'तेरी गल्ल्याँ' : मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा

नाटक एकदम समाज के उस वर्ग को अभियुक्त बना देता है जो अपने बच्चों पर धन दौलत उपहारों को लुटाकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ लेता है....

'तेरी गल्ल्याँ' : मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा

'तेरी गल्ल्याँ' (तेरी बातें) नाटक समीक्षा-

शमशाद इलाही शम्स

ब्राम्पटन (कनाडा) 20 अगस्त।   

साहित्य जगत में कविता यदि समाज का दिल है तो कहानी मस्तिष्क और नाटक इस दोनों तत्वों का योग, जिस समाज में इसका अभाव हो तो समझो उसे लकवा मार गया है.

पंजाबी आर्ट एसोसिएशन टोरंटो ने कल शाम पीयर्सन थियेटर ब्राम्पटन में एक नाटक 'तेरी गल्ल्याँ' (तेरी बातें) के दो शो किये.

पाली भूपेंदर सिंह के लिखे नाटक जिसे सरबजीत सिंह अरोरा ने निर्देशित किया,  जगविंदर जज के शानदार अभिनय के साथ उनके साथ लगभग एक दर्जन सहकर्मी कलाकारों ने साहित्य के इस महायज्ञ में प्रवासी सिख समुदाय से जुडी समस्याओं की भावपूर्ण आहूति दी जिसे हाउसफुल दर्शकों ने यह साबित किया कि इस समाज में स्वस्थ होने के लगभग सारे गुण मौजूद हैं.

ब्राम्पटन पिछले दो सालों से पंजाब से आये छात्रों और उनसे जुडी समस्याओं का केंद्र बन चुका है। लड़ाई झगड़े और हत्याओं तक पहुँच चुकी वारदातों पर ख्यातिप्राप्त नाटककार पाली भूपेन्द्र सिंह की कलम चली, जिसमें पंजाब से लेकर कनाडा तक बसे सिख समुदाय की सामाजिक, आर्थिक समस्याओं की पैनी पड़ताल साफ़ नज़र आती है.

नाटक की शुरुआत एक नौजवान लडके से होती है, जिसे पुलिस पकड़ कर थाने में पूछताछ के लिए लाती है. लडके पर अपनी कार से एक नौजवान को टक्कर मार कर मारने का मामला है. बहुत पूछताछ करने पर भी लड़का एक हिंसक बेचैनी के साथ कुढ़ता हुआ खामोश रहता है। अपनी वकील मां के आने पर रोता है। वकील मां पुलिस के हत्या के आरोप को महज दुर्घटना साबित करने पर तुली रहती है.

वारदात के वक्त आरोपी लडके के साथ उसका छात्र दोस्त कार में होता है उससे पूछताछ होती है। उसकी बातों से आरोपी लडके के चरित्र की क्रमश: परत दर परत खुलती है.

लेखक बड़ी कुशलता से एक नकारात्मक चरित्र को दर्शकों की संवेदनाओं का केंद्र बना कर उसे हीरो बना देता है.

बारहाल पूछताछ के गंभीर संवादों के क्रम में आरोपी लड़का अपने अपराध को कबूल कर लेता है कि वह दुर्घटना नहीं थी क़त्ल था, लेकिन क़त्ल उसने खुद नहीं उसके बाप ने किया है, जो घटना के वक्त 80 किलेमीटर दूर अपने स्टोर पर काम में व्यस्त था.

ये लड़का अपने माता पिता की इकलौती संतान है। मां वकील, बाप दुकानदार घर में किसी ऐश आराम की कोई कमी नहीं, जन्मदिन पर बाप अपने लडके को महंगी कार देता है. लडके का दिल अपने घर में नहीं लगता, वह अपने छात्र दोस्त के बेसमेंट में जाकर खूब बोलता, खूब गाता और गिटार बजाता लेकिन घर में उसका दिल नहीं लगता.

क़त्ल का आरोप अपने पिता पर लगा कर वह दर्शकों में किसी क्राइम थ्रिलर की झनझनाहट पैदा करता है. सामाजिक मनोविज्ञान की परतें खुलती हुई दर्शकों को एक बड़े सच के सामने नंगा कर देती हैं. नाटक एकदम समाज के उस वर्ग को अभियुक्त बना देता है जो अपने बच्चों पर धन दौलत उपहारों को लुटाकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ लेता है.

लडके का बाप एक संवाद में यह दर्दनाक आत्मस्वीकृति करते हुए कहता है, "मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा."

खूबसूरत मंच सज्जा, लाइट मैनेजमेंट, हास्य और पार्श्व में चलते बेहतरीन संगीत के साथ गीत नाटक को शुरू से अंत तक रोचक बनाये रखने में कामयाब है.

नाटककार ने बड़ी ख़ूबसूरती के साथ भारत से आये छात्रों की समस्याओं को भी बेहद भावपूर्ण मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर उन लोगों पर सफल प्रहार करता है जो उन्हें 'हम' से 'वह' बता कर सामाजिक समरसता को तोड़ने का प्रयास करते हैं.

यहाँ पंजाबी आर्ट एसोसिएशन टोरंटो के बारे में जिक्र करना इसलिए जरुरी है कि यह संस्था पिछले २६ सालों से एक सजग संस्कृति रक्षक की भूमिका अदा कर रही है, जिसके सदस्यगण अपनी मसरूफ जिन्दगी से बेशकीमती समय और अपनी जेबों से पैसा खर्च कर समाज को साहित्य के नगीने लुटाने में यकीन रखते हैं. वयोवृद्ध कामरेड जसपाल रंधावा के सुपुत्र कामरेड कुलदीप रंधावा इस संस्था के सतून हैं.

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