‘मैं उर्वशी को शोषित नारी के रूप में देखता हूं’ - दूघनाथ सिंह

कवि-कथाकार दूघनाथ सिंह से 27 साल पहले शम्सुल इस्लाम की बातचीत...

हाइलाइट्स

उर्वशी के पात्र को लें, जो कि स्थापित मान्यता के अनुसार तड़क-भड़क वाली नर्तकी थी और मस्ती का जीवन बिताती थी। मेरी कल्पना इससे अलग है, मैं उर्वशी को एक ऐसी शोषित नारी के रूप में देखता हूं, जिसका प्रयोग अभिजात्य वर्ग के लोग अपने ओछे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते हैं।

संडे मेल साप्ताहिक - नयी दिल्ली-11 नवबंर, 1990

बातचीत

कवि-कथाकार दूघनाथ सिंह से 27 साल पहले शम्सुल इस्लाम की बातचीत

दूघनाथ सिंह हिंदी के जानेमाने कथाकार और कवि हैं। वह उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने साहित्य और राजनीति को एक लड़ी में पिरोया है। वह आपातकाल के दौरान भूमिगत भी रहे। अक्तूबर, 90 में उन्होंने अपने जीवन के 55 साल पूरे कर लिये हैं। उनकी पहली कहानी ‘कौकोर छायाचित्र’ 1957 में प्रकाशित हुई थी।

आपकी रचनाओं को पढ़कर भाषा में लिहाज से एक रोचक अनुभूति होती है। एक तरफ तो आपकी रचनाओं में संस्कृत शब्दावली है तो दूसरी ओर उर्दू की छाप मिलती है। आप अवधी और भोजपुरी व्याकरण भी इसके साथ प्रयोग करते है। इस विविधता का क्या कारण है?

इस सबका संबंध मेरे परिवेश और ट्रेनिग से है। मैं संस्कृत, हिंदी और उर्दू का जानकार हूं। अवधी और भोजपुरी बोले जाने वाले क्षेत्रों में रहा हूं। ये सब रंग मेरी रचनाओं में आते ही है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं अपनी रचनाओं को पहले उर्दू में लिखता हूं फिर देवनागरी में उतारता हूं। इस तरह मेरे विचारों की खानगी बनी रहती है।

आप तो मुख्य रूप से कहानीकार और कवि है। ‘यमगाथा’ नाटक लिखने की वजह?

मैं नाटककार नहीं हूं। मेरा यह पहला नाटक है, जिसे मैंने सन 1968 में लिखना शुरू किया था। इसे लिखने के पीछे दो कारण थे। एक तो पिछले कुछ सालों में अचानक कुछ बुध्दजीवी भारत को हिंदुराष्ट्र बनाने के लिए अवतरित हुए। वे सारी भारतीय संस्कृति को आर्यों और ब्राह्मणवादी दृष्टि से देखना चाहते थे। उनके अनुसार ब्राह्मणवादी हिंदू होना, आर्य होना और भारतीय होना एक ही बात है। इस ढांचे में किसी और गंुजाइश ही नहीं है। इस पाखंड की पताका को लहराने के लिए ये हिंदुत्ववादी तत्व चूंकि पौराणिक कथाओं का सहारा ले रहे थे, इसलिए इस पाखंड को चकानुचर करने के लिए मुझे भी पौराणिक कथाओं में ही लौटना पडा। ‘यमगाथा’ के लिए मैंने उर्वशी, पुरूरवा और वसिष्ठ की कहानी को चुना, जिसका वर्णन ऋृग्वेद में है। कालिदास ने अपने नाटकों में इन पात्रों की कहानी को ब्राह्मणवादी की दृष्टि से ही आगे रखा लेकिन मुझे लगा कि इस कथा की अगर पुर्नव्याख्या की जानी है तो नाट्यविधा का ही सहारा लेना होगा। मुझे लगता है कि मेरा ये फैसला गलत नहीं रहा है।

यमगाथा’ लिखने की दूसरी वजह?

