अब भी...पूरी  तरह मरा नहीं वो तालाब

कैसे बताऊँ...उन तालाबों को उनका यूँ ज़िंदा...चिन दिए जाना...ज़रूरी है.....शहर की तरक़्क़ी के लिए.....क्योंकि ..उन्हीं की क़ब्र की...मिट्टी पे ही तो पनपेंगें...आलीशान इमारतों के जगमगाते हुए ख़्वाब...

अब भी...पूरी  तरह मरा नहीं वो तालाब

डॉ. कविता अरोरा

...मै जानती हूँ ..जब ..बड़ी-बड़ी मशीनों के नाख़ून ..गढ़ते हैं बदन पर तो उसे बहुत दर्द होता है ...शहर का तमाम कचरा ..उसके मुँह पे फिंका है ...सड़ांध से दम घुटता है उसका ..मगर  भाग नहीं सकता ...वो ...तालाब ....पैर जो नहीं हैं उसके ....अचानक .. सैकड़ों ट्रालियाँ मिट्टी की गिरीं और दब के कट गईं टाँगें .....धड़ बचा ...तो  छाती धँसा के ..उगा दी गई ..दीवार ...बँटे बदन से .. दायीं बाज़ू ..अलग हुई ...और सड़क बन गई ...मगर उस बचे-खुचे हिस्से में कुछ जान बाक़ी है .....

अब भी आँख से रिस रहा है पानी ...यूँ तो जलकुंभी के हाथ भी गर्दन तलक पहुँच चुके हैं ...मगर सांसें ...फिर भी चलती हैं ...अब भी...पूरी  तरह मरा नहीं वो तालाब .....वो पानी ...अब भी ..हमल से है ...अब भी ....खिल रहें हैं बदन पे ....बैंगनी कँवल ....,

गुज़रती हूँ उधर से ....तो हाथ हिला-हिला के ...बुलाने लगते हैं ..वो बैंगनी कँवल ....मुझे ...सोचते हैं कि ..मैं ..बचा सकती हूँ ...उजड़ने से ...उन बैंगनी कँवलों के घर ....मगर मैं ....उन दीदा-ए-पुर नम से ...निगाह चुरा के गुज़र जाती हूँ .......मैं रोज़ ....नज़रअंदाज़ करती हूँ ....इशारों से ...बुलाती हुई ....उँगलियाँ ...और मुँह फेर लेती हूँ .....मगर फिर भी ना जाने कैसे ...दिख ही जाता है ...मुझे हौले-हौले मरता हुवा ..वो तालाब .....मैं जानती हूँ ....जल्द ही ....उन बैंगनी कँवलों के  मुँह कुचल दिए जाएंगें ईंटों से ...दरख्वास्तें ...दबी की दबी रह जाएंगीं ...फ़ाइलों में ....इंसाफ़ हो भी सकता है .....मगर  ...तब तक ..यकीनन ...वो दम तोड़ चुके होंगे .....कैसे बताऊँ ...उन तालाबों को उनका यूँ ज़िंदा ...चिन दिए जाना ...ज़रूरी है .....शहर की तरक़्क़ी के लिए .....क्योंकि ..उन्हीं की क़ब्र की ...मिट्टी पे ही तो पनपेंगें ...आलीशान इमारतों के जगमगाते हुए ख़्वाब ......वो ज़िंदा दफ़्न  तो हो रहा है ..मगर याद रखना ...ए शहर वालों ...गुजरते वक़्त के साथ ..इक रोज़ ...नजर आएंगी ....इन इमारतों के ...चेहरों पे ....तालाब की ..रोती हुई आँखें....और ...तमाम बैंगनी कँवलों की ...बेचैन रूहें ....उठ के इंसाफ़ माँगेंगीं

 

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