संघ के घर में प्रणब मुखर्जी ने संघ प्रमुख सहित स्वयंसेवकों को पढ़ाया राष्‍ट्र, राष्‍ट्रवाद, देशभक्‍ति, गाँधी और नेहरू का पाठ

हिन्दू राष्ट्र के संघ के अलगाववादी कंसेप्ट पर की चोट, कहा राष्‍ट्रवाद किसी धर्म या भाषा से नहीं बंधा...

हिन्दू राष्ट्र के संघ के अलगाववादी कंसेप्ट पर की चोट, कहा राष्‍ट्रवाद किसी धर्म या भाषा से नहीं बंधा

नई दिल्ली 7 जून। कांग्रेस की परंपरा में रचे बसे दिग्गज नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सहिष्णुता, एकता तथा विविधता को भारत की सबसे बड़ी पहचान बताते हुए आज कहा कि हमें ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना है जहां लोगों के भीतर डर नहीं हों और सब एकजुट होकर देश की तरक्की के लिए काम करें।

श्री मुखर्जी ने महाराष्ट्र के नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) मुख्यालय में संघ शिक्षा वर्ग के वार्षिक समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि हमारे संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं और हमारी प्राचीन तथा गौरवशाली संस्कृति ने भी हमें एक सूत्र में बंधे रहने की शिक्षा दी है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को सबसे बड़ा हथियार बनाया और कहा कि था कि राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं होना चाहिए। आधुनिक भारत के निर्माता पंडित नेहरू ने भी सबको मिलकर साथ रहने और आगे बढ़ने की शिक्षा दी है।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के राष्ट्रवाद में वैश्विकता की भावना है। हमने दुनिया को वसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र दिया है। हमारे राष्ट्रवाद में पूरी दुनिया के सुख की कामना की गयी है। भारत हमेशा एक खुली सोच का समाज रहा है और इसका प्रमाण हमारे धर्मग्रंथ और हमारी संस्कृति में है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि 5000 साल से कोई हमारी एकता को नहीं तोड पाया।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष के समारोह में पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हम पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह देखते हैं और सबों की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं। उन्‍होंने कहा कि विविधता में एकता हमारी ताकत है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन के बाद पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी संबोधन के लिए आए। श्री मुखर्जी ने कहा कि आज मैं राष्‍ट्र, राष्‍ट्रवाद, देशभक्‍ति पर अपनी बात आपके साथ साझा करूंगा।

हिन्दू राष्ट्र के संघ के कंसेप्ट पर चोट

अपने संबोधन में प्रणब मुखर्जी ने भारत के इतिहास, उसकी संस्‍कृति, धर्म, भाषा, प्रांत सभी का जिक्र किया। भारत की विशालता का जिक्र करते हुए डॉ. मुखर्जी ने कहा कि भारत हमेशा से खुला समाज रहा है, जो यहां आया वह यहीं का होकर रह गया। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर राष्‍ट्र की परिभाषा गलत है, वसुधैव कुटुंबकर भारत का मंत्र रहा है।

अपने संबोधन में डॉ. मुखर्जी ने कहा कि कॉलोनियन सिस्‍टम ने यहां कब्‍जा जमाया। उन्‍होंने अंग्रेजों के आगमन और उसके विस्‍तार की चर्चा की।

डॉ. मुखर्जी ने कहा कि तीन युद्ध के बाद ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने देश के एक बड़े भू-भाग पर कब्‍जा कर लिया। इसने एक एकीकृत शासन व्‍यवस्‍था स्‍थापित किया। इसका संचालन गवर्नर जनरल के जरिए होने लगा।

अपने संबोधन में डॉ. मुखर्जी ने भारत के व्‍यापार और उसके विस्‍तार की चर्चा की। यहां के धर्म और उसके प्रसार की चर्चा की। डॉ. मुखर्जी ने भारत के ऐतिहास शिक्षण स्‍थल का जिक्र किया और कहा कि इस मामले में भारत हरदम समृद्ध रहा हैय़ इस समारोह में बुलाने के लिए डॉ. मुखर्जी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत का आभार जताया।

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हमारे राष्ट्र को धर्म, हठधर्मिता या असहिष्णुता के माध्यम से परिभाषित करने का कोई भी प्रयास केवल हमारे अस्तित्व को ही कमजोर करेगा।

उन्होंने कहा कि भारत में हम अपनी ताकत सहिष्णुता से प्राप्त करते हैं और बहुलवाद का सम्मान करते हैं, हम अपनी विविधता का उत्सव मनाते हैं।

प्रणब मुखर्जी ने कहा, 'भारत एक पुरानी सभ्‍यता और समाज है और विविधता में एकता हमारी ताकत है। हमारी राष्‍ट्रीय पहचान कई चीजों से बनी।' उन्‍होंने कहा कि राष्‍ट्रवाद किसी धर्म या भाषा से नहीं बंधा।

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