कश्मीर: खाकी, पत्थरबाजी और आशा की खून से सराबोर भूमि

हुर्रियत को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा यह होगा कि निराश और हताश युवा और बड़ी संख्या में अतिवादियों के साथ जुड़ेंगे और आतंकी कार्यवाहियों में हिस्सा लेंगे।...

-अनेरी वोरा व निरंजन देशपांडे

BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEसेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज़्म, जीडी पारिख सेंटर फॉर एजुकेशनल स्टडीज़ व विचारवेध द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित कार्यक्रम में अपने व्याख्यान में अग्रणी कश्मीरी समाचारपत्र ‘कश्मीर इमेजिस’ के संपादक बशीर मंज़र ने कहा,

‘‘अगर भाजपा, पीडीपी के साथ उसके गठबंधन में तय किए गए एजेंडे के अनुसार काम करेगी तो कश्मीर में हालात बहुत बेहतर हो सकते हैं’’।

उनका कहना था कि

‘‘कश्मीरियों ने आतंकवाद को चुना नहीं है, वह तो केवल दशकों से युवा कश्मीरियों द्वारा महसूस किए जा रहे अलगाव की भावना की प्रतिक्रिया है’’।

मंज़र, ‘‘कश्मीर: खाकी, पत्थरबाजी और आशा की खून से सराबोर भूमि’’ विषय पर 8 जून, 2017 को मुंबई विश्वविद्यालय के जीडी पारिख हॉल में बोल रहे थे। व्याख्यान को सुनने के लिए लगभग 150 व्यक्ति मौजूद थे, जिनमें शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडियाकर्मी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी शामिल थे।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEसीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने संक्षेप में व्याख्यान का संदर्भ प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में मंज़र ने ज़ोर देकर कहा कि कश्मीर के लोग, सरकार और सुरक्षाबलों से अलगाव महसूस करते हैं और भारत सरकार उनके साथ संवाद स्थापित करने में असफल रही है।

मंज़र के अनुसार, सन 2016 में शुरू हुए आंदोलन की जड़ें सन 2010 की एक घटना में हैं जब सेना द्वारा चार-पांच लोगों को अतिवादी बताकर मार गिराया गया था। बाद में यह पता चला कि ये लोग स्थानीय गुज्जर लड़के थे और संबंधित अधिकारी ने उन्हें केवल इसलिए मारा था ताकि उसे पदोन्नति मिल सके। इस घटना के बाद एक लंबा आंदोलन शुरू हो गया। पूरा राज्य सात-आठ महीनों तक बंद रहा और पुलिस ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कार्यवाही की जिसके दौरान सैंकड़ों निर्दोष नागरिक मारे गए। तनाव को कम करने के लिए तत्कालीन केन्द्रीय सरकार ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम के नेतृत्व में एक दल को कश्मीर भेजा। इसके अलावा, केन्द्र सरकार ने कश्मीर के लिए वार्ताकारों की एक तीन सदस्यीय टीम भी नियुक्त की। इस टीम ने लगभग एक साल तक घाटी में विभिन्न वर्गों के लोगों, अलग-अलग दलों और संगठनों से बातचीत की। दुःख की बात यह है कि भारत सरकार ने इस दल की रपट का अध्ययन करना तक उचित नहीं समझा, उस पर कोई कार्यवाही करनी तो दूर की बात रही।

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नतीजे में घाटी में हालात बिगड़ते गए। इसके बाद भी कश्मीर के लोगों ने सरकार को एक और मौका दिया। सन 2014 के विधानसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत 65 से भी अधिक था। राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों, नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी ने इस संकल्प के साथ अलग-अलग चुनाव लड़ा, कि वे भाजपा को कश्मीर से बाहर रखना चाहती हैं। जब नतीजे आए तो पता यह चला कि जम्मू क्षेत्र में भाजपा की जबरदस्त जीत हुई है, घाटी की लगभग सभी सीटों पर पीडीपी ने कब्जा कर लिया है और लद्दाख, जहां बहुत कम सीटें हैं, ने कांग्रेस को समर्थन दिया है। इसके बाद भाजपा और पीडीपी ने मिलकर कश्मीर में गठबंधन सरकार का गठन किया।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEमंज़र के अनुसार, कश्मीर के युवाओं ने पीडीपी को इसलिए वोट दिया था क्योंकि वे भाजपा को घाटी से बाहर रखना चाहते थे। परंतु पीडीपी के भाजपा से हाथ मिला लेने के कारण इन लोगों को बहुत निराशा हुई। उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। परंतु गठबंधन सरकार के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था क्योंकि अगर भाजपा को सरकार से बाहर रखा जाता, तो इसका अर्थ होता पूरे जम्मू क्षेत्र को सरकार में कोई प्रतिनिधित्व न मिलना। सरकार बनने के तुरंत बाद से भाजपा ने घाटी में अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया।

