नामवर सिंह हिंदी के नेल्सन मंडेला हैं, जानिए कैसे

मार्क्सवाद मुक्ति का विज्ञान है और इसका बुनियादी लक्ष्य है 'वर्चस्व' और 'शोषण' के सभी रूपों का खात्मा करना।...

जगदीश्वर चतुर्वेदी

इस लेख को लिखने का एक मकसद और भी है कि मुझे लिखने के पहले गुरुदेव याद बहुत आते हैं। यह सच है मैं उनके 'प्रिय सुपात्रों' में नहीं आता। मैं उनसे पढ़ा हूँ, और ऋणी हूँ। सवाल उठा है नामवर सिंह में ऐसा क्या है जिसके कारण उनकी मंडेला के साथ तुलना की जाए ? वे तो महान भी नहीं हैं।यह सच है वे महान नहीं हैं। यह भी सच है कि उनसे अनेक सुधीजन नाराज रहते हैं,  और उनकी नाराजगी के अपने –अपने कारण हैं। जितनी एक व्यक्ति में बुराईयां हो सकती हैं वे किसी हद तक नामवरजी में भी हैं।मंडेला में भी थीं।

व्यक्ति का मूल्यांकन बुराईयों के आधार नहीं किया जा सकता। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय उसकी अच्छाईयों को केन्द्र में रखा जाना चाहिए। मैं निजी तौर पर नामवरजी का अकादमिक कर्जगीर हूँ। मुझे उनसे न तो कोई लाभ मिला है और नहीं उन्होंने कभी मेरे लिए पक्षपात किया है और नहीं कहीं उनकी सिफारिश से मुझे नौकरी ही मिली है। मेरा उनसे विलक्षण संबंध है। मैं न उनका कभी करीबी था और न कभी उनसे दूर था। मैं जितना उनका स्वभाव जानता हूँ, उन्होंने कभी भी मेरी लिखी कोई किताब नहीं पढ़ी और न मैंने कभी उनसे किसी पुस्तक का लोकार्पण कराया और न उनसे कभी कहा कि मेरी पुस्तकें सरकारी खरीद में बिकवा दो। मेरा उनसे निजी तौर पर शिक्षक के नाते रागात्मक संबंध रहा है।

नामवर सिंह महान नहीं हैं। वे सामान्य मनुष्य हैं। सामान्य मनुष्य को जो करना चाहिए वही वे जीवनभर करते रहे हैं।व्यक्ति को सामान्य से महान बनाने का काम तो उसके काम करते हैं। नेल्सन मंडेला भी सामान्य मनुष्य थे, उनको महान तो उनके कर्मों और विचारों ने बनाया। मंडेला के व्यक्तित्व के अनेक गुण हैं जो अनेक महान लोगों में देखने को मिल जाएंगे।

मंडेला को नए युग का क्रांतिकारी उदारतावादी कहना ज्यादा समीचीन होगा। अफ्रीकी समाज में सामाजिक परिवर्तन का नया और सटीक पैराडाइम बनाना असामान्य काम था। उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी जनता को नस्लवादी शोषण और औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति दिलाई। मुक्ति के नए मानवाधिकार राजनीतिक पैराडाइम में समूचे राजनीतिक परिदृश्य को स्थानांतरित किया।

उल्लेखनीय है दक्षिण अफ्रीकी समाज में जनजातीय चेतना और क्रांतिकारी चेतनाओं का सीधे शोषकवर्गों के साथ टकराव था। शोषकवर्गों के नस्लवादी शासन से निकलकर दक्षिण अफ्रीका किस दिशा में जाए इसे लेकर व्यापक मतभेद थे। खासकर दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के बीच में स्वाधीनता संघर्ष के दौरान जिस तरह की घनिष्ठता थी उसमें नए शासन को कम्युनिस्टों से पृथक करके रखना संभव नहीं था। कम्युनिस्टों की लंबे समय से मांग थी कि वे यदि शासन में आएंगे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करेंगे। जिनलोगों ने जुल्म किए हैं उनको दण्डित करेंगे। दूसरी ओर जनजातीय समूहों में भी हथियारबंद समूह थे जो पुरानी परंपराओं को बचाते हुए दक्षिण अफ्रीका को पुराने जनजातीय मार्ग पर ले जाना चाहते थे। इन दोनों के वैचारिक और सशस्त्र समूहों के बीच में दक्षिण अफ्रीका में उदार बुर्जुआ परंपरा बहुत ही क्षीण रुप में मौजूद थी।

