समकालीन यथार्थ का मंज़र उपस्थित करती ग़ज़लें                                                                                     

कौन कहता है कि वो फंदा लगा करके मरा इस व्यवस्था को वो आईना दिखा करके मरा सुना है आद़मी की बादलों पर भी हुक़ूमत है मग़र गर्मी में गोरैया कहीं पानी नहीं पाती...

पुस्‍तक समीक्षा

समकालीन यथार्थ का मंज़र उपस्थित करती   ग़ज़लें                                                                                     

-- दीपनारायण ठाकुर

आधुनिक हिन्दी की ग़ज़ल-विधा, विशेषकर उसके भाषा-पक्ष एवं बिम्ब-प्रतीक के संबंध में ज्ञान-क्षितिज का किंचित विस्तार हुआ है। इस पुस्तक के द्वारा इस आवश्यकता की पूर्ति की दिशा में एक लघु प्रयास किया गया है और आधुनिक हिन्दी-ग़ज़ल की संवेदना के स्वरूप का विश्लेषण और तत्संबंधी कारण-तत्व पर प्रकाश डाला गया है।

1950 के बाद का युग भारत में स्वतंत्र चेतना के उदय का युग है। निरक्षरता के अंधकार में डूबे रहनेवाले ग्रामीण जन भी साक्षर होकर साहित्य का आस्वादन करने लगे। साहित्य की अनेक विधाओं में ग़ज़़ल विधा सर्वाधिक लोकप्रिय हुई। एक ओर ग़ज़ल के पाठकों की संख्या सौ गुनी नहीं तो दस गुनी-बीस गुनी अवश्य हो गयी, दूसरी ओर ग़ज़लों के पाठकों का स्तर भी बदल गया। अब केवल हिन्दी-ग़ज़ल मनोरंजन का साधन नहीं रह गई, बल्कि ग़ज़ल नगर से ग्राम की ओर गई। जीवन की अभिव्यक्ति और आस्वादन का माध्यम बनी। एक प्रकार से ग़ज़ल का जनतंत्रीकरण हो गया। ग़ज़ल वास्तविक जन-जीवन के बीच आकर खड़ी हो गई।

काव्य की अन्य विधाओं की तरह ग़ज़ल का भी यथार्थ अर्थ-बोध उसकी भाषा के अध्ययन से ही संभव है। डॉ. डी. एम. मिश्र के ग़ज़ल-संग्रह आईना-द़र-आईना की समीक्षा में हमने ग़ज़लों की भाषा एवं बिम्ब-प्रतीक का विश्लेषण कर प्रतिपाद्य के सौंदर्य के उद्घाटन का प्रयास किया है। इस ग़ज़ल-संग्रह से गुज़रते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ये ग़ज़लें मन और प्राण से लिखी गई हैं और ग़ज़लगो जिन भावों की गहराई, भाषा की सादगी, सफाई की बात करते हैं, उसका संग्रह में निर्वाह हुआ है। ग़ज़लकार को ग़ज़ल कहने का शऊर हासिल है, यहाँ ग़ज़ल का मिज़ाज मौज़ूद है और अश्आर अपने फ़ॉर्म और तक़नीकी पहलुओं से संपूर्ण हैं एवं ग़ज़लकार ने अपनी ग़ज़लों को जहाँ-जहाँ हिन्दी का मुहावरा दिया है, वहाँ समकालीन यथार्थ का मंज़र उपस्थित हुआ है। वहाँ ग़ज़लें रिवायति-रूमानियत से हटकर विसंगतियों को उघाड़ने में क़ामयाब हुई हैं; वहाँ ये ग़ज़लें समय का सच हो गई हैं। संग्रह की पहली ग़ज़ल

