बंदूकबाज़ की धाँय-धाँय और सेंसरबोर्ड के फैसलों के बीच की कहानी में विलेन हम दर्शकों को ही  ढूँढना होगा

बाहुबली जैसी फिल्मों पर दिखाए रक्त और गैन्ग्स ऑफ वासेपुर के रक्त में क्या अंतर है ? फिल्म में क्या रहेगा क्या नहीं यह हक अब दर्शकों को दे दिया जाना चाहिए।...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

एक एतिहासिक सर्वेक्षण करें को भारत के सिनेमा माध्यम पर नियंत्रण और निगरानी के लिए बने इस ट्रिब्यूनल के फैसले लगभग फ़िल्मकारों के हित में ही रहे हैं। कभी कभी तो ऐसी फिल्मों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगने पर उन नयें फ़िल्मकारों का भविष्य ही अधर में फंस जाता है जो न जाने कितनी मेहनतों के बाद फिल्मों में काम मिल पाता है।

फिल्म ट्रिब्यूनल के ताजा फैसले से खुश बाबूमोशाय की  लीड एक्ट्रेस बिदिता बाग अपनी  फेसबुक प्रोफाइल के स्टेटस में लिखती हैं कि एक्टर एट द मर्सी ऑफ सीबीएफ़सी। जी हाँ ऐसे कई नयें कलाकार सीबीएफ़सी के फैसलों की भेंट चढ़ जाते हैं और गुमनामी में जीते हैं।

 

मनीष कुमार जैसल

कार्निवाल सिनेमा में बाबू मोशाय बंदूकबाज़  देखने गया। फिल्म के संदर्भ में यह पहले ही मीडिया की सुर्खियों ने बता दिया था कि यह 18 वर्ष  के ऊपर की  आयु वर्ग के लिए ही उचित है।

कार्निवाल सिनेमा अपने  ही विज्ञापन  में  जिस प्रकार से यह दिखाने का प्रयास करता है कि एक बच्चा जिस पर सिनेमा का प्रभाव इस कदर है कि सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों के संवाद उसके जीवन का हिस्सा बन चुका है।

इसी विज्ञापन में एक महिला द्वारा उसके नाम पुछे जाने पर वो कहता है  “नाम-राहुल, पूरा नाम राहुल चटोपाध्याय, बाप का नाम अमित चटोपाध्याय, माँ का नाम रेखा चटोपाध्याय, कुत्ते का नाम टामी बीप... उम्र आठ साल, दो महीने, तीन हफ्ते, तभी उसकी माँ आती है तब वो कहता है कि ये सिनेमा हॉल है तुम्हारे बाप का घर नहीं, जब तक बैठने को कहा न जाए तब तक मत बैठना”  फिर फेड इन में थप्पड़ की आवाज़।

यह विज्ञापन बच्चों पर पड़ रहे सिनेमा के असर का चित्रण करता है। और उनके परिवार द्वारा सिखाये जा रहे नैतिकता के पाठ को भी दर्शाता है।

बीप की आवाज़ पर गौर करें तो कुत्ते का नाम किसी आदमी के नाम पर रखा और बोला गया था इसी कारण उस पर बीप सेंसरबोर्ड  के सिपाहियों द्वारा रखा गया है।

बाबू मोशाय बंदूकबाज़ को इन्ही सिपाहियों के चलते 45 कट्स के साथ एडल्ट प्रमाणपत्र देने की बात कही थी। हिन्दी सिनेमा के विकास और विस्तार के लिहाज से फिल्म के निर्देशक और निर्माता कुशन नंदी द्वारा इस फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती देना अच्छा कदम माना जा सकता है। ट्रिब्यूनल ने फिल्म को 8 हिंसा के छोटे और स्वैच्छिक दृश्यों के  काँट छांट के बाद प्रदर्शित करने का फैसला सुनाया।

एक एतिहासिक सर्वेक्षण करें को भारत के सिनेमा माध्यम पर नियंत्रण और निगरानी के लिए बने इस ट्रिब्यूनल के फैसले लगभग फ़िल्मकारों के हित में ही रहे है। कभी कभी तो ऐसी फिल्मों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगने पर उन नयें फ़िल्मकारों का भविष्य ही अधर में फंस जाता है जो न जाने कितनी मेहनतों के बाद फिल्मों में काम मिल पाता है।

