सामने आने लगे नोटबंदी और जीएसटी के बुरे प्रभाव... झूठ बोलने में तो मोदी को शर्म नहीं आती

न काला धन रुका, न नकली नोट छपना बंद हुए, भ्रष्टाचार और बढ़ गया। आतंकवाद और नक्सलवाद पर लगाम लगने की जो बात कही थी वह तो उस समय ही हास्यपूर्ण लग रही थीI...

अतिथि लेखक
सामने आने लगे नोटबंदी और जीएसटी के बुरे प्रभाव

Bad effects of GST and Demonetization

दो साल में सरकारी खज़ाना खाली, आरबीआई के इमरजेंसी फंड पर नज़र

आर्थिक रूप से कंगाल हो चुका है देश, लफ्फाजी से कब तक काम चलेगा

उबैद उल्लाह नासिर

यह समझ पाना कठिन है कि 8 नवम्बर को नोटबंदी की सालगिरह लिखा जाए या बरसी, लेकिन सच्चाई यह है कि इसी दिन रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा ऐलान किया था जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर बिजली बन के गिरा था और जिस ने पूरे देश के निजाम को तहस-नहस कर के रख दिया था।

"Bad effects of Demonetization"

देखते-देखते हर भारतीय कंगाल हो चुका था। रात में हुए इस मूर्खता पूर्ण ऐलान के बाद सुबह मोहल्ले की दुकानों का मंज़र देखने वाला था। लोग अपनी रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुएं नहीं खरीद पा रहे थे, बच्चे दूध के लिए बिलख रहे थे, मरीज़ दवाओं के लिए परेशान थे। एक अस्पताल में अपने बेटे के कैंसर का इलाज कराने के लिए अपनी जमीन बेच के पांच लाख रुपया लाने वाले किसान सर पर हाथ रखे बैठा था, एक तरफ बीमार बेटा मौत से जूझ रहा। दूसरी तरफ ज़मीन भी हाथ से निकल गई पास में बचा था नोटों का बण्डल, जो अब उसके लिए बेकार हो रहा था, क्योंकि बैंक में वह यह पैसा जमा तो करा सकता था, लेकिन ज़रूरत भर का पैसा बैंक से पा नहीं सकता थाI

लोग अभी भूले नही हैं कि बैंक से केवल चार हजार रुपया पाने के लिए उन्हें क्या-क्या कठिनाइयां झेलनी पड़ी थीं। इन्हीं कठिनाइयों को झेल न पाने के कारण करीब 150 लोग अकाल मौत के मुंह में समा गए।

लोगों के जख्मों पर नमक छिडकते हुए प्रधानमंत्री ने विदेश की सरज़मीन पर जिस तरह इन परेशान लोगों का मजाक उड़ाया था, वह लोग अभी भूले नहीं हैं और आज जब इस फैसले की दूसरी बरसी के मौके पर वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत सरकर और पार्टी के लोग इसके लाभ गिनाते या भविष्य के सम्भावित लाभ की बात करते तो यह ज़ख्मों पर नमक छिडकने जैसा लगता हैI

नोटबंदी के ऐलान के समय प्रधानमंत्री ने जिन-जिन सम्भावित फायदों का वर्णन अपने भाषण में किया था, अब उनका कोई नाम भी नहीं लेता, क्योंकि उन में से कोई एक बात भी पूरी नहीं हुई है। न काला धन रुका, न नकली नोट छपना बंद हुए, भ्रष्टाचार और बढ़ गया। आतंकवाद और नक्सलवाद पर लगाम लगने की जो बात कही थी वह तो उस समय ही हास्यपूर्ण लग रही थीI

अब जब सवाल पूछा जा रहा है कि जब सारा पैसा बैंक में वापस आ गता तो काला धन कहाँ गया, तो तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। मसलन कल नोटबंदी के फायदे (Benefits of Demonetization) गिनवाते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी का मकसद (Purpose of Demonetization) घरों में रखा पैसा बैंकों में लाना था तो जब सब पैसा बैंक में आ गया तो बैंक कंगाल होने के दहाने पर क्यों खड़े हैं। दूसरे जब देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई है तो रिज़र्व बैंक के रिज़र्व फण्ड से तीन लाख करोड़ रुपया क्यों माँगा जा रहा हैI

