एक नई राजनीति की दस्तक : बदलाव के रास्ते पर है कांग्रेस

राहुल गांधी कांग्रेस को वापिस लेफ्ट टू सेंटर की तरफ तेजी से ले जा रहे हैं. पार्टी नेतृत्व की वो पीढ़ी जो इन पच्चीस सालो में केंद्र की राजनीति तक पहुंची है राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है....

अतिथि लेखक
एक नई राजनीति की दस्तक : बदलाव के रास्ते पर है कांग्रेस

राहुल गांधी कांग्रेस को वापिस लेफ्ट टू सेंटर की तरफ तेजी से ले जा रहे हैं.

प्रशांत टंडन

उन लोगो के लिए निश्चित ही एक अहम दिन है जो लखनऊ में कांग्रेस में शामिल हुये हैं साथ ही कांग्रेस के लिए भी ये एक नया प्रयोग है, एकदम नई शुरुआत है. तस्वीर में आप जिन्हे देख रहे हैं उनसे काफी लोग फेसबुक के जरिये परिचित भी होंगे.

तस्वीर में बायें तरफ अनिल यादव हैं, बीच में सदफ़ जाफ़र और दायीं तरफ शाहनवाज़ आलम - इन तीनों और इनके अलावा और भी बहुत से लोगो आज कांग्रेस की सदस्यता ली है. बात इन तीनों की जाये क्योंकि इनसे परिचित हूँ और इनका काम जानता हूँ. ये तीनों ऐक्टिविस्ट हैं और वामपंथी हैं.

इन तीनों को इसलिए बधाई कि इन्होने वक़्त की नब्ज़ को सुना और एक non conventional फैसला लिया. वामपंथियों, समाजवादियों और प्रगतिशील विचार रखने वालों ने पिछली पीढ़ी से गैर कांग्रेसवाद की ओढ़नी ले रखी है और उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं जबकि चुनौती सीधे सीधे फासीवाद की है सामने. बात अब ध्रुवीकरण से आगे निकल कर हिंसा के रास्ते संविधान और लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट के रूप में खड़ी है. ऐसे वक़्त में इन तीनों का कांग्रेस में शामिल होना काबिले तारीफ कदम है.

कांग्रेस बदलाव के रास्ते पर है. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल से पार्टी ने राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टि से दक्षिणपंथ की ओर रुख किया जो नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह के आते आते और मजबूत हुआ. इसी बदलाव के चलते कांग्रेस का परंपरागत वोट भी उनसे दूर चला गया.

राहुल गांधी कांग्रेस को वापिस लेफ्ट टू सेंटर की तरफ तेजी से ले जा रहे हैं. पार्टी नेतृत्व की वो पीढ़ी जो इन पच्चीस सालो में केंद्र की राजनीति तक पहुंची है राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. कांग्रेस के अंदर बदलाव की इस मुहीम में राहुल गांधी को अनिल यादव, शहनवाज़ आलम और सदफ़ जाफ़र जैसे ऐक्टिविस्ट पृष्ठभूमि के लोगो की बहुत ज़रूरत पढ़ेगी.

अनिल यादव लंबे समय से पत्रकार रहे हैं और रिहाई मंच से भी जुड़े रहे हैं और शानवाज़ रिहाई मंच के संस्थापकों में से रहे हैं और दशक से ऊपर अपने काम से रिहाई मंच ने बीसियों उन निर्दोष लोगो की लड़ाई लड़ी और जीती है जिन्हे पुलिस ने फर्जी मुकदमों में फसाया था. सदफ़ को फेसबुक के जरिये जानता हूँ. थियेटर और फिल्म में अभिनय के अलावा वो अन्याय के खिलाफ तमाम संघर्षों में आगे बढ़ कर शामिल रहीं हैं.

तीनों मित्रों को शुभकामनायें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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