मुनि जिनविजय यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठित करते हैं

हिंदी का आधुनिक साहित्य परम्परा से नहीं जुड़ता। हमारी स्मृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है।...

हाइलाइट्स
  • मुनि जिनविजय का अवदान अविस्मरणीय - प्रो हाड़ा
  • बनास जन के मुनि जिनविजय विशेषांक का लोकार्पण

चित्तौड़गढ़। हिंदी का आधुनिक साहित्य परम्परा से नहीं जुड़ता। हमारी स्मृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है। मुनि जिनविजय का सबसे महत्त्वपूर्ण अवदान यह है कि वे यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठित करते हैं।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो माधव हाड़ा ने संभावना संस्थान द्वारा विजन कालेज में आयोजित संगोष्ठी में उक्त विचार व्यक्त किये। प्रो हाड़ा ने कहा कि मुनि जी आजीवन विद्यार्थी भाव से शिक्षा ग्रहण करते रहे। दो सौ से अधिक प्राचीन ग्रंथों का अनुसंधान-पाठालोचन, अनेक संस्थाओं का निर्माण और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे मुनि जिनविजय का स्मरण हमारी देशज परंपरा को समृद्ध करता है।

आयोजन में साहित्य अकादेमी, भारत सरकार की प्रतिष्ठित शृंखला में प्रो हाड़ा द्वार मुनि जी पर लिखित मोनोग्राफ तथा मुनि जी पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका 'बनास जन' के विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया।

आयोजन में दिल्ली से आए बनास जन के संपादक डॉ पल्लव ने हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन में मुनि जी के कार्यों के महत्त्व का प्रतिपादन किया।

 डॉ पल्लव ने कहा कि उनके नानाजी स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना मुनि जी के निकट संपर्क रहे थे। संगोष्ठी में आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने प्रो हाड़ा तथा डॉ पल्लव के साथ संवाद करते हुए मुनि जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक पहलुओं का उद्घाटन किया। खुली परिचर्चा में प्रो. हाडा ने मुनि जी के अवविस्मरिणय योगदान को रेखांकित किया।

Prof. Madhav Hada, Mohanlal Sukhdia University, Muni Jinvijay, Chittorgarhउन्होंने बताया कि महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी के जन्म निर्धारण के लिए मुनि जी के अध्ययन और अन्वेषण का सहारा लिया गया। राजस्थान के एककीकरण के समय माउंट आबु के संदर्भ में तथ्य संकलन समिति के अध्यक्ष रहते हुए मुनि जी ने प्रमाणों के आधार पर साबित किया की माउंट आबू पर राजस्थान का अधिकार बनता है। इसी आधार पर गुजरात से माउंट आबू राजस्थान में मिला।

राजस्थान विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य डॉ रेणु व्यास ने भारतीय ज्ञान पर यूरोपीय समझ के हावी होने की प्रवृत्ति पर चर्चा करते हुए मुनि जी की आत्मकथा को हिंदी गद्य की अनुपम कृति बताया।

परिसंवाद में एडवोकेट भंवरलाल शिशोदिया, सर्वोदय साधना संघ के नवरतन पटवारी, आलोचक सत्यनारायण व्यास तथा कवि रमेश मयंक ने भागीदारी की।

संभावना के अध्यक्ष डॉ के सी शर्मा ने कहा कि नगर में आयोजित होने वाली साहित्यिक सँगोष्ठियां हमें देशज संस्कृति के निकट ले जाती हैं। इससे पहले संभावना के संयोजक डॉ कनक जैन ने मुनि जी पर प्रकाशित मोनोग्राफ और बनास जन के विशेषांक का परिचय दिया। आयोजन में  श्रमिक नेता घनश्याम सिंह राणावत, गीतकार रमेश शर्मा, डॉ राजेश चौधरी, डॉ अखिलेश चाष्टा, मुन्नालाल डाकोत, बाबू खां मंसूरी, डॉ साधना मण्डलोई, गोपाल जाट, पूर्णिमा चरण,कृष्ण कांत दशोरा तथा विकास अग्रवा सहित पत्रकार, साहित्य प्रेमी और युवा उपस्थित थे।

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