मेरे बहुत से प्रगतिशील साथियों की राय थी कि प्राचीन भारतीय समाज में कोई द्वंद्व नहीं नहीं था। ब्राह्मणवादी दर्शन के अतिरिक्त और कोई धारा नहीं थीं उनके अनुसार ‘आदिविद्रोही’ के रूप में केवल यूरोप में ही पाये जाते थे। हमारी धरती तो जैसे इस बारे में बोझ ही हो। मजेदार बात यह है कि अगर एक तरफ हिंदुत्ववादी तत्व अपनी विरासत, को ही शाश्वत और सही मानते थे तो इस प्रकार के प्रगतिशील तत्व भी अपनी उपरोक्त समझ के चलते ब्राह्मणवादियों से सहमत होने लगते है। मैं इस झूठ पर से पर्दा उठाना चाहता था। मुझे पुरूरवा के रूप में भारतीय ‘आदिविद्रोही’ दिखायी दिया और ‘यमगाथा’ में मैंने कालिदास और अन्य ब्राह्मणवादी विश्लेषण से हटकर उसको नयी पहचान दी।

आपकी इस नयी व्याख्या का निचोड़ क्या है?

ऋृग्वेद और कालिदास की रचनाओं में आर्य इंद्र के खिलाफ गैर आर्य पुरूरवा और वसिष्ठ के संघर्ष का जो चित्रण है, उसके अनुसार पुरूरवा और वसिष्ठ आर्य विरोधी और धर्म विरोधी थे। अंत में पुरूरवा और वसिष्ठ की हार को आर्य, धर्म और सभ्यता की जीत के तौर पर चित्रित किया गया, जबकि सच इससे अलग था। दरअसल, यह एक वर्गीय संघर्ष था, जो पुरूरवा ही हार के साथ समाप्त नहीं हो सकता था। आज आरक्षण को लकर जो दो धाराएं है, वे इसी संघर्ष की पुनरावृत्ति नहीं है? इसी प्रकार उर्वशी के पात्र को लें, जो कि स्थापित मान्यता के अनुसार तड़क-भड़क वाली नर्तकी थी और मस्ती का जीवन बिताती थी। मेरी कल्पना इससे अलग है, मैं उर्वशी को एक ऐसी शोषित नारी के रूप में देखता हूं, जिसका प्रयोग अभिजात्य वर्ग के लोग अपने ओछे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते हैं। ‘यमगाथा’ में उर्वशी को अपने उत्पीड़न का अहसास है और वह अपनी मुक्ति के लिए छटपटाती रहती है।

क्या ‘यमगाथा’ को एपिक थियेटर के सिलसिले का नाटक माना जा सकता है?

मैं ‘यमगाथा’ को एपिक थियेटर की एक कड़ी ही मानता हूं। दरअसल, इस नाटक को लिखने की प्रक्रिया में मुझे बेख्त ने बहुत प्रभावित किया। इस नाटक को लिखने में इतने साल भी इसीलिए लगे, क्योंकि मैं ब्रेख्त की विरासत को आत्मसात करना चाहता था। ब्रेख्त ने पौराणिक कथाओं को दमन और फांसीवाद के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। उसकी पुर्नव्याख्या ने इतिहास को प्रतिक्रियावादी के चंगुल से मुक्त कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मैंने हिंदी साहित्य में इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। दरअसल, मेरा यह नाटक एक राजनीतिक शोध भी है।

यमगाथा’ को लेकर यह भी कहा गया है कि यह एक राजनैतिक प्रचार है। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

अगर ऐसा है तो मुझे लगता है कि मैं अपने काम में सफल हुआ हूं। ‘यमगाथा’ एक राजनीतिक नाटक है। ‘पहल’ पत्रिका ने तो इसे ‘नक्सल नाटक’ कहा है। मुझे यह सब पढ़कर अच्छा ही लगा है। समाज में अगर द्वंद्व तीव्र हुए है तो हमारा पक्ष भी सशक्त रूप से उभरना चाहिए।

क्या किसी अन्य नाटक पर भी काम चल रहा है?

आजकल मैं एक फंतासी पर काम कर रहा हूं। इसका नाम है ‘वैदांतिक दर्शन और शंकराचार्य’। इस नाटक में मैंने उन कारणों की खोजने का प्रयास किया है, जिसके कारण ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।

आप जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारी है मगर सांप्रदायिकता और जातीयता के युद्व के विरोध में आपका संगठन लगभग निष्क्रिय है, ऐसा क्यों?

बदकिस्मती से हमारे लोग इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं।

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