दक्षिण अफ्रीका में नए दौर की मांग थी कि उदार बुर्जुआ परंपराओं और मूल्यों का विकास किया जाय। बुर्जुआ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण किया जाय। क्रांतिकारी-जनजातीय अतिवादी ध्रुवों से राजनीति को स्थानांतरित करके उदार बुर्जुआ पैराडाइम में लाया जाय।यह काम बेहद कठिन और मुश्किलों भरा था। इसके लिए लंबी छलांग की जरुरत थी और यही वह बिंदु है जहां नेल्सन मंडेला ने नायक की भूमिका अदा की। क्रांतिकारी-जनजातीय वैचारिक ध्रुवों से छलांग लगाकर मुक्ति के मानवाधिकार पैराडाइम को निर्मित किया।

सामाजिक परिवर्तन के लिए छलांग जरुरी होती है यह बात फ्रेडरिक एंगेल्स ने सबसे पहले रेखांकित की थी और मंडेला इसे भली-भांति जानते थे। मंडेला के सामने सारी दुनिया के क्रांतिकारी और समाजवादी समाज व्यवस्थाओं का गाढा अनुभव था। वे समाजवादी व्यवस्था के पराभव को भी देख चुके थे और जानते थे कि किन कारणों से समाजवादी व्यवस्था गिरी है।

मंडेला ने बताया कि नया दौर उदार बुर्जुआ मूल्यों के विकास की मांग करता है। यही नया बिंदु है जहां पर वे अपने को लेनिन-माओ से अलगाते हैं और मार्क्स-गांधी के करीब आते हैं। बीसवीं सदी में अनेक देशों का सामंती या जनजातीय समाजों से सीधे समाजवाद में रुपान्तरण हुआ। यह रुपान्तरण अस्वाभाविक ढ़ंग से हुआ। कबीलाई या सामंती जीवन व्यवस्था से समाजवाद में सीधी छलांग का दुष्परिणाम था कि उदार बुर्जुआ मूल्यों को वहां लोग जान ही नहीं पाए।

कबीलाई-सामंती समाजों में आधुनिक अर्थ में लोकतंत्र नहीं होता यही वजह है कि जिन देशों में समाजवाद आया वहां पर उसने लोकतंत्र विरोधी रुख अख्तियार किया।सर्वहारा अधिनायकवाद के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही स्थापित की गयी और बडी संख्या में आम जनता को उत्पीडन-दमन का शिकार बनाया गया।बिना उदार पूंजीवादी मूल्यों का विकास किए बिना सर्वहारा के अधिनायकवाद की स्थापना की अवधारणा का मार्क्स–एंगेल्स के नजरिए या कम्युनिस्ट घोषणापत्र से कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद का अर्थ अन्य के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं है। मार्क्सवाद मुक्ति का विज्ञान है और इसका बुनियादी लक्ष्य है 'वर्चस्व' और 'शोषण' के सभी रुपों का खात्मा करना। समाज में शोषक-शोषित के संबंधों का खात्मा करने का अर्थ यह नहीं है कि शोषकवर्ग के लोगों को शारीरिकतौर पर खत्म किया जाय। बल्कि इस संबंध को खत्म करने का अर्थ है कि समाज में स्वाभाविक लोकतांत्रिक विकास प्रक्रियाओं के जरिए सामाजिक परिवर्तन को संभव बनाया जाय। जिस तरह शोषकवर्ग एकदिन में पैदा नहीं होता वैसे ही उसका खात्मा भी रातों-रात संभव नहीं है। शोषक सत्ता को क्रमशः जीवन के सभी स्तरों से खत्म किया जाय और यह काम धैर्य के साथ और जनता का दिल जीतकर किया जाय। समाजवादी देशों में विकास के उच्च रुपों का निर्माण हुआ लेकिन जनता की शिरकत के बिना और राज्यतंत्र के दमन-उत्पीडन के जरिए। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में कम्युनिस्टों के साथ संघर्ष करते हुए जो कार्यक्रम स्वीकार किया था, उस कार्यक्रम को स्वाधीनता मिलने के साथ बदला। इस बदलाव की प्रक्रिया समानांतर चली।