मंज़र के अनुसार, वे 65 साल से कश्मीर में रह रहे हैं और इसके पहले वहां बीफ कभी मुद्दा नहीं था। दो साल पहले एक ट्रक ड्रायवर को बीफ रखने के कारण जिंदा जला दिया गया।

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जिन युवाओं ने पीडीपी को वोट दिया था उन्हें डॉक्टर मुफ्ती मोहम्मद सईद पर भरोसा था परंतु जल्दी ही उन्हें यह अहसास हो गया कि पीडीपी तो भाजपा की पिछलग्गू बनकर रह गई है। भाजपा ने कश्मीर में अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया और नतीजे में वहां पर भी, देश के अन्य इलाकों की तरह, बीफ और लवजिहाद मुद्दे बनने लगे। इससे पहले से ही परेशान कश्मीरियों के लिए मुसीबतें और बढ़ गईं। केन्द्र सरकार ने आमजनों के साथ संवाद स्थापित करने का कोई प्रयास नहीं किया और घाटी में उबल रहे गुस्से को नज़रअंदाज़ किया। बुरहान वानी की मौत से लोगों के मन में दबा हुआ गुस्सा फूट पड़ा। सुरक्षाबलों ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया और इससे दस साल तक की उम्र के छोटे-छोटे बच्चों ने अपनी आंखे खो दीं। देश के दूसरों हिस्सों में चले जाट और पटेल आंदोलन भी इतने ही हिंसक थे, परंतु वहां आंदोलनकारियों के खिलाफ कभी पैलेट गनों का इस्तेमाल नहीं हुआ।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEश्री मंज़र का कहना था कि नई दिल्ली का कश्मीर के प्रति दृष्टिकोण, देश के अन्य हिस्सों के प्रति उसके दृष्टिकोण से काफी अलग है। सुरक्षाबल कश्मीर में अपनी कार्यवाहियों को आतंकवाद के खिलाफ युद्ध मानकर अंजाम देते हैं। वे वहां के आंदोलनकारियों से उसी तरह नहीं निपटते, जैसा कि वे देश के अन्य हिस्सों के आंदोलनकारियों के मामले में करते हैं।

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श्री मंज़र का मानना था कि भाजपा-पीडीपी गठबंधन का जो सांझा एजेंडा तैयार किया गया था, भाजपा उसका पालन नहीं कर रही है। अगर भाजपा उस सांझा एजेंडे का पालन करेगी तो इससे घाटी में हालात में बहुत सुधार आएगा। इस एजेंडे के मूलतः चार बिन्दु हैं।

*             केन्द्र सरकार कश्मीर में अलगाववादियों सहित सभी हितधारकों के साथ संवाद करेगी।

*             संविधान के अनुच्छेद 370 के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

*             सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम की समीक्षा होगी।

*             सभी जल विद्युत परियोजनाओं का स्वामित्व राज्य सरकार को सौंप दिया जाएगा।

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श्री मंज़र ने उस घटना का उल्लेख भी किया जिसमें सेना के एक मेजर ने एक नागरिक को जीप से बांधकर उसका इस्तेमाल मानव ढाल के रूप में किया। मंज़र के अनुसार, जब थलसेना प्रमुख इस तरह की कार्यवाही का बचाव करते हैं और उक्त अधिकारी को पुरस्कृत करते हैं तो आम कश्मीरियों में यह संदेश जाता है कि भारत सरकार को कश्मीर की धरती तो प्रिय है परंतु वहां के लोग नहीं।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEउन्होंने कहा कि यद्यपि कश्मीर में हमेशा से मुसलमानों की बहुसंख्या रही है परंतु वह कभी इस्लामिक क्षेत्र नहीं रहा। आज वहां इस्लामिक स्टेट और अलकायदा के समर्थक पैदा हो गए हैं और वे इस्लाम की खातिर जीने और मरने की बातें करने लगे हैं। आम कश्मीरी दो पाटों के बीच पिस रहा है। एक है कश्मीर के बारे में केन्द्र सरकार की सोच, जो यथार्थ पर आधारित नहीं है। दूसरी ओर, अलगाववादियों का एक वर्ग कश्मीरियों को यह समझाने में लगा है कि वे कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए नहीं वरन इस्लाम की रक्षा के लिए युद्ध कर रहे हैं।

