युद्ध की विभीषिका है "अंधा युग"

आज युद्ध आमने-सामने तीर तलवार से नहीं हो रहे हैं। आज इंसान खुद अपने आपको जला रहा हैं ईर्ष्या और जलन की आग में,

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-05-14 12:33:08

युद्ध की विभीषिका है "अंधा युग"

आकाश नागर

रुद्रपुर। काफी दिनों बाद शैलनट की बेहतरीन प्रस्तुति देखने को मिली। महाभारत काल में हुए युद्ध के बाद जो लोग बच गए थे वह पश्चाताप की आग में जलते और ज़िंदा रहकर भी पल-पल मरते हुए दिखे। ठीक आज की तरह।

आज युद्ध आमने-सामने तीर तलवार से नहीं हो रहे हैं। आज इंसान खुद अपने आपको जला रहा हैं ईर्ष्या और जलन की आग में, जो उसे अंदर ही अंदर तनाव, उच्च रक्तचाप और शुगर में सुलगा रहा हैं।

बहरहाल दो घंटे की रक्तरंजित महाभारत काल के बाद के गंभीर नतीजो की परिणति को बेहद ही अद्भुत और अनोखे अंदाज में प्रस्तुत करने पर पूरी टीम को दिल से बधाई। प्रत्येक पात्र ने अपने को महाभारत कालीन पात्रों में इतना ढाल दिया था कि पहचानना मुश्किल हो रहा था। नाटक का समय थोड़ा कम किया जा सके तो और भी बेहतर हो सकता है।

जेसिस स्कूल के भव्य और आलीशान आडिटोरियम ने नाटक के मंचन में चार चांद लगा दिए। रूपेश कुमार की आवाज सुनकर एक बार फिर मास्साब प्रताप सिंह जी की यादें जेहन में उभर आईं।

गांधारी के रूप में अपर्णा ने तो धृतराष्ट्र की भूमिका में रूपेश ने कमाल का अभिनय किया। दोनों में दांपत्य का सहज दायित्व निभाने और दुख दर्द को बांटने का अंदाज देखते ही बनता था।

सुधीर गोस्वामी ने अश्वत्थामा और सुनील पंत ने कृपाचार्य के साथ ही मन्नू मनोज भाई के याचक के रूप में याचना करने का रोल भी काफी असरदार रहा। सर्वजीत का कब्बाली से पार्श्व गायन का पहला प्रयोग मनमोहक लगा, लेकिन बाद में आडियंस द्वारा माईक से किरदारों की तारीफो में दो शब्द न बोलना मुझे अखरा। यह आयोजन समिति की भी कमी रही कि उन्होंने पात्र परिचय कराने के बाद दर्शक दीर्घा तक माईक नहीं पहुँचाया। हौसला अफजाई और मान - सम्मान ही तो रंगकर्मियो का सबसे बड़ा ईनाम होता है....

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