क्यों बदल गई कविता

कविता गुस्सा गुबार उलाहना बनी है कविता पाखण्ड की परतें उधेड़ रही है ताल ठोंक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ी है कटघरे में खड़ा करती उठी उँगली है भिड़ने को तैयार है कविता ...

जसबीर चावला

क्यों नहीं झील सी आँखों में डूबती

गालों के तिल पर अटकती

अधरों जुल्फों में उलझती

नहीं टाँकती अब जूड़े मे फूल

सहज प्रेम करना भूली

क्या कविता बदल गई है

 

कविता गुस्सा गुबार उलाहना बनी है

कविता पाखण्ड की परतें उधेड़ रही है

ताल ठोंक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ी है

कटघरे में खड़ा करती उठी उँगली है

भिड़ने को तैयार है कविता

नरम गालियाँ हैं कविता

 

कभी पेलेटगन अपना स्वभाव बदलेगी

छर्रों की जगह रंग बरसेंगे

पत्थरों नहीं फूलों की बौछार होगी

कविता फिर प्रेम करेगी

प्रेम के गीत रचेगी

 

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