मसलन् एक तरफ गोरों के साथ समझौते की शर्तें तय हो रही थीं वहीं दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के कार्यक्रम और राजनीतिक कार्यक्रम में बदलाव किया गया। नेल्सन मंडेला का सबसे बड़ा योगदान है कि मानवाधिकारों के आधार पर दक्षिण अफ्रीकी समाज का निर्माण।

मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के कारण नए स्वतंत्र दक्षिण अफ्रीका के निर्माण के लिए नए मानकों,  मूल्यों और सामाजिक संबंधों को निर्मित करने की दिशा में विचार-विमर्श शुरु हुआ। नेल्सन मंडेला का महान योगदान यही है कि वे पुराने वैचारिक सोच-विचार-एक्शन से सभी दलों को बाहर लेकर आते हैं और सभी दलों को नए सिरे से कार्यक्रम बनाने के लिए मजबूर करते हैं।

नेल्सन मंडेला 1994-99तक दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।पहली लोकतांत्रिक सरकार बनायी। इस सरकार का पहला मुख्य लक्ष्य था नस्लभेदीय राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक संरचनाओं को नष्ट करना।मंडेला सरकार का लक्ष्य था नस्लभेदीय संरचनाओं को नष्ट करके उनके स्थान पर समानतावादी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण करना।महज पांच सालों में यह काम उन्होंने सभी स्तरों पर संपन्न किया। इसके अलावा गरीबी, भुखमरी, हिंसा, अपराध आदि से जुड़ी समस्याओं को भी केन्द्र में रखा गया था लेकिन नस्लभेदीय संरचनाओं को खत्म करने पर सबसे पहले मुख्य जोर दिया गया। मंडेला सरकार के पांच साल के शासन के बाद गरीबी, भुखमरी, हिंसा, स्वास्थ्य और शिक्षा को केन्द्र में रखा गया है। बडे पैमाने पर भूमिसुधार कार्यक्रमों को लागू किया गया जिससे आम नागरिकों को गरीबी के खिलाफ लड़ने में मदद मिले।

अब जरा ठहरकर हिंदी में नामवर सिंह फिनोमिना,  भूमिका और योगदान पर विचार करें। यह सच है नामवर सिंह का कद नेल्सन मंडेला से तुलना योग्य नहीं है। मंडेला एक राजनीतिक नेता हैं,  और नामवर सिंह लेखक हैं। जिस तरह मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में मंडेला पर चर्चाएं हो रही हैं उसी तरह मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में नामवर सिंह पर चर्चाएं होनी चाहिए।

मंडेला हमारे लिए एक रूपक है। काले लोगों के नायक के रुप में मंडेला ने जो यश अर्जित किया और न्यायपूर्ण समाज के संस्थापक नायक की पहचान बनाई। ठीक यही काम अपने तरीके से नामवर सिंह ने आलोचना के जरिए हिंदी भाषा और साहित्य के लिए किया है। उनके लिखे की हमने तीखी आलोचना अन्यत्र की है, लेकिन उनके सकारात्मक योगदान पर भी हमारी नजर होनी चाहिए।

