जानिये क्‍यों जरूरी है भीमा कोरेगांव को याद रखना

कहा जाता है कि पेशवाओं ने मनुस्‍मृति के कानून को लागू कर रखा था। वहां पिछड़ी जाति के लोगों को संपत्ति, वस्‍त्र, गहने आदि खरीदने का अधिकार नही था।...

अतिथि लेखक

भीमा कोरेगांव की असली कहानी, क्या युद्ध का कारण थे ब्राह्मण?

संजीव खुदशाह

भीमा कोरेगांव आज एक तीर्थ बन चुका है, लेकिन क्‍या आपको मालूम है इसे तीर्थ बनाने में लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी। यह समय था आज से लगभग 200 साल पहले 1818 का, जब कहने को तो शिवाजी के वंश मराठों का शासन था पर दरअसल हुक़ूमत पेशवाओं (चितपावन ब्राम्‍हणों) की चलती थी।

कहा जाता है कि पेशवाओं ने मनुस्‍मृति के कानून को लागू कर रखा था। वहां पिछड़ी जाति के लोगों को संपत्ति, वस्‍त्र, गहने आदि खरीदने का अधिकार नही था। दुकानदार नये वस्‍त्र बेचते समय दलितों के बेचे गये वस्‍त्र बीच से फाड़ दिया करते थे। उनका कहना था ऐसा पेशवा का फरमान है।

मनुस्‍मृति में दिये गये आदेश के अनुसार अन्‍त्‍यजों ( दलितों) की परछाई से भी परहेज करना था। पेशवाओं ने दलितों को अपने पीठ में झाड़ू एवं गले में गड़गा बांधने के लिए मजबूर कर दिया था। मकसद था चलते समय उनके पद चिन्‍ह मिट जायें और उनकी थूक सड़क पर न गिरे। एक खास प्रकार का आवाज़ भी उन्‍हे निकालना पड़ता था ताकि सवर्ण यह जान जाये की कोई दलित आ रहा है और वे उनकी परछाई से दूर हो जाये। वह अपवित्र होने से बचे रहे। बड़ी ही जलालत भरी ज़िन्‍दगी थी उस वक्‍त दलितों की, जिससे मानवता भी शर्मशार हो जाये।

इस वक्‍त अंग्रेज शनैः - शनैः अपने पांव जमा रहे थे। पुणे का कुछ हिस्‍सा उनके कब्‍जे में आ चुका था। शनीवारवाड़ा समेत महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा अब भी पेशवाओ के हक में ही था।

अंग्रेजो ने महार रेजिमेंट का गठन किया जिसमें अन्‍य दलित जातियों के साथ-साथ ज्‍यादातर महार जाति के भी लोग थे। दलितों को अपनी गुलामी से निजात पानी थी। लड़ाई में अंग्रेजों का मकसद तो जगजाहिर था लेकिन दलितो ने इस लड़ाई को अपनी अस्मिता का प्रश्‍न बना दिया। 1 जनवरी 1818 को संसाधनों की कमी के बावजूद वे पूर दमखम के साथ लड़े। यह निर्णायक लड़ाई पुणे के पास स्थित कोरेगांव, जो भीमा नदी से लगा हुआ था, पर हुई।

संजीव खुदशाह का जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। आपने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किये जाते हैं और प्रगतिशील विचारक, कवि, कथा कार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते है। आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। "सफाई कामगार समुदाय" एवं "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है। 
संजीव खुदशाह का जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। आपने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किये जाते हैं और प्रगतिशील विचारक, कवि, कथा कार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते है। आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। "सफाई कामगार समुदाय" एवं "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है। 

दस्‍तावेजी तथ्‍य के मुताबिक महार रेजिमेन्‍ट की ओर से करीब 900 सैनिक एवं पेशवाओं की 25000 फौज आपने-सामने लड़ी, जिसमें पेशवाओं की बुरी तरह हार हुई। इस लड़ाई ने पेशवा राज को हमेशा हमेशा के लिए खत्‍म कर दिया, जो एक इन्‍सान की गुलामी का प्रतीक था। बाद में यहां पर एक स्‍मारक बनाया गया है जिसमें महार रेजिमेंट के सैनिकों के नाम लिखे है। 1927 में डॉं अंबेडकर के यहां आने के बाद इस स्‍थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया।

कुछ सामंतवादी लोग इस घटना को देशद्रोह के नजरिये से देखने की कोशिश करते है। वे कहते हैं अंग्रेज पूंजीवादियों के साथ मिलकर देशी राजाओं से लड़ना देशद्रोह है। जबकि ये लड़ाई देश से भी ऊपर मानव स्‍तर की जिन्‍दगी पाने के लिए थी। यहां पर अंग्रेज जो उन्‍हें एक इन्‍सान का दर्जा दे रहे थे और उन्‍हें सैनिक के रूप में स्‍वीकार कर रहे थे दूसरी ओर भारतीय राज व्‍यवस्‍था उन्‍हे पालतू जानवर तक का दर्जा भी देने के लिए तैयार नहीं थी।

क्‍यों महत्‍वपूर्ण है भीमा कोरेगांव की लड़ाई?

भीमा कोरेगांव की लड़ाई को याद रखा जाना इसलिए जरूरी है, क्‍योंकि आज महार समुदाय के लोग बहुत तरक्‍की कर चुके हैं। ये घटना इस बात को दर्शाती है कि उन्‍होने इस मुकाम को पाने के लिए क्‍या-क्‍या नही किया। आज तमाम दलित पिछड़ी जातियां जिस मानव निहित सुविधा की हकदार हैं, वे उस महार रेजिमेंट के हमेशा ऋणी रहेंगे और सभी वंचित जातियों को प्रेरणा देते रहेंगे। हालांकि बाद में अंग्रेजो ने इसी तर्ज पर चमार रेजिमेंट एवं मेहतर रेजिमेंट का भी गठन किया था। लेकिन जब अन्‍य सवर्ण जाति के लड़ाके भर्ती किये जाने लगे तो इन रेजिमेंट को बंद कर दिया गया।

इस लड़ाई ने पश्चिमी भारत में अँग्रेज़ी शासन की बुनियाद रख दी। शिक्षा, संपत्ति के द्वार सबके लिए खोल दिये गये। महात्‍मा फुले पढ़कर निकले, पहली महिला शिक्षिका सावित्र बाई फुले बनी। यानि इस लड़ाई ने पूरे वंचित जातियों को प्रभावित किया, जो सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक दृष्टिकोण से मील का पत्‍थर साबित हुआ।

Dalit Movement Association

 

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