आईने में खरोचें न दो इस क़दर
ख़ुद को अपना क़याफ़ा न आये नज़र

रात कितनी ही लंबी भले क्यों न हो
देखना रात के बाद होगी सहर

फूल तोड़े गये टहनियाँ चुप रहीं
पेड़ काटा गया बस इसी बात पर

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का एक तेवर यह भी है कि उसमें न तो राजनीतिक उठापटक तथा पैंतरेबाज़ी की चिंता है और न ही रसवर्षण की कामना और न अभिव्यक्ति को उबाऊ, उलझाऊ बना कर पेश करने की यत्नशीलता। इस प्रकार की ग़ज़ल में मात्र मानवीय सरोकार है, मानव नियति की जटिलता और कुटिलता के ब़यान की ललक है और इससे दो-चार होने की आकांक्षा। ग़ज़लों में एक सहजता है, लेकिन वही सहजता अर्थों की विशिष्ट परिधि में ले जाकर खड़ी करती है, जैसे :

भेदे जो बड़े लक्ष्य को वो तीर कहाँ है
वो आईना है किन्तु वो तस्वीर कहाँ है

देखा ज़रूर था कभी मैंने भी एक ख़्वाब
देखा नहीं उस ख़्वाब की ताब़ीर कहाँ है

पत्थर दिखा के उसको डराया नहीं जाता
वो आईना है उसको झुकाया नहीं जाता

इक फूँक मार करके आप ने बुझा दिया
इस तरह चिराग़ों को बुझाया नहीं जाता

पहले अपना चेहरा रख
फि‍र कोई आईना रख

लोगों की बातें भी सुन
मग़र फ़ैसला अपना रख

काँटों की बस्ती फूलों की, खुशबू से तर है
दिल ये हमारा है कि तुम्हारी यादों का घर है

भरे-भरे मेघों को छूकर पंछी लौटे जब
तब पोखर की क़ीमत समझे जो धरती पर है
 

बहुधा यह प्रश्न उठाया जाता है कि आधुनिक ग़ज़ल के व्यक्तिवादी ग़ज़लकार की कोई सामाजिक प्रतिबद्धता है या नहीं।  इकाई का जीवन एक इकाई का जीवन ही नहीं होता, समाज और समय के जीवन की प्रतिध्वनि भी उसमें सुनी जा सकती है। तात्पर्य यह कि नई ग़ज़ल के ग़ज़लकार मुख्यतः व्यक्ति के मन का विश्लेषण करते हैं और उसी के माध्यम से सामाजिक चेतना तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। ग़ज़ल-संग्रह 'आईना-द़र-आईना ' में वर्तमान सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता तथा सामाजिक जीवन का बोध है एवं उसमें समाज की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का प्रस्तुतिकरण हुआ है। नागरिक जीवन की कठिनाइयों का भी चित्रण ग़ज़ल-संग्रह की ग़ज़लों में सफलता के साथ किया गया है। निष्कर्ष यह कि समाज की बहुविध समस्याओं के प्रति ग़ज़लकार सजग हैं और उन्हें अपनी ग़ज़लों में भी उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति कर रहे हैं -

कौन कहता है कि वो फंदा लगा करके मरा
इस व्यवस्था को वो आईना दिखा करके मरा


गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ
मुखिया की दालान देखकर आया हूँ

करें विश्वास कैसे सब तेरे वादे चुनावी हैं
हक़ीक़त है यही सारे प्रलोभन इश्तहारी हैं

डी. एम. मिश्र का ग़ज़ल-संग्रह ' आईना-द़र-आईना ' इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि आम तौर पर साहित्य में हम वास्तविक जीवनके विभिन्न आयाम तलाश करते हैं, जहाँ कहीं भी हमें ऐसा महसूस होता है कि हमारे भीतर या आस-पास की बातें कही गयी हैं, तो हम ऐसे साहित्य से बहुत जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। ग़ज़ल-संग्रह 'आईना-द़र-आईना' इस हक़ीक़त को और भी सामने लाता है। इस संग्रह में कुल 109 ग़ज़लें हैं। ग़ज़लें संयत आक्रोश, मुखर प्रतिपक्ष, गहन संवेदनशीलता और सुनियोजित चिंतन से ओतप्रोत हैं। मानवीय परिवेश के जीवन-संघर्ष की पड़ताल करते हुए ग़ज़लकार में सीधे-साधे मासूम जनों के प्रति गहरा विश्वास और लगाव बार-बार परिलक्षित होता है । इन ग़ज़लों में मानवीय अवसाद , आशा-आकांक्षा का इतिहास तो है ही, इस सबसे बढ़ कर इन ग़ज़लों में वहाँ का समाजशास्त्र भी झांक-झांक जाता है।

