…..हे इरोम शोक मत मनाना....

 

..........................संजीव ‘मजदूर’ झा.

…..हे इरोम शोक मत मनाना....

हारना, एक शब्द-भेदी बाण बना है

जिसका प्रयोग निष्ठुर समाज तुम्हारे ऊपर करेगा.

लेकिन लोग यह नहीं जानते कि

सोलह वर्ष से हार रही इरोम पर यह हार

एक वक़्त के रोटी को बस ठुकराने जैसा है.

संजीव ‘मजदूर’ झाहाँ, रोटी-पानी एक वक़्त का भी बहुत कुछ होता है

लेकिन उसके लिए जिसने

भूख के लिए गले को बेचा हो

उसके लिए नहीं जिसने आवाज के लिए

सोलह वर्ष भूख को ठुकराया हो.

फिर भी यदि यही तुम्हारी हार है

तो इस हार में तुम अकेली नहीं

बल्कि इस हार में

सत्य और अहिंसा के साथ गांधी भी हार गए.

हार तो गाँधी भी बहुत पहले गए थे

बस उनकी अर्थी तुम्हारे अनशन के साथ उठी.

गाँधी का हारना बहुत बड़ी हार होती है इरोम

क्योंकि जब गाँधी हारता है तब वे

नंग-ध्रंग स्त्री-जातियां भी हारती है जिसे

अपने बलात्कारियों को न्योता देकर कहना पड़ता है कि

हे श्रेष्ठ पुरुषों आओ और मुझे नोच लो.

इसलिए तुम्हारी हार में स्त्री-जाति भी हार गयी

और हार गया वह लोकतंत्र भी जिसकी नींव

अनगिनत भगतों के शहादत से लहुलुहान है.  

 इसलिए हे इरोम तुम शोक मत मनाना क्योंकि

 जब समाज हारता है तब क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है

 और तुम्हारी हार में समाज हारा है

सिवाय उन नब्बे लोगों के जिसने

दम घुटते लोकतंत्र में तुम्हें चुना है.

क्रांति के समर्थक ये नब्बे लोग

नेता चुनने वाले हज़ारों वोटरों से कहीं महत्वपूर्ण होते हैं

इसलिए यह हार इतिहास के उन पन्नों में

आयत की तरह जरुर खुदेगा

जहाँ वर्तमान को सिर झुकाकर ही

भविष्य में स्थान मिलेगा.

इसलिए हे इरोम तुम कभी शोक मत मनाना.

 

 

 

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