झूठ बोलने में तो मोदी को शर्म नहीं आती

Modi is not ashamed to lie

झूठ बोलने में तो प्रधानमंत्री से ले कर छुट भय्या नेताओं तक को शर्म ही नहीं आती। जैसे एक ओर रिज़र्व बैंक कह रहा था कि वापस आये नोटों की गिनती अभी चल ही रही है, लेकिन प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से ऐलान कर दिया कि नोटबंदी से तीन लाख करोड़ का काला धन सामने आया है और जब आरबीआई ने कहा कि कुल चालू धन का 99.3% पैसा बैंक में आ गया तो सवाल उठा कि फिर काला धन कहाँ गया, तो सरकार मुंह में घुघनी डाले बैठी है।

इसी तरह कल अरुण जेटली ने कहा कि एक सौ तीस करोड़ लोग इनकम टैक्स return भर रहे हैं, तो जनता अपनी हंसी नहीं रोक पाई क्योंकि देश की आबादी ही अभी इतनी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि नोटबंदी के बाद आयकर की जमा बढ़ी है, जबकि CBDT का कहना है 2016-17 में यह जमा घटी है। वित्त मंत्री को अपने ही मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण विभाग की रिपोर्ट का या तो पता नहीं या फिर वह जान बूझ कर जनता को गुमराह कर रहे थेI

दुनिया जानती है कि बच्चे का गुल्लक कब फोड़ा जाता है या समय से पहले फिक्स्ड डिपाजिट कब तुड़वाया जाता है। ज़ाहिर है कि देश को कोई गम्भीर वित्तीय स्थिति का सामना है तभी तो सरकार ने धारा 7 का सत्तर वर्षों में पहली बार प्रयोग करते हुए रिज़र्व बैंक से उसके लगभग 9 लाख करोड़ के इमरजेंसी फण्ड का एक तिहाई अर्थात 3 लाख 76 हज़ार करोड़ रुपया माँगा है। वह तो कहिये कि आरबीआई के स्टाफ यूनियन के सख्त रवैये के कारण गवर्नर उर्जित पटेल को भी सख्त स्टैंड लेना पडा और उन्होंने सरकार से कुछ स्पष्टीकरण मांगने के बाद यह पैसा देने से इनकार कर दिया। जिस से सरकार और आरबीआई में ठन गई। कहा जाता है कि बात यहाँ तक पहुँच गई थी कि बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा देने तक की धमकी दे दी थीI

सारी दुनिया के केन्द्रीय बैंक स्वायत्तशासी होते हैं जिनके कामकाज में सरकार दखल नहीं देती, लेकिन नोटबंदी के बाद उसके इमरजेंसी फंड पर नज़र लगाना और उसके बाद आरएसएस के नेताओं का बैंक के गवर्नर को धमकाना और उन्हें सरकार की मर्ज़ी के हिसाब से काम करने की सलाह देने का मामला देश से निकल कर विदेशों तक पहुँच गया और अंतर राष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) तक को आरबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित रखने की बात कहनी पड़ी और आगाह किया कि वह भारत में हो रहे इन हालात पर नज़र रखे हुए हैI

ध्यान रहे कि यह कोई पहला मामला नहीं था जब मोदी सरकार ने आरबीआई के काम में दखल देना शुरू किया हो। इससे पहले वह उपर्युक्त धारा के तहत ही बैंक को लिख चुकी थी कि वह बिजली कंपनियों को क़र्ज़ में छूट दे। दूसरे पत्र में कहा गया कि वह रेवेन्यु घाटा पूरा करे और तीसरे में छोटे और मंझोले उद्योगों को राहत देने की बात कही गई थी। जबकि आरबीआई केंद्र को प्रत्येक वर्ष लगभग 60 हजार करोड़ रुपया का डिविडेंड देता ही हैI

"Bad effects of GST"

इन सभी समस्याओं की जड में नोटबंदी और जीएसटी का गलत ढंग से लागू करना है, जिस से आर्थिक हालात बाद से बदतर हो चुके हैं। यही कारण है कि वित्त मंत्री या अन्य भाजपाई नेता कोई भी लफ्फाजी करें हर छोटे छोटे कामों को इवेंट बना देने वाली मोदी सरकार नोटबंदी की दूसरी बरसी पर बगलें झांकती दिखाई दे रही हैI

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