भाजपा की पुरजोर कोशिश है यूपी में न बनने पाए महागठबंधन, भाजपा को सपा से है आस

महागठबंधन होगा या नहीं होगा इसी पालने में झूलते सियासी दल व जनता...

अतिथि लेखक
भाजपा की पुरजोर कोशिश है यूपी में न बनने पाए महागठबंधन, भाजपा को सपा से है आस

महागठबंधन होगा या नहीं होगा इसी पालने में झूलते सियासी दल व जनता

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। महागठबंधन को लेकर अगर कही उहापोह की स्थिति बनी हुई है तो वह देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में बनी हुई है। इसी राज्य से देश पर राज करने का रास्ता हमवार होता है। देखने में आया है कि जिस भी दल पर यह राज्य मेहरबान होता है वही दल देश की सियासत पर छा जाता है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यहाँ की जनता जिसे अपना प्यार व मोहब्बत देती है छप्पर फाड़कर देती है। 2014 के आमचुनाव में मोदी की भाजपा को दिल खोलकर सपोर्ट किया। ये बात अलग है जिन उम्मीदों को पाल कर मोदी की सरकार बनवाई थी देश की जनता ने, उसमें यूपी का भी अहम रोल था। 80 सीटों में से 73 मोदी की भाजपा की झोली में डाल दी थी पर वह उस पर खरी नहीं उतरी। झूठ के सिवा कुछ नहीं किया। ऐसा लोगों से बात करने पर पता चलता है अब उसी आँकड़े को पाने के लिए मोदी की भाजपा यह प्रयास कर रही है कि यूपी में महागठबंधन की सूरत न बने और विपक्ष की हरदम कोशिश है कि मोदी की भाजपा के विरूद्ध वोट बँट न पाए और हम एकजुट होकर मोदी की भाजपा को आसानी से हरा दे।

अभी हाल ही में संपन्न पाँच राज्यों के परिणामों से यह लग भी रहा था कि देश में मोदी की भाजपा के विरूद्ध सभी समान विचारधारा वाले दल एकजुट हो जाएँगे, परन्तु क्षेत्रीय दलों की अपने अस्तित्व की लडाई के चलते इसके बनने में अड़चनें आ रही है।

क्षेत्रीय दल जनता के दबाव के चलते महागठबंधन की बात तो कर रहे हैं, परन्तु दोमुँहे साँप वाली स्ट्रेटेजी पर चल रहे हैं। यह तो आने वाले दिनों में साफ हो पाएगा कि सिर्फ़ गठबंधन होगा या महागठबंधन होगा। जनता का मानना है कि सियासी दल गठबंधन करें या महागठबंधन करें जनता की स्ट्रेटेजी भी कुछ मायने रखती है। ज़्यादातर लोगों का कहना है कि हमें यह देखना है कि केन्द्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वोट किसे किया जाए। कौन केन्द्र में सरकार बना सकता है, केन्द्र में सरकार बनाने के लिए दूसरा कौन सा दल है। क्षेत्रीय दलों को बढ़ावा देने से सरकारें नहीं चलतीं वह ब्लैकमेलिंग करने पर उतारू रहते हैं, इस लिए सीधे उसी पार्टी को चुनना चाहिए जो सरकार बनाने में सक्षम हो। जनता के पास एक यह भी उपाय है वह इस पर भी अमल कर सकती है। इस राज्य की जनता विधानसभा के चुनाव में अपना अलग नज़रिया रखती है और लोकसभा चुनाव में अलग नज़रिया रखती है, उसने यह नज़रिया कई बार साबित भी किया है।

इस बार से पहले कोई गठबंधन या महागठबंधन की बात नहीं होती थी 2004 व 2009 के आम चुनाव में यूपी की जनता ने सीधे कांग्रेस को मज़बूत किया, हालाँकि 2004 में तो कांग्रेस को इतना लाभ नहीं हुआ लेकिन फिर भी बिलकुल दो से दस सीट दीं और 2009 में इसी प्रदेश ने कांग्रेस को 22 सीटें देकर कांग्रेस को मज़बूत करने का काम किया।