फिल्म ट्रिब्यूनल के ताजा फैसले से खुश बाबूमोशाय की  लीड एक्ट्रेस बिदिता बाग अपनी  फेसबुक प्रोफाइल के स्टेटस में लिखती है कि एक्टर एट द मर्सी ऑफ सीबीएफ़सी। जी हाँ ऐसे कई नयें कलाकार सीबीएफ़सी के फैसलों की भेंट चढ़ जाते है और गुमनामी में जीते है। खुद नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी 12 साल के अपने सिने कैरियर में उसी तरह खोये रहते अगर अनुराग कश्यप की  फिल्म गैन्ग्स ऑफ वासेपुर सीबीएफ़सी सिपाहियों द्वारा पूर्ण प्रतिबंधित कर दी गयी होती। फिल्म के लिए अनुराग ने काफी मेहनत की और उसका नतीजा आज हम सब के लिए सामने है। फिल्म सेंसर की बात हो और गैन्ग्स ऑफ वासेपुर का जिक्र न हो ऐसा हो नहीं सकता।

बंदूकबाज़ एक ऐसे कांट्रैक्ट किलर की कहानी है जो पैसे के लिए किसी भी भी जान ले सकता है। यही उसका व्यवसाय है। वह महिला नेत्री जिजी ( दिव्या दत्ता) के लिए काम करता है। उसका यह धंधा फिल्म में बढ़ते बढ़ते खुद महिला नेत्री को मारने तक पहुँच जाता है। फिल्म में बाबू (नवाज़ुद्दीन ) को फुलवा (बिदिता बाग) से हुए प्यार को पेश किया गया है। खुद फुलवा ऐसे लोगो द्वारा रेप की पीड़िता है जिन्हे मारने का ठेका बाबू को मिला था। फिल्म की पृष्ठभूमि एक ऐसे समाज कि है जहां गोला, बारूद, रेप, हत्या आदि आम है। हम सभी के  इर्द गिर्द भी यह आम ही है। फिल्‍म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, बिदिता बाग, और दिव्या दत्ता, के अलावा  मुरली शर्मा, जतिन गोस्वामी, अनिल जॉर्ज, श्रद्धा दास और भगवान तिवारी जैसे कलाकार बाबू मोशाय के इर्द गिर्द ही घूमते है। जो पर्दे पर बाबू के किरदार को और भी मजबूत करते है। छोटी कद काठी, काला चेहरा,सामान्य का कपड़ा पहने बाबू हम सबको गैन्ग्स ऑफ वासे के फैजल की  याद दिलाता है। गोली भी उसी अंदाज में चलाता है। संवाद भी वैसे ही है। बाबू मोशाय फिल्म के ही संवाद “लोग करके भूल जाते हैं लेकिन उसका किया एक दिन उसके सामने जरूर आता है” से समझे तो नवाजुद्दीन की अदाकारी एक बार फिर 5 साल बाद हम सभी और खुद उनके सामने भी आई है।

मनीष कुमार जैसल

मनीष कुमार जैसल  योग्यता- स्नातक (इलेक्ट्रॉनिक्स), स्नातकोत्तर (जनसंचार एवं पत्रकारिता), विद्यानिधि (एम.फिल.) फिल्म अध्ययन, भारतीय एवं पाश्चात्य कला एवं सौन्दर्य शास्त्र में स्नातकोत्तर डिप्लोमा,ग्राम विकास मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा, विद्यावारिधि (पीएच.डी.) फिल्म अध्ययन (अध्ययनरत),  संप्रति- प्रदर्शन कारी कला विभाग , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘सेंसरशिप के नैतिक मानदंड और हिन्दी सिनेमा विषय ’ विषय पर शोधरत एवं राजीव गांधी राष्ट्रीय फ़ेलोशिप प्राप्त (सीनियर रिसर्च फ़ेलो) ।

