मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं

मुक्तिबोध की कविताओं में आत्म संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। वे सच्चे अर्थों में किसानों मजदूरों से जुड़कर कविताएं लिखते थे।...

हाइलाइट्स

मुक्तिबोध का साहित्य हमेशा पाठकों के लिए चुनौती रहा है

मुक्तिबोध पर जलेस दुर्ग का आयोजन

Muktibodh birth centenary celebrations

 दुर्ग। मुक्तिबोध जन्म शताब्दी समारोह जनवादी लेखक संघ दुर्ग जिला द्वारा आयोजित मुक्तिबोध जन्मशती समारोह संगोष्ठी में मुक्तिबोध की कविता कहानी और आलोचना पर समग्र बातचीत की गई।

आलोचक सियाराम शर्मा ने मुक्तिबोध की कविता पर अपने वक्तव्य में कहा कि मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं। वह अपनी कविताओं में यथार्थ को टुकड़ों में न बाँट कर उसे विस्तार देते थे इसलिए उनकी ज्यादातर कविताएं लंबी हैं। उन्होंने निराला के बाद मुक्तिबोध को युग कवि माना और कहा कि निराला के बाद मुक्तिबोध ने भी असफलता का वरण किया क्योंकि उन्होंने समझौते नहीं किये। अपने समय के सबसे हाहाकारी बिम्ब मुक्तिओध कि ही कविताओं में मिलते हैं। मुक्तिबोध की कविता पर अपने आधार वक्तव्य में कवि रजत कृष्ण ने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं में आत्म संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। वे सच्चे अर्थों में किसानों मजदूरों से जुड़कर कविताएं लिखते थे। जिस पूंजीवादी संकट को मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में व्यक्त किया था आज वह संकट विकराल होकर हमारे सामने उपस्थित है।

 मुक्तिबोध की कहानी पर कवि कथाकार बसंत त्रिपाठी ने कहा कि मुक्तिबोध की कहानियों में वर्गीय बोध बेहद स्पष्ट रूप में दिखलाई पड़ता है। उन्होंने मुक्तिबोध की कुल 24 कहानियों को तीन कालखंड में व्यक्त किया। उन्होंने मुक्तिबोध की कहानियों का पहला चरण नागपुर से पहले की कहानियां , दूसरा चरण नागपुर में रहकर लिखी कहानियां तथा तीसरा चरण राजनांदगांव की कहानियों को माना। अपने आधार वक्तव्य में कथाकार कैलाश बनवासी ने मुक्तिबोध की कहानियों को कहानी परंपरा से अलग लिखी कहानी माना। उन्होंने 'पक्षी और दीमक' कहानी पर विस्तार से बात रखी।मुक्तिबोध की आलोचना पर आलोचक जयप्रकाश ने कहा कि मुक्तिबोध की डायरी उनकी आलोचना कर्म का हिस्सा है। उन्होंने 'कामायनी एक पुनर्विचार' में आए आलोचना मूल्यों को मुक्तिबोध की आगे की आलोचना के मूल्य के रूप में स्थापित किया। वे जीवन की पुनर्रचना की थ्योरी इसी किताब ग्रहण करते हैं। विश्व दृष्टि और सभ्यता समीक्षा भी इसी पुस्तक के सूत्र थे।

अपने आधार वक्तव्य में अजय चंद्रवंशी ने कहा कि मुक्तिबोध का आलोचना कर्म इतिहास परंपरा और विश्व दृष्टि से जुड़ता है। किसी भी कृति का मूल्यांकन मुक्तिबोध ने उनके जीवन से जुड़े बगैर नहीं किया।

संगोष्ठी का संचालन करते हुए विनोद साव ने कहा कि मुक्तिबोध का साहित्य हमेशा पाठकों के लिए चुनौती रहा है।

मुख्य अतिथि कनक तिवारी ने उनसे जुड़े कई संस्मरण सुनाये। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध जितने अच्छे कवि थे उतने ही बड़े कथाकार और आलोचक भी थे। वे भविष्यमूलक कवि थे इसलिए उन की कविताएं पढ़ते हुए लगता है कि वे आज के कवि हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए 'दुनिया इन दिनों' के संपादक सुधीर सक्सेना ने कहा कि मुक्तिबोध को किसी भी एक फ्रेम में नहीं बांधा जा सकता। उनकी कविता कहानी और आलोचना पक्ष पर तो बातचीत की जाती है लेकिन उनके पत्रकारीय लेखन पर कोई चर्चा नहीं होती जबकि उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर सारगर्भित लेखन किया है। मुक्तिबोध ने चुनौतियों का सामना करते हुए नई पीढ़ी के सामने नई और कठिन चुनौतियां पेश की। कार्यक्रम का संचालन विनोद साव ने तथा नासिर अहमद सिकंदर ने आभार व्यक्त किया तथा कार्यक्रम में शरद कोकास , मीता दास , रवि श्रीवास्तव , परमेश्वर वैष्णव, नीरज मंजीत . भास्कर चौधरी , सूरज प्रकाश राठौर , कालूलाल कुलमी , भगवत साहू , अंजन कुमार , शुचि भावी, पुष्पा तिवारी , के. रवीन्द्र , निजाम राही . नौशाद , नभनीर हंस, शिवमंगल ,प्रतीक ,लक्ष्मी नारायण कुम्भकार आदि उपस्थित रहे।

 

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?