उन्होंने सभी कश्मीरियों को आतंकी बताने के लिए मीडिया की आलोचना की।

उन्होंने कहा कि कश्मीर में जिन युवाओं ने सरकार के खिलाफ हथियार उठाए हैं उनकी कुल संख्या 100 से ज्यादा नहीं है।

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श्री मंज़र के अनुसार, सभी कश्मीरियों को आतंकवादी बताना नई दिल्ली को इसलिए सुहाता है क्योंकि उससे उसे देश के अन्य भागों में जनता का समर्थन मिलता है। उन्होंने पाकिस्तान पर यह आरोप लगाया कि वह कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने कहा कि पत्थर फेंकने वालों के बारे में अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे पैसों के बदले में ऐसा कर रहे हैं।

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श्री मंज़र का तर्क था कि कश्मीरी अपेक्षाकृत समृद्ध हैं और कोई भी कश्मीरी युवक 500 रूपए जैसी मामूली रकम के लिए अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगाएगा।

उन्होंने कहा कि अगर लोग आंदोलनों और प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं तो इसका कारण यह है कि वे सचमुच परेशान हैं। उन्होंने कहा यह हो सकता है कि बड़े नेताओं और अतिवादियों को धन मिल रहा हो परंतु आम कश्मीरी तो गुस्से और कुंठा के कारण सड़कों पर उतर रहा है।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEउन्होंने पाकिस्तान की भूमिका के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि हो सकता है कि पाकिस्तान, कश्मीर में अलगाववाद और अशांति को बढ़ावा दे रहा हो परंतु एक भारतीय नागरिक के रूप में वे पाकिस्तान को चुनौती देने या उसे सबक सिखाने की स्थिति में नहीं है। यह तो भारत सरकार का काम है कि वह आम कश्मीरियों को पाकिस्तान के दुष्प्रचार से बचाए।

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि कश्मीर में किसी के लिए भी बंदूक पाना आसान हो परंतु हमें यह भी समझना होगा कि कोई व्यक्ति बंदूक पाने का प्रयास तभी करेगा जब उसे किसी बात पर गहरा असंतोष या गुस्सा होगा। राजस्थान और कर्नाटक में भी लोग आसानी से हथियार हासिल कर सकते हैं परंतु इन राज्यों में शांति इसलिए बनी हुई है क्योंकि लोगों के पास हथियार हासिल करने का कोई कारण नहीं हैं। कोई भी आम नागरिक शांति से अपना जीवन बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि उसके पास कोई रोज़गार हो और उसके घर का चूल्हा जले। वह हिंसा या विरोध प्रदर्शनों में तभी भाग लेता है जब उसके सामने कोई और रास्ता नहीं बचता।

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श्री मंज़र ने कहा कि पीडीपी की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती बार-बार यह अनुरोध कर रही हैं कि भारत सरकार को सभी के साथ संवाद के चैनल खोलने चाहिए। उन्होंने कहा कि कश्मीर की समस्या का हल निकालने के लिए सरकार को हुरियत कान्फ्रेंस से बातचीत करनी होगी क्योंकि वही कश्मीर में अतिवाद और शांति के बीच का बफर है। सरकार लगातार हुरियत कांफ्रेंस से बातचीत करने से इंकार करती आ रही है और क्योंकि उसका कहना है कि हुरियत कांफ्रेंस अलगाववादी और अतिवादी संगठन है। परंतु सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि घाटी में सक्रिय संगठनों में से हुरियत ही एकमात्र ऐसा संगठन है जो असंतोष को अभिव्यक्त करने के लिए अहिंसक तरीकों के इस्तेमाल में विश्वास रखता है। हुर्रियत को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा यह होगा कि निराश और हताश युवा और बड़ी संख्या में अतिवादियों के साथ जुडेंगे और आतंकी कार्यवाहियों में हिस्सा लेंगे।

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BLEEDING KASHMIR: THE LAND OF KHAKHI, STONE PELTING AND HOPEश्री मंज़र का कहना था कि कश्मीरी, अटल बिहारी वाजपेयी का आज भी बहुत सम्मान करते हैं क्योंकि वे देश के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने यह स्वीकार किया था कि कश्मीरियों के साथ गलत हुआ है और कश्मीर में कभी निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं हुए। अटल बिहारी वाजपेयी ने लोगों की आस्था सरकार में बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए थे और सन 2003 में पाकिस्तान के साथ औपचारिक रूप से युद्धविराम का समझौता किया था। इससे सीमाओं पर रहने वाले लोगों की जिंदगी बहुत बेहतर हुई थी। परंतु आज उसी एनडीए की सरकार, बातचीत करने तक को तैयार नहीं है।

