मुख्य न्यायाधीश को बाबरी मस्जिद मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था - एसडीपीआई

अयोध्या मामले पर अदालत के बाहर हल निकालने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिया है, यह CJI जेएस खेहर का निजी प्रस्ताव है जो असाधारण और गंभीर प्रस्ताव है…...

हाइलाइट्स

बाबरी मस्जिद जैसे जटिल व विवादित मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से फैसला होना चाहिए - एसडीपीआई

नई दिल्ली। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने जोर देते हुए कहा है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि जैसे जटिल और विवादास्पद मामले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की ओर से फैसला किया जाना चाहिए जहाँ मुकदमा इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादास्पद फैसले के बाद पिछले कई सालों से लंबित है।

इस बारे में अपने बयान में एसडीपीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष ए सईद ने कहा है कि इस तरह के गम्भीर विवादास्पद मुद्दे को न्यायिक निर्णय के माध्यम से हल करना चाहिए, जिसकी निष्पक्षता का सभी पक्षों द्वारा सम्मान किया जाता है।

उन्होंने इस बात की ओर विशेष ध्यान कराते हुए कहा कि इस मामले में मुख्य न्यायाधीश द्वारा जो सुझाव दिया गया है वह उचित नहीं है, क्योंकि अतीत में इस मामले में 9 बार इस तरह के प्रयासों से किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली है।

श्री सईद ने आगे कहा कि अयोध्या मामले पर अदालत के बाहर हल निकालने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिया है, लेकिन यह मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर का निजी प्रस्ताव है जो असाधारण और गंभीर प्रस्ताव है। मुख्य न्यायाधीश को इस तथ्य को अच्छी तरह जानते हुए भी इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। यह मामला राजनीति से प्रभावित है क्योंकि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि के मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्र में उल्लेख किया था।

उन्होंने कहा कि सन 1949 में मुसलमानों ने अदालत के फरमान को मान कर नमाज पढ़ना रोक दिया था, लेकिन पक्षों ने अदालती फरमान का उल्लंघन करते हुए सन 1992 में बाबरी मस्जिद को अवैध रूप से ध्वस्त कर दिया था।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर देकर कहा है कि सरकार क़ानून के शासन का सम्मान करती है वही इस विवाद को पूरी तरह समाप्त कर सकती है।

एसडीपीआई राष्ट्रीय अध्यक्ष ए सईद ने खासतौर से कहा कि मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट इस सच्चाई से परिचित है और इस तथ्य से भी परिचित है कि कानूनी तौर पर विवादित स्थल में कोई मंदिर नहीं हो सकता है। वास्तव में भी वहां कोई मंदिर नहीं था, इसलिए मुख्य न्यायाधीश की पेशकश मुसलमानों को बहलाने या समझाने की कोशिश है, कि या तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरह एक गलत फैसला होगा और अगर वह सही फैसला भी देंगे तो इस फैसले को भी भाजपा चुनावी हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करेगी और इस अवसर का उपयोग करके शायद गृहयुद्ध शुरू करेगी और हिंदू राष्ट्र की घोषणा करेगी।

एसडीपीआई राष्ट्रीय अध्यक्ष ए सईद ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा है कि कुछ हलकों में यह कहा जा रहा है कि विवादास्पद मामले में जो प्रस्ताव पेश किया जा रहा है वह एक संगठित नाटक है क्योंकि इस मामले में ना ही नियमित निर्दिष्ट सुनवाई हो रही और न ही इस मामले में शामिल पक्ष सुनवाई के दौरान मौजूद रहे हैं। हालांकि भाजपा के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत से विजयी होने पर पार्टी कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं और वे हिंदुत्व के एजेंडे को उजागर करने को उतावले हो रहे हैं। इस बात की प्रबल आशंका है कि वार्ता के प्रयासों के दौरान मुस्लिम प्रतिनिधियों को उनके जान-माल की सुरक्षा के बदले बाबरी मस्जिद मामले में उनके दावों को वापस लेने के लिए मजबूर किया जाएगा।

इस बीच एसडीपीआई राष्ट्रीय अध्यक्ष ए सईद ने कहा है कि आज के युवा ‘भक्त‘ को बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मुद्दे का पूरा ज्ञान नहीं है और उन्हें गुमराह किया जा रहा है। कुछ अज्ञात कारणों के आधार पर मीडिया भी इस मामले में इससे पहले की और अन्य तथ्यों को जनता के सामने लाने से परहेज कर रही हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वस्त करने से पहले राम के जन्मस्थान का दावा करते हुए 50 से अधिक मंदिर निर्माण किए जा चुके हैं। मीडिया की जि़म्मेदारी है कि वह हमारे देश के युवा पीढ़ी को इन सभी तथ्यों से अवगत करें।

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