने की तयारी में है तो यह कहने में कोई हिचक नहीं कि इन उत्सवों में कब सांप्रदायिक चिंगारी भड़केगी कुछ कहा नहीं जा सकता. इसलिए यह तो संभव ही नहीं है कि एक हिन्दू बनकर आप मुसलमानों के हित की सोचें और एक मुस्लिम होते हुए आप हिन्दुओं की सोचें. इसके लिए हमें साहस के साथ उस आइडेंटिटी से बहार आना होगा जिसका इस्तेमाल सिर्फ सत्ता के गलियारों में किया जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में ऐसे उदहारण नहीं हैं. ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ मुसलमान और हिन्दू एक साथ अपने खेतों में काम करते हैं, हिन्दू अपने गेहूं के आंटे के बदले पड़ोस के मुस्लिम घर से मक्के का आंटा बदलता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारी तरह वे अपने धार्मिक पहचान में लिपटकर अपनी जिन्दगी नहीं जी रहे होते हैं.

अफ़सोस की बात है कि हम बुद्धिजीवियों से जितना खाद-पानी भ्रष्ट राजनीति को  मिलता है उसका एक अंश भी ये किसान-मजदूर इस सांप्रदायिकता को बढ़ाने में खर्च नहीं करते हैं. इसलिए ये भी सुरक्षित हैं और इनके पड़ोसी भी लेकिन अपनी चालाकियों के कारण न हम सुरक्षित हैं और न ही हमारे पड़ोसी. आज सारा मुल्क ईद मना रहा है लेकिन मुल्क को ईदी कौन देगा?

क्या हिन्दू अपने मुसलमान भाइयों को ईदी के रूप में यह सुरक्षा देने को तैयार है कि जब भी कोई भीड़ उसकी हत्या के लिए प्रायोजित होगी वह  सिर्फ उस भीड़ का हिस्सा ही नहीं होगा बल्कि उस प्रायोजित भीड़ के प्रायोजकों का डटकर विरोध भी करेगा.

अगर हाँ तो यह इस मुल्क के लिए सबसे जरूरी ईदी साबित होगा और यदि नही तो मुबारकबाद कहने या साथ सेवई खाने की चालाकी भर से कुछ नहीं होगा.

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