जानिए क्यों अदालत में नहीं टिक पाएगा गुजरात में मोदी के मुख्य सचिव रहे अचल कुमार जोती का फैसला

क्या है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ का पद) से जुड़ा पूरा विवाद?..... अब क्या है विवाद और क्या है आप का पक्ष ...जो काम शिवराज सिंह के लिए नैतिक है वो केजरीवाल के लिए अनैतिक कैसे है ?...

हाइलाइट्स

राजस्थान का तो मामला तो और भी ज्यादा दिलचस्प है। जब वहां अशोक गहलोत की कांग्रेसी सरकार थी तब आज के मंत्री कालीचरण सराफ, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी और विधायक राजपाल सिंह शेखावत ने वर्ष 2012 में विधायक रहते हुए एक याचिका दायर की थी।

चुनाव आयोग ने दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को तगड़ा झटका दिया है। चुनाव आयोग ने 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट' होल्डिंग के मामले में आप के 20 विधायकों को अयोग्य करार दिया है और इसकी सिफारिश राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को भेज दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कमीशन ने राष्ट्रपति को भेजी सिफारिश में कहा कि संसदीय सचिव होने के नाते उनके पास लाभ का पद है और इसलिए वे दिल्ली विधानसभा में विधायक पद से अपात्र ठहराए जाने के योग्य हैं।

अब चुनाव आयोग की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति को अंतिम फैसला लेना है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात में मोदी के मुख्य सचिव रहे मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती का यह फैसला अदालत में नहीं टिक पाएगा। इसे जानने के लिए कुछ पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हमारा ये शोध पढ़ें -

क्या है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ का पद) से जुड़ा पूरा विवाद?

ऐसा नहीं है कि जनप्रतिनिधियों पर इस तरह की कोई पहली कार्रवाई हुई है।

इससे पहले निर्वाचन आयोग समाजवादी पार्टी की राज्य सभा सदस्य जया बच्चन को उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद की अध्यक्ष के रूप में लाभ के पद पर होने के आधार पर संसद की सदस्यता के अयोग्य घोषित किए जाने की सिफारिश कर चुका है।

इसके बाद जया बच्चन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करके केन्द्रीय और राज्य सरकारों में लाभ के पद को परिभाषित किए जाने की गुजारिश की थी।

यूपीए-1 के समय 2006 में 'लाभ के पद' का विवाद खड़ा होने की वजह से सोनिया गांधी को लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ना पड़ा था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 (1)(क) के अनुसार,

“कोई व्यक्ति संसद् के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद् ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है।”

संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (ए) के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी और पद पर नहीं हो सकते हैं, जहा अलग से वेतन, भत्ता या बाकी फायदे मिलते हों।

-संविधान के अनुच्छेद 191 (1)(ए) और पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के सेक्शन 9 (ए) के तहत भी सासदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है।

 -संविधान के अनुच्छेद 191 (1)(ए) और पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के सेक्शन 9 (ए) के तहत भी सासदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है। संविधान की गरिमा के तहत लाभ के पद पर बैठा कोई व्यक्ति उसी वक्त विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता।

लाभ के पद पर बहस

बता दें कि ‘लाभ के पद’ की व्याख्या स्पष्ट नहीं है। संविधान में या संसद द्वारा पारित किसी अन्य विधि में भी “लाभ के पद” को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है, हालाँकि उसका उल्लेख कई बार हुआ है।

इसीलिए ‘लाभ के पद’ की स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा किए जाने की आवश्यकता है और यही कारण है कि इस विषय पर संविधान विशेषज्ञों के बीच एक राय नहीं है।

संविधान में दिए गए स्पष्टीकरण के मुताबिक, “कोई व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का मंत्री है।”

शिबू सोरेन का मामला

जुलाई, 2001 में उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन की संसद सदस्यता इस आधार पर रद्द कर दी थी कि राज्य सभा में निर्वाचन हेतु नामांकन पत्र दाखिल करते समय वह झारखंड सरकार द्वारा गठित अंतरिम झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद के अध्यक्ष के रूप में लाभ का पद धारण कर रहे थे।

अपने निर्णय में न्यायालय ने संबंधित संवैधानिक उपबंधों की व्याख्या करते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 102(1)(क) तथा अनुच्छेद 191(1)(क) का उद्देश्य विधायिका के सदस्यों के कर्तव्य और हित की बीच टकराव की आशंका को खत्म करना या उसे कम करना है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विधायिका के संबंधित सदस्य कार्यपालिका से आर्थिक लाभ पाने के कारण उसके अनुग्रह के अधीन नहीं आएँ, जो उन्हें संसद सदस्य/ विधायक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय कार्यपालिका के प्रभाव के वश में ला सकता है।

उक्त निर्णय से यह बात स्पष्ट हुई कि संसद सदस्य/ विधायक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय कार्यपालिका के प्रभाव के वश में न लाने के लिए यह व्याख्या है। अब विवाद इस पर है कि यदि संसद सदस्य/ विधायक लाभ के पद पर रहते हुए वेतन, भत्ता आदि नहीं ले रहा है तो वह संसद या विधानमंडल की सदस्यता के योग्य रह जाता है कि नहीं ?