हिंदी साहित्य में अनेक प्रोफेसर हैं। अनेक आलोचक हैं। लेकिन अपने बयानों और लेखन और उपस्थिति से हिंदी के परिवेश में सक्रियता और जोश पैदा करने का जो काम नामवर सिंह ने किया है वह विरल है। आज भी वे फेसबुक पर नहीं हैं लेकिन उनके चाहने वाले सैंकड़ों लोग फेसबुक पर हैं। वे बूढ़े हो गए हैं, कम बोलते हैं,  लेकिन जनता को गोष्ठी में खींचकर लाने में वे आज भी सब पर भारी पड़ते हैं। सब लेखक चाहते हैं कि एक बार नामवर उन पर कुछ बोल दें। नए लेखकों के लिए उनके प्रशंसा में कहे गए कथनों का बड़ा महत्व है।मैं तो आज तक तरस रहा हूँ कि वे मेरे बारे में एक अच्छा वाक्य कह दें। नए लेखक लंबे समय तक उनकी कही बातों के नशे में रहते हैं। कथन के नशे का नायक बनना आसान काम नहीं है। मंडेला और उनमें यह विलक्षण संयोग है।

मंडेला कथन के नायक हैं और नामवर भी। मंडेला सबसे मिलते हैं और बिना किसी पूर्वाग्रह के मिलते हैं, नामवर सिंह भी यही काम करते हैं। मंडेला से मिलकर लोग भावविभोर होकर लौटते हैं और नामवर सिंह से मिलकर भी अपूर्व सुख मिलता है। मंडेला और उनके बीच में सादगी भी एक सेतु है।

दोनों का मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध रहा है। दोनों ने एक अवधि के बाद मार्क्सवाद के दायरे के बाहर निकलकर काम किया और सोचा है। दोनों की मार्क्सवाद के प्रति पुख्ता, सर्जनात्मक और पूर्वाग्रहरहित धारणाएं हैं। दोनों के लिए मार्क्सवाद सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है।विश्व दृष्टिकोण है। दोनों ने अपने से भिन्न विचारधारा के लेखकों-कलाकारों-राजनेताओं आदि के कार्यक्रमों-पुस्तक समर्पण-जलसे आदि में जाकर उदारमना के रुप में ख्याति पायी है। दोनों ने मार्क्सवाद के दायरे के बाहर निकलकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को अपने आचार- व्यवहार का हिस्सा बनाया है।

मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में साहित्य को देखने की मार्क्सवादियों को आदत नहीं है। हमारी आलोचना ने मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य विकसित नहीं किया है।नामवर सिंह द्वारा वर्णित 'दूसरी परंपरा', 'वर्ग' की बजाय 'मनुष्य' को केन्द्र में रखती है। नामवर सिंह की व्यापक अकादमिक अपील और सामाजिक-साहित्यिक स्वीकृति का आधार भी यही है। 'दूसरी परंपरा' मानवाधिकार परंपरा है।

मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में साहित्य में काम करने का अर्थ है उपेक्षित विषयों,  सामाजिक समूहों,  लेखकों आदि की ओर लौटना।लेखकों को सामाजिक-साहित्यिक शिरकत के लिए प्रेरित करना। नामवर सिंह ने अपने भाषणों, पुस्तक लोकार्पण और लेखों के जरिए यह काम खूब किया है। लेखक के लिए प्रोत्साहित करना,  उत्साह वर्धन करना मूलतः मानवाधिकार के साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में आता है।

समस्या यह है कि हम सभी सब्जैक्टिविटी के शिकार हैं। लेखक या कृति या साहित्यादोलनों पर बातें करते समय आत्मग्रस्त रहते हैं। साहित्य और मानवीय जीवन में सब्जैक्टिविटी की भूमिका है लेकिन इस भूमिका को जितना कम कर सकें उतना ही बेहतर होगा। नामवर सिंह पर बातें करते समय भी सब्जैक्टिविटी रहती है।