अब हम बात करते हैं यहाँ की सियासी भौगोलिक स्थिति की। दलित और मुसलमान यहाँ संख्या बल के हिसाब से सबसे ज़्यादा हैं। 21% दलित व 19% मुसलमान हैं। दलितों में कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जो भाजपा को ही पसंद करती हैं, इस लिए इसको घटाकर 17% ही माना जाता है, 4% दलित वोट खिसक जाता है। सात से आठ प्रतिशत वोट यादव जाति का माना जाता है, हालाँकि 2014 के चुनाव में यादव भी मोदी के मकड़जाल में फँस गया था, जिसकी वजह से सपा कंपनी को मात्र पाँच सीटों पर सिमटना पड़ा था, क्योंकि उसके पास वोट के रूप में सिर्फ़ मुसलमान ही रह गया था। जिस तरह आज के हालात हैं उससे यही लगता है कि 45% वोट सीधे मोदी की भाजपा के ख़िलाफ़ लामबंद खड़ा है। यह बात अलग है कि महागठबंधन होने पर यह वोट बढ़कर 50% को पार कर जाएगा और गठबंधन होने पर यह 45% से कम तो हो सकता है, बढ़ने की संभावना न के बराबर है, इसकी कई वजह हैं।

पहली वजह मोदी की भाजपा को पसंद नहीं करने वाला वोट सपा व बसपा को भी पसंद नहीं करता है, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है। सपा और बसपा को वह जातिवादी पार्टी मानता है, बल्कि पार्टी ही नहीं मानता, वह इन दोनों पार्टियों को प्राईवेट लिमिटेड कंपनी मानता है। इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है। सपा कंपनी का पारिवारिक झगड़ा इसकी दलील है। चाचा भतीजे की वर्चस्व की जंग सबने देखी है। अगर पार्टी होती तो इतने दिन यह झगड़ा न चलता, कभी का बाहर निकाल फेंक दिया जाता।

मुसलमान ने कई बार सपा कंपनी को सत्ता का स्वाद चखाया, लेकिन वह अपने परिवार को मज़बूत करने के अलावा कुछ नहीं करती, इसके बाद अपनी जाति को मज़बूत करती है। मुसलमान इसकी बुक में सिर्फ़ इवीएम से ज़्यादा कुछ नहीं है। यही हाल बसपा का भी है, लेकिन वह उतनी दोषी नहीं है क्योंकि मुसलमान ने जितनी मोहब्बत सपा के प्रति दिखाई उतनी बसपा के प्रति नहीं दिखाई। यह भी सच्चाई है।

कहने का मतलब है एक चुनाव में भी कोई यह नहीं बता सकता कि मुसलमान ने बसपा को एकमुश्त वोट दिया है। अगर कहीं मुसलमान प्रत्याशी है, वहाँ वोट दिया, उसे वोट दिया नहीं माना जाता, हालाँकि वोट दिया परन्तु उसमें हमारा अपना मफाद भी शामिल है। इस लिए वोट दिया नहीं माना जाता है। वोट देना उसे माना जाता है कि अगर हम वोट दे रहे उसकी पार्टी को उससे चाहे कोई भी प्रत्याशी खड़ा हो। हमने यह नहीं देखा। उसे वोट देना माना जाता है जैसे मुसलमान सपा को या कभी कांग्रेस को देता था।

ख़ैर हम महागठबंधन या गठबंधन की बात कर रहे थे। सियासी दलों पर महागठबंधन करने के लिए जनता का दबाव है और उन्हें अपने सियासी कैरियर का भी सोचना है। अगर समय रहते सही फ़ैसला नहीं लिया तो बहुत भारी सियासी नुक़सान उठाना भी पड़ सकता है। सबसे ज़्यादा ख़तरा सपा कंपनी को है, उसके परिवार की वर्चस्व की लडाई भी उसको नुक़सान पहुँचाने को तैयार बैठी है। शिवपाल सिंह यादव सियासत के मँझे हुए खिलाड़ी हैं, उन्हें कमज़ोर आँकना सपा कंपनी को कहीं भारी न पड़ जाए। महागठबंधन होगा या गठबंधन यह तो अभी साफ नहीं हो पाया है, जैसे-जैसे चुनाव का टाइम नज़दीक आता जाएगा, सब कुछ सामने आ जाएगा, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि 2019 का चुनाव 2014 जैसा तो होने नहीं जा रहा। यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है।

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