उक्त निर्णय से एक और बात स्पष्ट हुई कि यदि किसी पद को विधि द्वारा स्पष्ट रूप से मंत्री पद के समतुल्य घोषित किया गया हो तो उसे धारण करने वाले व्यक्ति को लाभ का पद धारण करने के आधार पर निरर्हत नहीं समझा जाएगा।

कब अयोग्य होगा सासंद/ विधायक

'लाभ के पद' की व्याख्या के लिए संयुक्त संसदीय समिति का भी गठन हो चुका है।

16 मई, 2006 को लोकसभा में लाभ के पद की व्याख्या के लिए एक विधेयक पारित किया गया था। तब तत्कालीन संप्रग सरकार और विपक्ष राजग में जबर्दस्त तू-तू,मैम-मैं हुई थी। उस के बाद यह विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ था। तब इसमें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सहित करीब 45 पदों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखा गया।

लेकिन यह विधेयक भी “लाभ के पद” संवैधानिक शब्द की व्याख्या नहीं करता। इससे पहले लोकसभा में 'ऑफिस ऑफ प्राफिट' की मुकम्मल परिभाषा के संसद के दोनों सदनों की 15 सदस्यीय एक संयुक्त संसदीय कमिटी गठित की थी। लेकिन बाद में यह कमेटी और विधेयक दोनों ही किसी परिणाम पर नहीं पहुंच पाए।

एक अन्य सूचना के अनुसार  लाभ के पद संबंधी संसद की 15-सदस्यीय संयुक्त समिति मे यह बात उठी कि किसी पद को लाभ का मानने या न मानने के मामलों का निर्धारण जिन मानदंडों के आधार पर करती है उनमें यह देखा जाता है कि ...

क्या उस पद पर किसी व्यक्ति को नियुक्त करने और पद से हटाने के मामले में तथा उस पद के कार्य-निष्पादन और कार्यकरण के मामले में सरकार का नियंत्रण रहता है; क्या उस पद को धारण करने वाले व्यक्ति को संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 की धारा 29(क) में परिभाषित ‘प्रतिपूरक भत्ता’ के अतिरिक्त कोई पारिश्रमिक दिया जाता है; क्या उस निकाय के पास कार्यपालिका, विधायिका अथवा न्यायपालिका की शक्तियों का प्रयोग करने अथवा निधियों के संवितरण, भूमि के आवंटन, लाइसेंस आदि जारी करने की शक्ति है; क्या उस पद को धारण करने से व्यक्ति संरक्षण के माध्यम से प्रभाव या शक्ति का प्रयोग कर सकता है ?

यदि इनमें से किसी भी मानदंड का उत्तर सकारात्मक है तो उस पद को धारण करने वाला व्यक्ति संसद सदस्य बनने के लिए निरर्हत यानी अयोग्य है।

अब क्या है विवाद और क्या है आप का पक्ष

संसद/ विधानमंडल को यह अधिकार है कि वह किसी भी पद की निरर्हता पूर्वव्यापी प्रभाव से हटा सके अथवा लाभ का पद होने के बावजूद उसे निरर्हता के अपवाद के दायरे में शामिल कर सके। इसी आधार पर दिल्ली विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया था, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अस्वीकार कर दिया था। अब विवाद का विषय यह है कि विधानसभा प्रस्ताव पारित कर चुकी है भले ही राष्ट्रपति ने इस पर अपने हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन यह अभी भी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा है और चुनाव आयोग विधानसभा के अधिकार को बाईपास नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में पहले ही कह चुका है कि ये विधायिका का अधिकार है, जिसमें वो कोई भी अध्यादेश को पारित कर उसे कानून का रूप दे सकती है। इससे पहले हाई कोर्ट उसे नहीं रोक सकता। इसलिए दिल्ली विधानसभा के प्रस्ताव की चुनाव आयोग अनदेखी नहीं कर सकता।

इसी प्रकार निर्वाचन आयोग ने समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह को उत्तर प्रदेश विकास परिषद के अध्यक्ष के रूप में लाभ का पद धारण करने के कारण राज्य सभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने के मामले में नोटिस जारी किया था व उधर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शहरी विकास मंत्री आज़म खान को उत्तर प्रदेश जल निगम के अध्यक्ष के रूप में लाभ के पद पर होने के कारण अयोग्य घोषित किए जाने का मामला राज्यपाल ने निर्वाचन आयोग के पास भेजा। लेकिन समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा उत्तर प्रदेश विधायिका (निरर्हता निवारण) संशोधन विधेयक, 2006 को जनवरी, 2003 से प्रभावी बनाते हुए पारित करा लिया है।

