यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है 'देह ही देश'

बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना भीषण सामाजिक विकृति...

यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है 'देह ही देश'

बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना भीषण सामाजिक विकृति

जेएनयू में परिचर्चा

फोटो और रिपोर्ट - चंचल कुमार

नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध पत्रकार और सी एस डी एस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक प्रो अभय कुमार दुबे ने हिंसा और बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को भीषण सामाजिक विकृति बताया है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में "कड़ियाँ" संस्था द्वारा क्रोएशिया croatia (hrvatska) प्रवास पर आधारित प्रो. गरिमा श्रीवास्तव की पुस्तक "देह ही देश" पर आयोजित परिचर्चा में श्री दुबे कहा कि हमारे देश में मोलस्ट्रेशन की विकृतियों की भीषण अभियक्तियाँ निश्चय ही चौंकाने और डराने वाली हैं, जिनकी तरफ हमारा ध्यान 'देह ही देश' को पढ़ते हुए जाता है।

उन्होंने कहा कि 'देह ही देश' को एक डायरी समझना भूल होगा। इसमें दो सामानांतर डायरियां हैं, पहली वह जिसमें पूर्वी यूरोप की स्त्रियों के साथ हुई ट्रेजडी दर्ज है और दूसरी में भारत है। यह वह भारत है जहाँ स्त्रियों के साथ लगातार मोलेस्टेशन-Molestation होता है और उसे दर्ज करने की कोई कार्रवाई नहीं होती।

यात्राओं से जोखिम उठाने की प्रेरणा

Inspiration to take risks from visits

परिचर्चा में हिन्दू कालेज के डॉ पल्लव ने कहा कि यह पुस्तक संस्मरण, डायरी, रिपोर्ताज, यात्रा आख्यान और स्मृति के अंकन का मंजुल सहकार है। उन्होंने इसे यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करने वाली जरूरी किताब बताते हुए कहा कि शुद्धता की उन्मादी प्रवृत्ति के विरुद्ध 'देह ही देश' में नये जमाने की स्त्री की छटपटाहट है।

बढ़ती जा रही है कट्टर राष्ट्रवाद की अवधारणा

The concept of radical nationalism is increasing

राजधानी कॉलेज के डॉ राजीव रंजन गिरि ने कहा कि युद्ध इतिहास और कालखंड में तो समाप्त हो जाते हैं लेकिन भोगने वाले के चेतन और अवचेतन मन मे ताउम्र बना रहता है।

उन्होंने कहा कि एक प्रकार के कट्टर राष्ट्रवाद की अवधारणा बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप युद्ध नीति के तौर पर बलात्कार की नीति को बढ़ावा मिल रहा है।

सुप्रसिद्ध पत्रकार भाषा सिंह ने अपने कहा कि "देह ही देश" सुलगते सच से साक्षात्कार कराती है और युद्ध तथा उन्माद के इस समय में अपने शीर्षक को सार्थक करती है ।

परिचर्चा में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. गोविंद प्रसाद, प्रो. रमण प्रसाद सिन्हा , प्रो. राजेश पासवान सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी मौजूद थे।

आयोजन के अंत में श्रोताओं के सवालों के जवाब भी वक्ताओं द्वारा दिए गए।

ज्ञातव्य है कि राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक 2018 की बेस्ट सेलर साबित  हुई है। 

कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बृजेश यादव ने किया। अंत में एम ए द्वितीय वर्ष के छात्र चंचल कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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