लेखक-कवि की माली हालत हमेशा ही बहुत खराब रही, पर प्रकाशक मालामाल होते रहे

अंग्रेजी में लिखने वाला मालामाल है जबकि अंग्रेजी पाठक कितने हैं पता लगाना चाहिए। अंग्रेजी का बाज़ार इतना मुनाफ़े वाला कैसे है? अंग्रेजी में दो कौड़ी का लेखन करने वालों के आगे हिन्दी के लेखक नहीं टिकते...

लेखक-कवि की माली हालत हमेशा ही बहुत खराब रही, पर प्रकाशक मालामाल होते रहे

हिन्दी में प्रकाशन की दशा : बड़े प्रकाशकों पर विश्वविद्यालयों के बड़े माफ़िया हावी हो गए

       - मनोज कुमार झा

आज हिन्दी में प्रकाशन की स्थिति बहुत ही चिन्ताजनक है। आज से 20-25 साल पहले प्रकाशक किसी किताब की कम से कम 1000 प्रति प्रकाशित करते थे। हिन्दी समाज की बड़ी आबादी को देखते हुए इसे बहुत ही कम कह सकते हैं। सवाल है, प्रकाशक मुनाफ़ा कैसे कमाते थे? लेखक तो कभी लेखन से आय की उम्मीद ही नहीं करता। प्रकाशन हो जाए, इतना ही काफी है। जो भी मसिजीवी लेखक-कवि हुए, उनकी माली हालत हमेशा ही बहुत खराब रही। इनमें प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन आदि आते हैं। इन्हें भी जीविकोपार्जन के लिए कई तरह के काम करने पड़े। पर प्रकाशक मालामाल होते रहे। इसकी वजह ये है कि उन्होंने किताबों की कीमत बहुत ज्यादा रखनी शुरू कर दी और सरकारी बिक्री करने लगे। सामान्य पाठक उनकी दृष्टि से ओझल ही रहे। लेकिन एक समय था जब राजकमल जैसे प्रकाशकों ने पाठकों के लिए भी योजनाएँ चलाई थीं। हिन्द पॉकेट बुक्स जैसे प्रकाशकों की भी अच्छी योजनाएँ थीं। पर बाद में उनकी ये योजनाएँ कारगर नहीं हो सकीं, क्योंकि इनमें उन्हें ज्यादा मुनाफ़ा नहीं हुआ।

दूसरे, बड़े प्रकाशकों पर विश्वविद्यालयों के बड़े माफ़िया हावी हो गए। जो विश्वविद्यालय में पढ़ाता है, उसे लेखन से आमदनी की क्या ज़रूरत। वह तो प्रकाशकों से भी पैसे लेने लगा और पुरस्कार कमेटियों में निर्णायक बन कर पुरस्कार माफिया भी बन गया। ऐसे लोग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभागों में नियुक्ति माफ़िया भी बन गए। इन लोगों ने जनवादी कवियों-लेखकों को उभर कर सामने आने ही नहीं दिया। ये जातिवादी, सामन्ती और साम्प्रदायिक तत्व थे। पर प्रगतिशीलता के आवरण में छुपे रहे। इन्होंने हर तरह की पत्र-पत्रिकाओं पर कब्ज़ा कर लिया। अपने चेलों को आगे बढ़ाया जो प्रतिभाहीन थे। उनकी किताबें कौन पढ़ता।

लेकिन दूसरी भाषाओं, उदाहरण के लिए बाँग्ला में यह स्थिति नहीं रही। शरतचंद्र से लेकर विमल मित्र जैसे लेखक मसिजीवी थे और बहुत ही शान से जीवन-यापन किया सिर्फ़ लेखन के बलबूते। इसकी वजह है कि उन्होंने लोकप्रिय रचानएँ लिखीं, न कि भारीभरकम पोथे लिखे जिनके पढ़ने में किसी की रुचि नहीं थी। सवाल है कि बाँग्ला में लेखकों को पाठक कैसे मिले। जो लोग हिन्दी प्रदेशों की ग़रीबी की बात करते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि बंगाल कोई अमीर राज्य नहीं रहा है।

फ़िर अंग्रेज़ी की बात लें। आज अंग्रेजी में लिखने वाला लेखक मालामाल है। जबकि अंग्रेजी पाठक कितने हैं, यह पता लगाना चाहिए। अंग्रेजी लेखन का बाज़ार इतना मुनाफ़े वाला कैसे है? अंग्रेजी में दो कौड़ी का लेखन करने वालों के आगे भी हिन्दी के लेखक नहीं टिकते और हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। आज अरुन्धति जैसी लेखिका लंदन में होटल बुक कर उपन्यास लिखती है और उसका प्रचार करती है और हिन्दी के लेखक उसके आगे-पीछे घूमने के लिए लालायित रहते हैं, पर वह किसी को भाव नहीं देती। क्या कारण है इसके पीछे?

यह सोचना ज़रूरी है कि क्यों आज हिन्दी की स्थिति ऐसी हो गई है कि प्रकाशक किसी किताब की महज 300 प्रति ही छापने लगे हैं और कुछ तो 150 प्रति पर उतर आए हैं। इससे ज्यादा संख्या तो एक लेखक-कवि के मित्रों की रहती है, जिन्हें वह अपनी किताब उपहार स्वरूप भेजता है।

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