2 वर्ष से देशबंधु,हवाबाजी,द सभा जैसे मान्य समाचार पत्रों तथा न्यूज पोर्टल में फिल्म समीक्षा प्रकाशित ।  प्रकाशित रचनाएँ- विभिन्न चर्चित शोध जर्नल/पत्रिकाओं (विद्यावार्ता, मीडिया विमर्श तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कई  ई जर्नल ऑफ रिसर्च आदि) एवं विभिन्न समाचार पोर्टल्स में शोध-पत्र/आलेख एवं समसामयिक समाचार आलेख प्रकाशित और दो पुस्तकों में शोध-पत्र तथा एक दर्जन से अधिक राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला एवं सेमिनारों में प्रपत्र-वाचन एवं सहभागिता । संपर्क- शोध छात्र, फिल्म एवं नाटक विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र 

फिल्म की लोकेशन कमाल की है। गाने पर्याप्त हैं और सटीक हैं। संवाद और दृश्य भले ही कहीं कहीं पर अति करते हुए लगते है लेकिन ऐसी पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में संस्कारी भी बन जाना कहीं से शोभा नहीं देगा। नवाजुद्दीन और बिदिता के इंटीमेट सीन का अपना लॉजिक है इन्हे जरूरत से ज्यादा नहीं रखा गया है। फूहड़ता वाली कॉमेडी फिल्मों से तो ठीक ही है। कम से कम दर्शक को फिल्म देखने जाने से पहले ही पता है कि फिल्म में उत्तेजक दृश्य है। द्विअर्थी कुछ भी नहीं। सब सटीक। कलाकारों के किरदार में फिट बैठते दृश्य और संवाद इसमें आपको मिल जाएंगे। फिर भी कहीं कहीं पर फिल्म समझ से परे हो जाती है। खासकर उन दृश्यों में जहां एक कांट्रैक्ट किलर द्वारा चलाई गोली मिस हो जाती है। बार बार गोली लगने पर भी किरदार जीवित रहते है। बाबू मोशाय बंदूकबाज़ में मोशाय किस लिए है यह ढूंढ पाना मुश्किल है।

फिल्म को वयस्क विषय के लिहाज से खूब पसंद किया जा रहा है। रक्त को पर्दे पर देखना दुखद होता है। इसीलिए फिल्म को वयस्कों के लिए ही प्रमाणित किया गया। लेकिन इसके साथ ही यहाँ कई बड़े सवाल फिर से सीबीएफ़सी पर खड़े होते है कि बाहुबली जैसी फिल्मों पर दिखाएँ रक्त और गैन्ग्स ऑफ वासेपुर के रक्त में क्या अंतर है ? उदाहरण कई और भी है लेकिन उन्हे यहाँ पेश करने कि जरूरत अभी मालूम नहीं देती। वयस्क प्रमाण पत्र वाली फिल्म बंदूकबाज़ को नवाजुद्दीन और बिदिता के लिए देखी जानी चाहिए वहीं निर्देशक और निर्माता का फिल्म को लेकर सीबीएफ़सी के फैसले को चुनौती देने के लिए भी हम सभी सिने दर्शकों को बधाई देनी चाहिए। कुशान नंदी हमारे समय के उन फ़िल्मकारों कि फेहरिस्त में शामिल हो चुके है जो फिल्मों को अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया मानते है। उन्होने बंदूकबाज़ के जरिये इसी समाज की  सच्चाई को पेश करने की एक कोशिश की है। जिसे हम सभी देखनी चाहिए। इसके अलावा नए सेंसरबोर्ड अध्यक्ष तक यह संदेश भी जाना चाहिए फिल्मों पर प्रतिबंध अब पुराने जमाने की बात हो गयी है। फिल्म में क्या रहेगा क्या नहीं यह हक अब दर्शकों को दे दिया जाना चाहिए। कभी सेंसरबोर्ड चीफ विजय आंनन्द ने भी कहा था कि भारत में भी पोर्नोग्राफी को खुली छूट इसी आधार में दी जानी चाहिए कि  भारत के इन्टरनेट उपभोक्ताओं में पॉर्न देखने  वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि उनको इसी कारण इस्तीफा देना पड़ा था।

निर्देशक : कुणाण नंदी

कास्‍ट : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, बिदिता बाग, दिव्या दत्ता, मुरली शर्मा, जतिन गोस्वामी, श्रद्धा दास, भगवान तिवारी.

 

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