कश्मीर में बने एक नए टनल का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से आतंकवाद और पर्यटन में से एक को चुनने के लिए कहा था परंतु हमें यह समझना होगा कि कश्मीरी अपनी इच्छा से आतंकवाद को नहीं चुन रहे हैं। आतंकवाद तो उस अलगाव की प्रतिक्रिया है, जिसे कश्मीरी दशकों से भुगत रहे हैं।

पत्थर फेंकने वालों से कोई यह पूछने के लिए तैयार नहीं है कि वे पत्थर क्यों फेंक रहे हैं। कुछ सैंकड़ा अतिवादियों से निपटने के लिए लाखों सुरक्षाकर्मी घाटी में तैनात हैं। उमर फय्याज़ जैसे कई कश्मीरी युवक, भारतीय सेना में भर्ती होना और भारतीय शिक्षण संस्थाओं में पढ़ना चाहते हैं परंतु नई दिल्ली उन्हें मुख्यधारा में शामिल होने देना नहीं चाहती क्योंकि कश्मीरियों को भारत-विरोधी बताने में उसे अपना फायदा नज़र आता है।

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श्री मंज़र ने एकदम सही कहा कि सरकार को कश्मीर में उबल रहे क्रोध के ज्वालामुखी को शांत करने की कोशिश करनी चाहिए। उसे कश्मीरियों को यह संदेश देना चाहिए कि उसे उनकी फिक्र है और इसके लिए यह ज़रूरी है कि पीडीपी और भाजपा का संयुक्त एजेंडा लागू किया जाए।

व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें श्रोताओं ने अपने-अपने सरोकार और परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किए। इनमें शामिल थे कश्मीरी पंडितों, सेना द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन, अनुच्छेद 370, राज्य और केन्द्र सरकारों की भूमिका, पाकिस्तान, अलगाववादियों व अतिवादियों आदि से जुड़े मुद्दे।

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पंडितों के प्रश्न पर श्री मंज़र का कहना था कि निश्चय ही पंडितों के साथ गलत हुआ है और उन्हें उनके दर्द का अहसास है। परंतु, उनका कहना था कि एक आम कश्मीरी बतौर वे पंडितों से यह नहीं कह सकते कि वे घाटी में वापिस आ जाएं क्योंकि पंडितों को एक ओर अतिवादियों से खतरा होगा तो दूसरी ओर सरकार उनकी सुरक्षा करने में समर्थ नहीं होगी।

उन्होंने कहा कि पंडितों के साथ जो कुछ हुआ, उसके लिए लिए केवल श्री जगमोहन को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है और नई दिल्ली को भी इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि निश्चय ही उस समय कश्मीर में कानून और व्यवस्था की स्थिति नाजुक थी और पंडितों की जान और उनकी संपत्ति खतरे में थी। परंतु राज्यपाल जगमोहन ने इस समस्या का जो हल निकाला वह ठीक नहीं था। बसों में भरकर पंडितों को घाटी से बाहर ले जाने की बजाए, सरकार को उन्हें उनके घरों में ही सुरक्षा प्रदान करनी थी।

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मंज़र ने कई ऐसे कदम सुझाए जिनसे कश्मीर में शांति की पुनर्स्थापना की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि सरकार को आम लोगों का दिल जीतने के लिए हुरियत से बातचीत करनी चाहिए। भाजपा-पीडीपी सांझा एजेंडे का यह एक हिस्सा था। एक बार कश्मीरियों की भारत सरकार में आस्था पुनर्स्थापना हो जाए, उसके बाद सरकार को इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के मूल्यों के अनुरूप आगे कदम उठाने चाहिए। उन्होंने कहा कि श्री एबी वाजपेयी इस मामले में सरकार के पथप्रदर्शक हो सकते हैं। उन्होंने कश्मीर में हालात की बेहतरी के लिए कई कदम उठाए थे जिनमें दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा शुरू करना और दोनों देशों के बीच व्यापार को प्रोत्साहन देना शामिल था।

उन्होंने कहा कि कश्मीर की स्थिति को सुधारने के लिए पाकिस्तान के साथ संवाद आवश्यक है। छोटे-छोटे कदम उठाने से भी स्थिति सुधरेगी और इसके बाद अधिक जटिल मुद्दों से निपटा जा सकता है। उन्होंने कहा कि व्यापार मार्गों को खोलने और सीमा के दोनों ओर के नागरिकों को सीमा के आर-पार आसानी से आवागमन करने की अनुमति देने से भी हालात बेहतर होंगे। उनका कहना था कि सबसे ज़रूरी यह है कि पीडीपी और भाजपा का सांझा एजेंडा जल्दी से जल्दी लागू किया जाए।

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

सभी चित्र साभार - Centre for Study of Society and Secularism

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