खिली धूप से सीखा मैंने खुले गगन में ज़ीना
पकी फ़सल में देखा मैंने खुशबूद़ार पसीना

लोग साथ थे इसलिए वरना हचकोले खाता
पार कर गया पूरा द़रिया छोटा एक सफ़ीना

गुलाबों की नई क़िस्मों से वो ख़ुशबू नहीं आती
बहुत बदला ज़माना वो कबूतर अब न वो पाती

सुना है आद़मी की बादलों पर भी हुक़ूमत है
मग़र गर्मी में गोरैया कहीं पानी नहीं पाती
डी एम मिश्र जी के ' आईना-द़र-आईना ' की ग़ज़लों का केंद्रीय चरित्र कहीं न कहीं उनके संपूर्ण रचना कर्म का भी केंद्रीय चरित्र है। वे हर बार ' ग़ज़ल ' में लौटते हैं। एक नई रचनात्मक विवशता और वैचारिक सक्रियता के साथ, जिसे वे प्रेम की मांसलता मात्र ' ग़ज़ल ' में चरितार्थ नहीं करते , बल्कि उस प्रेम को संपूर्ण सृष्टि की केंद्रीय धुरी के रूप में उभारते हुए, मनुष्य की मूल प्रवृत्ति के रूप में उद्घाटित करते हैं ---

प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं
पीर को संवेदना तक ले गया
अग़र वो चैन व क़रार था तो उदासियाँ दे गया कहाँ वो
मेरे तसव़्वुर में आ के लेता ज़गह तुम्हारी ख़ुदा कहाँ वो
आपकी इक झलक देखकर प्यार की वो नज़र हो गया
पाँव रखा जहाँ आपने हुस्न का वो शहर हो गया
सालों की साधना के बाद जब किसी ग़ज़लकार की ग़ज़लों का मुज़म्मा छप कर आता है तो उसे सरसरी निग़ाह से नहीं देखा जा सकता। ‘दो शब्द के बहाने' अपनी भूमिका में विख्यात साहित्यकार एवं कथाकार संजीव जी ने ग़ज़लकार के असरात का ख़ुलासा भी किये हैं, जो इन ग़ज़लों को समझने में इतनी मदद तो ज़रूर करता है कि इन ग़ज़लों के उत्स और उनके प्रेरणास्रोत ख़ोजे जा सकें। 'आईना-द़र-आईना' की ग़ज़लों में प्रवेश करना अपने आप में एक अनुभव से गुज़रना है। ग़ज़लकार के पास भाषा बड़ी तरल और सरल पर प़ैनी है और मारक भी है। वह बहुत ही सादी और आम आद़मी की ज़बान में चुभने वाली बात कहते हैं, वह भी ऐसे कि ग़ज़ल में कविता की आब़ बनी रहे।

कभी लौ का इधर जाना, कभी लौ का उधर जाना
दिये का खेल है तूफ़ान से अक़्सर गुज़र जाना

जिसे दिल मान ले सुंदर वही सबसे अधिक सुंदर
उसी सूरत पे फिर जीना, उसी सूरत पे मर जाना

खिले हैं फूल लाखों, पर कोई तुझ सा नहीं देखा
तेरा गुलशन में आ जाना बहारों का निख़र जाना

मिलें नज़रें कभी उनसे क़यामत हो गयी समझो
रूके धड़कन दिखे लम्हों में सदियों का गुज़र जाना

किया कुछ भी नहीं था बस ज़रा घूँघट उठाया था
अभी तक याद है मुझको तुम्हारा वो सिहर जाना

ऐसी ग़ज़लें पाठकों और श्रोताओं की ज़ुबान पर चढ़ने वाली हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि इन ग़ज़लों में श्रमशील जनता की भावनाएँ सामने आई हैं। ग़ज़लकार की प्रतिबद्धता जन के प्रति है।

पुस्तक : आईना-द़र-आईना  ( ग़ज़ल-संग्रह)
ग़ज़लकार : डी. एम. मिश्र
प्रकाशक : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 250 रुपए

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