अवैध रेत खनन माफिया और शासन-प्रशासन, पुलिस गठजोड़ की पोलखोल करेगा कौन?

संदीप शर्मा की मौत की पूरी निष्पक्ष, न्यायिक जाँच जरूरी क्या न्यायालय स्वयं दखल लेगा?...

अतिथि लेखक

संदीप शर्मा की मौत की पूरी निष्पक्ष, न्यायिक जाँच जरूरी

क्या न्यायालय स्वयं दखल लेगा?

मेधा पाटकर, मुकेश भगोरिया, रोहित ठाकुर

संदीप शर्मा की अवैध रेत माफिया पर कसी कलम का नतीजा उनकी मौत से हुआ, यह खबर कोई अचरज की बात नहीं हैं। मध्यप्रदेश में ऐसे हादसे होते रहे है और कई अधिकारियों, कार्यकर्ताओं की जान चली गई है। इसे शहादत कहें या हत्या, यह तो जाँच से सुनिश्चित होगा लेकिन इसके लिए म.प्र. शासन ने निष्पक्ष न्यायिक जाँच तत्काल मंजूर करना जरुरी है।

भिंड में अवैध रेत खनन से चंबल नदी घाटी का हो रहा विनाश नया मुद्दा नहीं हैं। इस पर खबरें चली ही थी,विशेषतः जब SDOP की string operation की खबर छापी थी। संदीप शर्मा ने उसके बाद सुरक्षा मांगी थी, यह भी पत्रव्यवहार से स्पष्ट है! इसके बावजूद कोई करवाई क्यों नहीं की गई, इस पर जवाब मुख्यमंत्री जी से लिया जाना चाहिए!

 NGT के आदेशों की कुछ कमजोरी, दंड राशि पर अवैध खनन कर्ताओं का छुटकारा, कानून और नीति में रखी गयी ढिलाई, सर्वोच्च अदालत के तथा NGT के आदेशों की म.प्र. के शासनकर्ताओं से सरेआम, खुलेआम अवमानना आदि तमाम अनुभवों से हम जानते है कि माफिया और शासन-प्रशासन की गठजोड़ के बिना, नदियाँ, जलचक्र और भूमि, पानी पर विनाशकारी असर इतनी सहजता से नहीं चल सकता है।

 नर्मदा किनारे तो आज वैसे ही या उससे भी अधिक अंधाधुंध रेत खनन जारी है।  जबकि सरदार सरोवर के लिए अर्जित भूमि नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के कार्यपालन मंत्री के नाम होते हुए भी, खनिज विभाग ने वही भूमि लीज पर खननों के लिए देना अवैध था, वैसे ही अब किसी अन्य कार्य के लिए यह भूमि उपयोग में लेना, और अब तो किसी लीज / आबंटन के बिना, यह भी अपराधजन्य हैं। म.प्र. उच्च न्यायालय ने इस पर मई 2015 से रोक लगाई है।

 म.प्र. उच्च न्यायालय और हरित न्यायाधिकरण ने नर्मदा नदी में एवं किनारे चल रहे रेत खनन पर प्रतिबन्ध, कुछ रोक एवं शर्ते लगाने के बावजूद आज हम देख रहे हैं कि रेत खनन भरसक चालू है। पुलिस के आँखों के सामने सैकड़ों ट्रैक्टर्स  निकलते हैं, जबकि चंद वाहन कई दिनों बाद पकडे जाते हैं। हमारे कार्यकर्त्ताओं ने  बार रेत माफियाओं के  हमलों का विरोध किया। खनिज विभाग कोई कारवाई क्वचित करता रहा है और वह भी कमजोर। परिवहनकर्ता के रूप में ट्रैक्टर्स के ड्राइवर्स पकडे जाते हैं, मालिक नहीं! IPC 379 के तहत पुलिस अपराध दाखिल करने का अधिकार पुलिस को है,तो भी आनाकानी होकर अगुवाही नहीं के बराबर रहती है !

 27 फरवरी 2012 तथा 2014 सितम्बर का सर्वोच्च अदालत का फैसला एवं 2013 के NGT, दिल्ली के आदेश, 2015 से दिए NGT, भोपाल के आदेश, म.प्र. उच्च न्यायलय के आदेश के उल्लंघन से चल रहे अवैध रेत खनन को राजनीतिक आश्रय जरुर है। मुख्यमंत्री मात्र नर्मदा सेवा यात्रा में और अन्यथा बयान व घोषणा करते रहे हैं। रेत खनन की चोरी शासन की तिजोरी से लाखों की लूट है तो प्राकृतिक सम्पदा, नदी की अपरिमित हानि है।

इन सब करतूतों में राजनेताओं की मुनाफाखोरी बारबार सामने लायी जाती रही, वह संदीप शर्मा जैसे पत्रकारों से या याचिकाकर्ताओं से; लेकिन उनकी हत्या या हमले ही उन्हें चुप करने या अवैध रास्ते से हारने के लिए हो रहे है। इसमें शासन भी दोषी है क्योंकि पत्रकारों को/ माध्यमकर्ता या कार्यकर्ताओं को ही नहीं, सम्बंधित whistle blower अधिकारियों को भी सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है।  हर न्यायालय का फर्ज है कि वह अवमानना का दावा व अपराधी प्रकरण दर्ज करे और अवैध खनन रोके। संदीप शर्मा की शहादत व्यर्थ न जाये।

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