काबुलीवाला की तर्ज पर बायस्कोपवाला

फिल्म काफी रोचक बन गई है और दर्शकों को बांधे रखने में सफल साबित होती है। यह बात अलग है कि इस फिल्म की कहानी रवींद्रनाथ टैगोर की काबुलीवाला से मिलती-जुलती तो है, पर यह काबुलीवाला नहीं, बायस्कोपवाला है।...

वीणा भाटिया

नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने 1892 में एक छोटी-सी कहानी लिखी थी ‘काबुलीवाला’। यह कहानी भारत के साथ दुनिया भर में बहुत ही पसंद की गई। पांच साल की छोटी-सी बच्ची मिनी और एक अफ़गान व्यापारी की दोस्ती की यह कहानी आज भी उतनी ही पसंद की जाती है, जितनी तब जब यह लिखी गई थी। एक जमाने में यह कहानी बच्चों के कोर्स में शामिल थी। मानवीय संवेदना से भरपूर इस कहानी को पढ़ कर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसकी आंख नहीं भर आई हो। यह काबुलीवाला और मिनी की दोस्ती की अमर कहानी है, जो विश्व साहित्य में अनूठी ही है। काबुलीवाला मेवे बेचने आता है और उसकी दोस्ती एक छोटी बच्ची मिनी से हो जाती है। वह उसे हमेशा मेवे देता है और उसके साथ उसका बहुत ही स्नेहिल संबंध बन जाता है। मिनी को देख कर उसे अपनी बच्ची की याद आती है, जो उतनी ही बड़ी है। एक बार किसी से झगड़े में काबुलीवाला को लंबी जेल हो जाती है। जब वह जेल से छूट कर आता है तो सबसे पहले मिनी से मिलने जाता है। पर तब तक मिनी बहुत बड़ी हो जाती है और उसकी शादी की तैयारियां चल रही होती हैं। बहुत आग्रह के बाद मिनी के घरवाले उसे मिनी से मिलवाते हैं। मिनी को दुल्हन के रूप में देखकर काबुलीवाला हैरान रह जाता है, फिर उसे लगता है कि वक्त कितना बीत गया। उसे अपनी बच्ची की याद आ जाती है, वह भी विवाह के योग्य हो गई होगी। इसके बाद काबुलीवाला मिनी को उपहार देकर अपने देश लौटने का निर्णय लेता है। इस दौरान उसकी मनोदशा का जैसा सहज और स्वाभाविक चित्रण किया गया है, वह वाकई अनूठा है।

बायस्कोपवालाकाबुलीवाला कहानी पर आगे चल कर दो फिल्में बनीं। 1957 में पहली बार तपन सिन्हा ने बांग्ला में काबुलीवाला पर फिल्म बनाई। यद्यपि यह फिल्म क्लासिक थी, पर बॉक्स ऑफिस पर इसे कोई खास सफलता नहीं मिल सकी। सन् 1961 में हिंदी में हेमेन गुप्ता ने इस पर फिल्म बनाई जिसका निर्देशन विमल राय ने किया था और जिसमें काबुलीवाला की भूमिका बलराज साहनी ने निभाई थी। इसमें संगीत सलिल चौधरी ने दिया था। यह एक बहुत ही उच्च कोटि की फिल्म थी। इसका गीत ‘ऐ मेरे प्यारे वतन...तुझपे दिल कुर्बान’ आज भी लोगों को बांध लेता है। काबुलीवाला पर बनी ये दोनों फिल्में विश्व सिनेमा में क्लासिक मानी जाती हैं।