नामवर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है उनके वक्तव्य और उदार मानवीय व्यवहार। वे जब भी कोई बयान देते हैं तो उस पर सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान जाता है और साहित्यकारों में उस पर व्यापक चर्चा होती है। ये हमेशा 'मनुष्य के भविष्य' को ध्यान में रखकर बयान देते हैं। लेखकों पर दिए बयानों पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ है और सबसे ज्यादा उनकी आलोचनाएं भी हुई हैं। वस्तुगत तौर पर देखें तो इस तरह के बयानों को प्रोत्साहन बयान कहें तो बेहतर होगा। ये संबंधित साहित्यकार के साहित्येतर मनोभावों और लक्ष्यों को प्रेरित करते हैं। इन बयानों में कहीं -कहीं द्विवेदीजी की तरह ही 'उच्छन्न भावुकता', आत्मविश्वास और सत्यनिष्ठा भी है।

दूसरी परंपरा की धुरी है 'पीड़ा में आशा' की खोज करना,  यह मंडेला के नजरिए की भी धुरी है। इसी पहलू को नामवर सिंह ने भी काफी पहले 'दूसरी परम्परा की खोज' में रेखांकित किया था। यह परंपरा जब अपने को कबीर से जोड़ती है तो मूलतः साहित्य के मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य को ही सामने लाती है।

आलोचना की बहसों में मानवाधिकार खो गए और हजारीप्रसाद द्विवेदी बनाम रामविलास शर्मा या रामचन्द्र शुक्ल आदि केन्द्र में आ गए। जबकि 'दूसरी परंपरा' का लक्ष्य है 'जागना और विवेक के साथ सोचना'।

'दूसरी परम्परा की खोज' का मकसद है साहित्य के मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य का निर्माण करना। भारत में मानवाधिकारों के साथ जोड़कर या उनके नजरिए से चीजों,  घटनाओं,  कृतिकार आदि को देखने या विवेचित करने की परंपरा नहीं है। उन्होंने 'परम्परा की खोज' के लिए इस कृति को लिखा।

संयोग देखें परम्परा की खोज के नाम पर जो मसले किताब में उठाए गए वे मानवाधिकार के सामयिक मसले हैं। 'दूसरी परम्परा' उनकी है जो आलोचना में उपेक्षित रहे हैं। दूसरी परंपरा 'खोज' पर जोर देती है, 'निर्णय' सुनाने पर नहीं। यह खुली परम्परा है।आप इसका यथासंभव दिशा में विकास कर सकते हैं। इसमें लेखक का साहित्यिक और गैर-साहित्यिक कर्म शामिल है। मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य की बुनियादी विशेषता है हर चीज को अन्तर्विरोधों की कसौटी पर परखना और विश्लेषित करना। अन्तर्विरोधों के बिना कोई भी विषय नहीं खुलता। मानवाधिकारवादी में आत्मविश्वास और सत्यनिष्ठा होनी जरुरी है। कबीर और अन्य लेखकों की ओर नामवर सिंह ने इसी बुनियादी परिप्रेक्ष्य के आधार पर विचार किया है।

मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में वह सारा साहित्य आएगा जो सभी किस्म के भेदभाव और वर्चस्व का विरोधी हो, आत्म-सम्मान पर जोर देता हो,  सामाजिक स्वत्व-रक्षा के सवालों पर हमें सोचने को उदबुद्ध करे।अन्याय का प्रतिवाद करे। मानवाधिकारों के बारे में सबके प्रति समान नजरिया रखता हो। स्त्री, अल्पसंख्यक और दलितों के हकों की हिमायत करे। सभी भाषा और बोलियों को समान अधिकार दे। शांति के पक्ष और युद्ध के विरोध में लिखा गया हो। साम्प्रदायिकता,  पृथकतावाद, आतंकवाद आदि के विरोध में लिखी रचनाएं भी मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में आएंगी।

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