‘ये सफ़र था कि मुक़ाम था’ के बहाने राजेन्द्र यादव पर एक चर्चा

जनवाद के नाम पर गलत प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने वाले और सुविधाभोग व आडम्बर से भरा जीवन जीने वाले राजेन्द्र यादव को लोग साहित्य के अंडरवर्ल्ड का डॉन कहने लगे थे...

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हाइलाइट्स

मैत्रेयी का लेखन अश्लीलता की हद तक चला जाता है और जुगुप्साकारी है। पर हिन्दी में ऐसे नामवालों की बहुत पूछ होती है। गत वर्ष उनकी एक और किताब राजेन्द्र यादव से संबंधित आई - 'ये सफ़र था कि मुक़ाम था'। जो भी हो, उस पुस्तक की चर्चा इसलिए हो रही है कि कथित रूप से उन्होंने उसमें मन्नू भंडारी के संबंध में लिखा है जो आपत्तिजनक कहा जा रहा है। पर मैत्रेयी पुष्पा को यह नहीं भूलना चाहिए कि मन्नू भंडारी बहुत ही श्रेष्ठ लेखिका हैं और वो किसी भी जन्म में उनके घुटनों तक भी नहीं पहुंच सकतीं। 

मनोज कुमार झा

हिन्दी में राजेन्द्र यादव अपने प्रेम-प्रसंगों और यौन लोलुपता के लिए कुख्यात रहे। मीता के साथ उनके प्रेम-प्रसंगों की चर्चा काफी हुई है, पर वो कौन थी, इसके बारे में ज़्यादा पता नहीं चलता। मन्नू भंडारी जो उनकी पत्नी होने के साथ श्रेष्ठ लेखिका रहीं, उनका मानसिक उत्पीड़न उन्होंने किया। जब राजेन्द्र यादव ने 'हंस' के प्रकाशन का अधिकार अमृत राय से लेकर उसका फिर से प्रकाशन शुरू किया तो दलित विमर्श के साथ कथित नारी विमर्श की शुरुआत की जो दरअसल कुंठित सेक्स विमर्श था। प्रेमचंद द्वारा सम्पादित हंस में उन्होंने चुन-चुन कर ऐसी लेखिकाओं को छापना शुरू किया जो नारी-मुक्ति के नाम पर खुल कर यौन प्रसंगों के बारे में लिखती थीं। उनकी निगाह में दुनिया की सारी समस्या बस यौन की समस्या ही होकर रह गई। ऐसे कामुक उच्छृंखलतावाद को उन्होंने प्रश्रय दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि नारी-मुक्ति का मतलब हो गया उन्मुक्त सेक्स और खुला भोगवाद।

कई लेखिकाओं को पाल-पोस कर मंच देने के बाद उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा को एक लेखिका के रूप में प्रोजेक्ट किया जिससे उनके संबंध बहुचर्चित रहे। स्वयं मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा 'कस्तूरी कुण्डल बसै' और 'गुड़िया भीतर गुड़िया' में उन प्रंसगों की चर्चा की है। 

मैत्रेयी का लेखन अश्लीलता की हद तक चला जाता है और जुगुप्साकारी है। पर हिन्दी में ऐसे नामवालों की बहुत पूछ होती है। गत वर्ष उनकी एक और किताब राजेन्द्र यादव से संबंधित आई - 'ये सफ़र था कि मुक़ाम था'। जो भी हो, उस पुस्तक की चर्चा इसलिए हो रही है कि कथित रूप से उन्होंने उसमें मन्नू भंडारी के संबंध में लिखा है जो आपत्तिजनक कहा जा रहा है। पर मैत्रेयी पुष्पा को यह नहीं भूलना चाहिए कि मन्नू भंडारी बहुत ही श्रेष्ठ लेखिका हैं और वो किसी भी जन्म में उनके घुटनों तक भी नहीं पहुंच सकतीं। 

मन्नू भंडारी का लेखन सामाजिक यथार्थ को सामने लाने वाला है और मैत्रेयी का लेखन यौन कुंठा से भरा है। 

बहरहाल, मैत्रेयी पुष्पा को यह नहीं भूलना चाहिए कि राजेन्द्र यादव का नाम एक बहुत ही कम उम्र की लड़की ज्योति कुमारी के साथ भी उछला जिसका एमएमएस तक उनके घर पर उनके सहायक ने बना लिया था और उसे ब्लैकमेल कर रहा था। ज्योति कुमारी के प्रतिवाद पर पुलिस में भी यह मामला गया। 

मैत्रेयी पुष्पा अब वृद्ध हो गई हैं। सवाल ये है कि ऐसे लेखन के माध्यम से वे कैसा आदर्श सामने रख रही हैं। 

मैत्रेयी पुष्पा सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ी लेखिका हैं। वे दिल्ली हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष हैं। केजरीवाल उन पर मेहरबान हैं। सत्ता की मलाई ऐसे ही नहीं मिलती। जो भी हो, विद्वत समाज को इस पर विचार करना चाहिए कि इस तरह की लेखिकाओं ने साहित्य को किस घटिया दर्जे तक पहुंचा दिया है। सॉफ्ट पोर्न साहित्य नहीं है। साहित्य की अपनी मर्यादा है। इस मर्यादा की रक्षा ज़रूरी है।

