किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं

सिर्फ महाजन, सूदखोर और दूसरे सामाजिक तत्व ही नहीं, भारतीय बैंकिग प्रणाली भी इस महाजनी सभ्यता के नये अवतार हैं।...

हाइलाइट्स

आजादी के बाद भूमि सुधार आंशिक रुप से बंगाल में वाम शासन के तहत लागू होने के अलावा बाकी देश में इसे लागू करने की कोई गंभीर कोशिश पिछले सात दशकों में नहीं हुई

पलाश विश्वास

वर्धा विश्वविद्यालय के शोध छात्र मजदूर झा का संदेश आया था कि वे लोग सारस नाम की एक पत्रिका निकाल रहे हैं, जिसके पहले अंक को किसानों की मौजूदा हालत पर केंद्रित किया जा रहा है। हिंदी साहित्य में हाल में जनपदों और किसानों पर क्या लिखा गया है, मुझे इसकी खास जानकारी नहीं है।

प्रेमचंद की परंपरा में साठ और सत्तर के दशक तक जो साहित्य लिखा जाता रहा है, वह गौरवशाली भारतीय साहित्य संस्कृति की परंपरा तमाम तरह की रंग बिरंगी महानगरीय उत्तर आधुनिक छतरियों में इस तरह छुपी हुई है कि मुझे जैसे नाकारा अज्ञानी व्यक्ति के लिए उन्हें देख पाना मुश्किल है। हिंदी साहित्य के प्रेमियों को शायद यह दिख रहा होगा।

माफ करें, मुझे किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं है। इसलिए ऐसे महानगरीय उपभोक्तावादी साहित्य संस्कृति, माध्यम विधा और उनसे जुडे पाखंडी मौकापरस्त तिकड़मी रथी महारथियों और उनकी गतिविधियों में मुझ जैसे अछूत शरणार्थी किसान की कोई दिलचस्पी नहीं है।

मुद्दे की बात यह है कि भारतीय साहित्य में हाल में दिवंगत बांग्ला साहित्यकार महाश्वेता देवी के अवसान के बाद किसानों के संघर्ष और भारतीय कृषि के अभूतपूर्व संकट के बारे में जानने के लिए हमें पी साईनाथ जैसे पत्रकार की रपट पर निर्भर होना पड़ा रहा है।

बाकी भारतीय कृषि अभी प्रेमचंद की भाषा में मुक्त बाजार की ट्रिलियन डालर डिजिटल अर्थव्यवस्था में महाजनी व्यवस्था से उबर नहीं सकी है। महाजनी सभ्यता की सामंती मनुस्मृति व्यवस्था ही भारतीय कृषि संकट का आधार है।

अभी अभी भारत में नृतात्विक अध्ययन के जनक और झारखंड के आदिवासियों के उत्थान के लिए समर्पित नृतत्व वैज्ञानिक और समाजशास्त्री दिवंगत शरत चंद्र राय के 1936 में छोटा नागपुर के आदिवासियों के हालात पर लिखे एक दस्तावेज का अनुवाद करने का मौका मिला है। यह अनुवाद बहुत जल्द आपके हाथों में होगा और उसका कोई अंश मैं इसलिए शेयर नहीं कर पा रहा हूं।

पुणे करार के तहत आदिवासियों को अलग थलग करके जल जंगल जमीन से बेदखली के लिए गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट के तहत आदिवासियों के नरसंहार का जो अबाध अभियान शुरु हुआ और आदिवासियों को बाकी जन समुदायों से अलग करके राष्ट्र के उनके खिलाफ जारी युद्ध और राजनीतिक संरक्षणके वर्चस्ववाद को समझने के लिए यह दस्तावेज बहुत जरूरी है।

शरत चंद्र राय ने आदिवासियों को अल्पसंख्यक का दर्जा देते हुए विरासत में हासिल उनके जल जगंल जमीन के हक हकूक के संरक्षण के लिए उनके अलगाव का बहुत जबरदस्त विरोध आदिवासी नेताओं के सुर में सुर मिलाकर किया था और आदिवासी किसानों के हित में दूसरी तमाम बातों के अलावा सबसे ज्यादा जोर सूदखोरी रोकने के लिए किया था। जिसपर जाहिर है कि ब्रिटिश हुकूमत ने अमल नहीं किया था।

आजादी के बाद भूमि सुधार आंशिक रुप से बंगाल में वाम शासन के तहत लागू होने के अलावा बाकी देश में इसे लागू करने की कोई गंभीर कोशिश पिछले सात दशकों में नहीं हुई और भारतीय कृषि संकट के संकट का एक बड़ा कारण यह भी है कि खेत जोतने वाले किसानों और खेतिहर मजदूरों को पूरे देश में कहीं उनके हकहकूक मिले ही नहीं है। दूसरी ओर भूमिधारी किसानों की जमीन लगातार बेदखल होती जा रही है।

किसानों और खेतिहर मजदूरों की खुदकशी की सबसे बड़ी वजह उन पर कर्ज के बोझ बढ़ते जाना है। साठ के दशक से हरित क्रांति की वजह से खेती की लागत बेलगाम तरीके से बढ़ते चले जाने और पैदावार और श्रम की कीमत न मिलने के साथ साथ मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में बाजार के शिकंजे में देहात और जनपदों के बुरी तरह फंस जाने के नतीजतन बुनियादी जरुरतों और सेवाओं को खरीदने के लिए बेहिसाब क्रयशक्ति के अभाव और उपभोक्ता संस्कृति के मुताबिक अनुत्पादक खर्च बढ़ते जाने से महाजनी सभ्यता का उत्तर आधुनिक कायाकल्प हो गया है।

सिर्फ महाजन, सूदखोर और दूसरे सामाजिक तत्व ही नहीं, भारतीय बैंकिग प्रणाली भी इस महाजनी सभ्यता के नये अवतार हैं।

वैसे ज्यादातर छोटे किसानों के पास जमीन इतनी कम है कि बैंकों से वे कर्ज नहीं लेते और आज भी साहूकारों, महाजनों और बाजार से बहुत ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेते हैं। बैंकों से भी उन्हें कोई राहत मिलती नहीं है।

 

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