अब आम आदमी पार्टी के भी यही तर्क हैं। किसी भी विधायक ने वेतन-भत्ता नहीं लिया, लाइसेंस-पट्टा देने का अधिकार नहीं था और विधानसभा इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर चुकी है।

दूसरी बड़ी बात कि दिल्‍ली सरकार के प्रवक्‍ता और मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मीडिया सलाहकार नागेंद्र शर्मा ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा नियुक्‍त किए गए चुनाव आयोग ने विधायकों का पक्ष जाने बिना सिफारिश की है, जो पक्षपातपूर्ण है और यह सिफारिश अदालत में नहीं टिकेगी। जाहिर सी बात है कि प्रतिवादी का पक्ष सुने बिना चुनाव आयोग कोई फैसला नहीं सुना सकता क्योंकि यह प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।

हम्माम में हैं सब नंगे

इस प्रकरण में केवल आम आदमी पार्टी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस हम्माम सब नंगे हैं। नैतिकता का तकाजा और कानून सभी के लिए एक सा है।

यूपीए सरकार में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सहित करीब 45 पदों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखा गया। सवाल है कि जो अजय माकन आज केजरीवाल से त्यागपत्र मांग रहे हैं, तब उन्होंने मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी से इस्तीफा क्यों नहीं माँगा?

इसी प्रकार जब ट्राई के पूर्व अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रधान सचिव नियुक्त किया गया तब सरकार ने उस कानून को संशोधन करने के लिए अध्यादेश लागू किया, जो मिश्रा को इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करने से रोक सकता था।

बात मध्य प्रदेश की करें जहां भाजपा की सरकार है, तो मंत्री पारस जैन लाभ के पद के दायरे में आने वाली संस्था स्काउट गाइड के मुख्य आयुक्त हैं वहीं एक अन्य राज्य मंत्री दीपक जोशी उपाध्यक्ष हैं। दोनों मंत्री जनवरी, 2016 से इस पद पर हैं।

मप्र में वर्ष 2007 में जब यह एक बड़ा मुद्दा बना था, तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाभ के इन पदों निगम-मंडलों व फेडरेशन समेत अन्य संस्थाओं की संख्या बढ़ाकर 100 से ज्यादा कर दी थी। तो जो काम शिवराज सिंह के लिए नैतिक है वो केजरीवाल के लिए अनैतिक कैसे है ?

छत्तीसगढ़ में भी रमन सिंह सरकार ने संसदीय सचिव बनाए हुए हैं। तो कानून तो दिल्ली और छत्तीसगढ़ के लिए एक ही होगा न ?

राजस्थान का तो मामला तो और भी ज्यादा दिलचस्प है। जब वहां अशोक गहलोत की कांग्रेसी सरकार थी तब आज के मंत्री कालीचरण सराफ, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी और विधायक राजपाल सिंह शेखावत ने वर्ष 2012 में विधायक रहते हुए एक याचिका दायर की थी।

याचिका में कहा गया कि संविधान के हिसाब से राज्य में कुल विधानसभा सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक मंत्री नहीं हो सकते। संसदीय सचिव बनाने का प्रावधान विदेशी है, इन्हें शपथ राज्यपाल की बजाय मुख्यमंत्री द्वारा ही दिलाई जाती है।

याचिका में कहा गया कि कहीं भी मंत्रियों में संसदीय सचिव को शामिल नहीं किया है। 1968 में राज्य सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि संसदीय सचिव मंत्री नहीं हो सकता और न ही उसे स्वतंत्र रूप से मंत्री का चार्ज दिया जा सकता है।

याचिका में कहा गया कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति जनता की जेब पर बोझ है। याचिका के अनुसार संसदीय सचिव को मंत्री के समान सुविधा, प्रोटोकॉल, विशेषाधिकार और अधिकार दिए जाते हैं।

मजे की बात यह है कि जो संसदीय सचिव अशोक गहलोत की सरकार में विदेशी थे और केजरीवाल की सरकार में अनैतिक हैं, वहीं भाजपा की राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार में शुद्ध देशी और नैतिक हो गए। http://cmoffice.rajasthan.gov.in/hindi/Parliamentary_Secretaries_hindi.aspx लिंक पर देखें कैसे राजस्थान सरकार ने 10 संसदीय सचिवों को कक्ष भी आवंटित किए हैं।

इसीलिए गुजरात में मोदी के मुख्य सचिव रहे मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती का यह फैसला अदालत में नहीं टिक पाएगा।

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