नफ़रतों का घरौंदा जाने बसा क्यूँ है…. कुछ बात उन गैरों की

वो कहते हैं कि इतनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं वो कि दूर नहीं वो दिन जब इस सरज़मीं फिर उनका ही राज होगा हम तो ये ही सोचते रह गए कि उनकी तो सुकून भरी ज़िंदगी की छोटी सी ख्वाइश भी एक दुआ भर है...

अतिथि लेखक

निवेदिता द्विवेदी

वो कहते हैं जिस सरज़मीं की नींव ही नफ़रतों पर टिकी है उसके वजूद को नापाक कहना ही सच्चा है

हम तो ये ही सोचते रह गए कि उन नफ़रतों के लिए अपनी भी ज़िम्मेदारी से उन्हों ने इतनी आसानी से मुंह फ़ेरा कैसे है

वो कहते हैं कि हमसे मुसलसल जंग-ए-ऐलान करना ही उस क़ौम का मक़सद है

हम तो ये ही सोचते रह गए कि करोड़ों इंसान जाने एक ही मक़सद से ज़िंदा कैसे हैं

वो कहते हैं कि मुसलमान लफ़्ज़ से ही हमें एक गैरियत का एहसास होना लाज़मी है

हम तो ये ही सोचते रह गए कि हर मुसलमान जो हमें मिला इतनी अपनाइयत से मिला क्यूँ है

वो कहते हैं कि अकबर हो या औरंगज़ेब या कि तेमूर ही हो सब एक थे कुचला उन्होने हमें सदियों तक है

निवेदिता द्विवेदी
निवेदिता द्विवेदी ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्स से एलीमेंटरी एडुकेशन में एमए किया है।

हम तो ये ही सोचते रह गए कि जो अपने बताए जाते हैं उनसे इतना दर्द और खौफ़ का एहसास मिला क्यूँ है

वो कहते हैं कि इतनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं वो कि दूर नहीं वो दिन जब इस सरज़मीं फिर उनका ही राज होगा

हम तो ये ही सोचते रह गए कि उनकी तो सुकून भरी ज़िंदगी की छोटी सी ख्वाइश भी एक दुआ भर है

वो कहते हैं कि अमन की चाहत तो हमें भी है पर चैन वो कभी लेने ही नहीं देते

हम तो ये ही सोचते रह गए कि चैन-ओ-अमन की दरकार करने वालों के दिलों में नफ़रतों का घरौंदा जाने बसा क्यूँ है..... नफ़रतों का घरौंदा जाने बसा क्यूँ है.....

(निवेदिता द्विवेदी ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्स से एलीमेंटरी एडुकेशन में एमए किया है।)

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