जितनी लम्बी, हमारी नदियां/ उतना लम्बा, हमारा इतिहास

जितनी वाणी हमारे साथ उतनी भाषा का है प्रभाव जितना लम्बी, हमारी पगडंडी उतना लम्बा हमारा संघर्ष...

अतिथि लेखक

इतिहास

आलोका कुजूर

 

जितनी लम्बी, हमारी नदियां

उतना लम्बा, हमारा इतिहास

 

जितने ऊंचे, हमारे पहाड़

उतनी ऊंची, हमारी संस्कृति

 

जितने घना, हमारे जंगल

उतना घना, हमारा विश्वास

 

जितने कोमल, हमारे पलाश

उतना मीठा, हमारा राग

 

जितने फूटे , हमारे झरने

उतनी सुन्दर ,हमारी तान

 

जितने नगाड हमारे संग

उतना उंचा हमारे एलान

 

जितने थिरके पांव हमारे

 उतना एकता का है भाव

 

जितने रंग हैं  फूलों में

उतना मिट्टी की है खुशबू

 

जितनी वाणी हमारे साथ

उतनी भाषा का है प्रभाव

 

जितना लम्बी, हमारी पगडंडी

उतना लम्बा हमारा संघर्ष

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