अब रवींद्रनाथ टैगोर की 157वीं जयंती पर काबुलीवाला पर एक और फिल्म बन कर आई है, जिसका नाम ‘बायस्कोपवाला’ है। रवींद्रनाथ की कहानी में अफगानिस्तान से आने वाला व्यापारी जहां मेवे बेचता था, इस फिल्म में अंतर ये है कि अब वह बच्चों को बायस्कोप दिखलाता है। एक जमाना था जब बच्चों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बायस्कोप ही होता था और शहर हो या गांव, बायस्कोपवाला जब आता था, तब उसे देखने के लिए बच्चों की भीड़ लग जाती थी। अब आज के समय में बस बायस्कोप की यादें भर हैं। आज के बहुतेरे बच्चों ने तो बायस्कोप का नाम भी नहीं सुना होगा। फिल्म में बायस्कोपवाला का किरदार डैनी डैंग्जोप्पा ने निभाया है। अपनी खलनायकी के लिए बॉलीवुड में मशहूर डैनी इस फिल्म से एक नये रूप में वापसी कर रहे हैं। रवींद्रनाथ की कहानी काबुलीवाला से इस फिल्म में बहुत ही अंतर है, पर मूल संवेदना एक ही है। फिल्म में कहानी की नायिका के पिता अफगानिस्तान की यात्रा पर जाते हैं, जहां उनकी फ्लाइट क्रैश हो जाती है और इसके बाद उनकी बेटी इस बात का पता लगाने अफगानिस्तान जाती है कि आखिर उसके पिता वहां किसलिए गये थे। वहां जाकर उसे पता चलता है कि उसकी इस यात्रा के तार उसके बचपन से जुड़े हैं। मिनी के बचपन से बायस्कोपवाले की कहानी जुड़ी है। फिल्म में बायस्कोपवाले से उसकी दोस्ती, उससे दोबारा मिलना और इसके साथ ही बाप-बेटी का किस्सा भी सामने आता है। फिल्म में सस्पेंस और थ्रिल है और कहानी भी किसी एक सीधी लाइन पर नहीं चलती। उसमें उलझाव है, पर फिल्म में कलाकरों का अभिनय एकदम सधा हुआ है। डैनी, आदिल हुसैन, बृजेंद्र काला, टिस्का चोपड़ा और गीतांजलि थापा ने सधा हुआ अभिनय किया है। डैनी के साथ मुख्य भूमिका में गीतांजलि थापा हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजी जा चुकी हैं। इकावली खन्ना की भूमिका भी उल्लेखनीय है। डैनी इसके पूर्व ‘बेबी’ और ‘नाम शबाना’ फिल्म में दिखाई पड़ चुके हैं। इसके दो साल के बाद बायस्कोपवाले के रूप में उन्होंने अपने बेमिसाल अभिनय की छाप छोड़ी है। बायस्कोपवाला के लेखक और निर्देशक देव मेढेकर लंबे समय से विज्ञापन फिल्में बनाते रहे हैं। यह उनकी पहली फीचर फिल्म है। खास बात ये है कि यह फिल्म रिलीज होने के पहले ही खासी चर्चित हो चुकी थी।

बायस्कोपवाला का मतलब ?

फिल्म में डैनी ने काबुलीवाला की तर्ज पर बायस्कोपवाला का रोल निभाया है। बायस्कोपवाला से मतलब है उस शख्स से है जो सिनेमा की दुनिया दिखाता है। बीते जमाने में बायस्कोप के जरिये फिल्म देखी जाती थी। पांच साल की छोटी-सी बच्ची और एक पश्तून व्यापारी की दोस्ती की कहानी वाली इस फिल्म में डैनी जहां बच्चों के साथ खेलते नजर आते हैं, वहीं युद्ध और दहशत के माहौल में भी अपने बायोस्कोप को बचाये रखने की चुनौती भी उनके सामने है। बहरहाल, फिल्म के डायरेक्टर देब मेढेकर का कहना है कि उन्होंने आज के दौर का काबुलीवाला बनाने की कोशिश की है। फिल्म में फैशन स्टाइलिस्ट मिनी बासु (गीतांजलि थापा) अपने पापा रोबी बासु (आदिल हुसैन) के साथ कोलकाता में रहती है, जो एक मशहूर फैशन फोटोग्राफर हैं। एक दिन रोबी की कोलकाता से काबुल जाने वाले के दौरान हवाई दुर्घटना में मौत हो जाती है। बाद में मिनी का नौकर भोला (ब्रजेंद्र काला) उसे घर आए मेहमान रहमत खान (डैनी डेंगजोप्पा) से मिलवाता है। मिनी को पता चलता  है कि उसके पिता ने हत्या के मुकदमे में जेल में बंद रहमत को कोशिश करके जल्दी छुड़वाया था। 

मिनी को बाद में यह भी पता चलता है कि रहमत उसके बचपन में घर आने वाला बायस्कोपवाला ही है। एक बार रहमत ने अपनी जान पर खेलकर मिनी को बचाया था। दरअसल, रहमत मिनी में अपनी पांच साल की बेटी की झलक देखता था, जिसे वह अफगानिस्तान में ही छोड़ आया था। अब मिनी कोलकाता में तमाम लोगों से मिलकर उसके जेल जाने से की सच्चाई का पता लगाती है और उसके खोए परिवार को तलाशने अफगानिस्तान भी जाती है। इसके बाद फिल्म में थ्रिलर और सस्पेंस आता है। मिनी यह पता लगाने की कोशिश करती है कि क्या रहमत निर्दोष था, उसे जेल क्यों जाना पड़ा था? इन बातों का फिल्म में जिस रूप में खुलासा होता है, उससे फिल्म काफी रोचक बन गई है और दर्शकों को बांधे रखने में सफल साबित होती है। यह बात अलग है कि इस फिल्म की कहानी रवींद्रनाथ टैगोर की काबुलीवाला से मिलती-जुलती तो है, पर यह काबुलीवाला नहीं, बायस्कोपवाला है। इसे काबुलीवाला से प्रेरित कहा जा सकता है।

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