जहां तक राजेन्द्र यादव के साहित्यिक अवदान का सवाल है, वे नई कहानी के प्रवर्तक कथाकारों में माने जाते हैं, पर कुछ चुनिंदा कहानियों को छोड़ कर इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धि कुछ खास नहीं रही। हां, उन्होंने कुछ बेहतर अनुवाद अवश्य किए। उन्होंने यश या अपयश जो कहें, हंस के संपादक के तौर पर ही कमाया। हंस में लिखे जाने वाले सम्पादकीय लेखों के लिए वे ख़ासे चर्चित रहे। हंस के पुनर्प्रकाशन का अधिकार उन्होंने अमृत राय से लिया, पर कुछ ही समय में उन्होंने हंस की मर्यादा को धूलि-धुसरित कर दिया। उन्होंने हंस में खुले सेक्स का चित्रण करने वाली कहानियों का प्रकाशन शुरू किया। यद्यपि अच्छी रचनाएं भी प्रकाशित हुईं, पर नारी-विमर्श के नाम पर सेक्स केंद्रित कहानियां काफी प्रकाशित हुईं। गीताश्री जैसी लेखिकाओं को इन्होंने पहली बार हंस में छापा, जिनके लेखन में खुलकर सेक्स का चित्रण होता है। यही नहीं, सन् 2004 में इन्होंने आत्मस्वीकृतियां नाम से स्तंभ का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें रामशरण जोशी जैसे प्रख्यात पत्रकार का एक धारावाहिक लेख छापा। इस लेख में रामशरण जोशी ने साफ शब्दों में अपने यौन जीवन का खुला चित्रण किया और लिखा कि कैसे बस्तर में बहुत ही कम पैसे में आदिवासी युवतियां उपलब्ध हो जाती थीं और वे उनके साथ सेक्स करते थे। उन्होंने यहां तक लिखा था कि एक बार जब उनके एक समाजशास्त्री प्रोफेसर मित्र जब बस्तर में आए तो उन्होंने दो युवतियां मंगवाई, पर प्रोफेसर मित्र ने कहा कि एक से ही दोनों का काम चल जाएगा, तब दूसरी औरत गिड़गिड़ाने लगी कि साहब, हमें भी रहने दो। दोनों को साथ रखो।

रामशरण जोशी ने हंस में यह भी लिखा कि कैसे उन्होंने एक बार एक ऐसी आदिवासी युवती को पैसे देकर उसके साथ सेक्स किया जो सद्य प्रसूता थी।

सवाल है कि इस तरह के लेखन को प्रोत्साहित कर वे किस उद्देश्य की पूर्ति करना चाहते थे। यह उनकी कैसी प्रगतिशीलता थी?

इस सीरीज में दो-तीन लेख प्रकाशित होते ही उसका भारी विरोध शुरू हुआ, तब जाकर राजेन्द्र यादव को यह स्तम्भ बंद करना पड़ा। पर उनकी प्रवृत्ति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

हंस के प्रकाशन के लिए वे सेठाश्रित रहे। इसमें कोई आलोचना की बात नहीं। सेठों के आश्रय में ही हिन्दी का जनवादी और प्रगतिशील साहित्य अब तक पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर हद तो तब हो गई जब उन्होंने पप्पू यादव जैसे अपराधी और राजनीतिज्ञ से पचासों लाख रुपए लेकर हंस के 28वें समारोह का आयोजन किया।

राजेन्द्र यादव ने माफ़िया पप्पू यादव से पैसे ही नहीं लिए, बल्कि उसकी किताब ‘द्रोहकाल का पथिक’ का विमोचन भी करवाया।

राजेंद्र यादव ने ही अपनी टीम के ज़रिए पप्पू यादव की आत्मकथा का संपादन भी कराया था। यही नहीं, राजेन्द्र यादव ने पप्पू यादव की तुलना फ्रांस के कुख्यात अपराधी हेनरी शैरर की जिसने 1969 में ‘पैपिलॉन’ नाम की किताब लिखी थी। हंस समारोह में पप्पू यादव बड़े-बड़े साहित्यकारों के साथ मंच पर बैठा। राजेन्द्र यादव ने उसे भविष्य का बड़ा लेखक और दबे-कुचलों का प्रतिनिधि बताया। जाहिर है, उनके चंद समर्थकों को छोड़ कर काफी साहित्यकारों ने राजेन्द्र यादव की इस काम का विरोध किया। पर राजेन्द्र यादव अपने को जनवादी साहित्यकार मानते रहे, जबकि साहित्य से जुड़े बहुत से लोग उन्हें साहित्य के अंडरवर्ल्ड का डॉन कहने लगे थे। सुनने में आता है कि राजेन्द्र यादव को यह पंसद भी था कि उन्हें साहित्य के अंडरवर्ल्ड का डॉन कहा जाए। इस तरह, जनवाद के नाम पर गलत प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने वाले और सुविधाभोग व आडम्बर से भरा जीवन जीने वाले राजेन्द्र यादव जीवन के अंत काल में कथित ज्योति कुमारी प्रकरण में भी बदनाम हुए।

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