कंगना रनौट : एक रोल मॉडल तय नहीं कर सकता भेड़ चाल का दीवाना समाज

वो वहीं कंगना  है जो अपनी बहन रंगोली पर हुए एसिड अटैक के बाद भी डरी नहीं, बल्कि इसी समाज से लड़ती रही। फिर भी देखिये क्या बिडम्बना है न एसिड अटैक बंद हुए न पारिवारिक और सामाजिक शारीरिक शोषण...

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हाइलाइट्स

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भेड़ चाल चलने वाला समाज अपना एक रोल मॉडल तय नहीं कर पा रहा वहाँ ऐसे संवेदनशील मुद्दों को मार्केटिंग टूल्स बना कर कंगना खुद के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रही हैं। जल्दबाजी और उत्सुकता के चक्कर में कुछ भी बोल जाना कहीं से भी फायदे  का सौदा नहीं। फायदे से अगर दिक्कत हो रही है आपको तो ये समझ लीजिये कि कोई भी व्यावसायिक फिल्म बिना फायदे का लक्ष्य दिये शुरू ही नहीं की जा सकती।

 

मनीष जैसल

हिमाचल प्रदेश के मंडी के राजपूत खानदान में जन्मी बॉलीवुड की स्टार अदाकारा कंगना रनौट इन दिनों चर्चा के केंद्र में एक बार फिर से हैं। दो बड़े टीवी शो पर उनका साक्षात्कार इसकी मुख्य वजह बनी है। दोनों ही में उन्होंने बड़ी बेबाकी और दिलेरी से अपने साथ हुए शोषण को बताया है। दोनों में ही मौका फिल्म के प्रमोशन का था।  

2006 में बनी महेश भट्ट निर्देशित फिल्म गैंगस्टर में सिमरन नाम की लड़की से शुरू हुआ यह सफर उनकी आगामी हंसल मेहता निर्देशित फिल्म सिमरन तक पहुँच चुका है। पारिवारिक माहौल भले ही राजसी और ऐशों आराम वाला रहा हो लेकिन बतौर कंगना वो, वहाँ के माहौल में कभी खुश नहीं रहीं। आज भी जब कभी वो अपने माँ बाप के घर जाती हैं तो वहाँ उन्हे ज्यादा दिनों तक रहना मुनासिब नहीं लगता। चैन अपने खुद के मुंबई में खरीदे घर में आता है।

जी हाँ ऐसे कई लड़कियां भारतीय सिनेमा उद्योग में हमें दिख जाएंगी जो अपने परिवार,समाज से लड़ते झगड़ते इस सिनेमाई चकाचौंध में फंस जाती हैं। फंसना इसलिए भी क्योंकि अगर आंकड़ा निकालेंगे तो सिनेमा उद्योग के कई पुरुष अभिनेता, निर्देशक, और निर्माता बेपर्दा हो जाएंगे,  भले ही वो स्त्री विमर्श और न जाने किस-किस विमर्श पर अच्छा सिनेमा बना या उनमें अभिनय कर रहें हो।

कंगना की दिलेरी से नजरबंदी नहीं की जा सकती। लेकिन फिर भी कुछ बड़े सवाल हमारे ही समाज पर जरूर उठते हैं।

परिवार का स्ट्रक्चर हमें संस्कृति की सीख भी देता है वहीं दूसरी तरफ गुलामी सहने की प्रथम पाठशाला भी। दोनों से आपको मतभेद हो सकते हैं। और होने भी चाहिए। कंगना अपने आई ए एस दादा की उन उन यातनाओं को साझा कर चुकी है जो आज भी हमारे समाज की सच्चाई हैं। नज़र अंदाज करेंगे तो कंगना के आगे आने का कोई मतलब भी नहीं निकलता। कंगना आज जिस पोजीशन में है वह सर्वोच्च है। यहाँ तक पहुचने में भले ही कई कंगना ने इंड्रस्ट्री के पुरुष कलाकारों की मदद ली हो लेकिन उनकी पोल खोल कर आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए दरवाजे भी खोले हैं। समझौता भले ही कंगना ने अपने जीवन में न किया हो, लेकिन उन नयी अभिनेत्रियों को भी वह ऐसा संदेश दे रही है जिससे वह सचेत रहें। निर्भीक रहें।

हमें यहाँ बताने की जरूरत नहीं कि कंगना का किस-किस ने शारीरिक और मानसिक शोषण किया है। यह काम ब्रेकिंग न्यूज वाले मीडिया ने नमक मिर्च लगा कर न जाने कब का पेश कर दिया है। बात यहाँ और कितनी कंगनाओं की  करें जो आज भी इस चका चौंध में दफ़न है। उन्हें क्या हमारा मीडिया खोज पाएगा ? 

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मॉरल सपोर्ट कहीं न कहीं कंगना से साथ तो रहा ही है लेकिन ऐसी कई नई अभिनेत्रियाँ है जो इस उद्योग में आने के बाद अपने परिवार को छोड़ चुकी हैं, उन्हें इसी मायाजाल ने अपना शिकार बना लिया। आज वो खोई हैं गुमनामी के अंधेरे में।

उन पत्रकारों पर भी संदेह होने लगता है जो बाबा राम रहीम और आशा राम के साथ खड़े हुए कभी दिखते है तो कभी कंगना की दिलेरी पर 1-1 घंटे की अदालत लगाते हैं। दोनों ही बाबाओं ने आखिर शोषण तो लड़की का ही किया। लेकिन पत्रकार महोदय राम रहीम के समर्थकों की भीड़ दिखा दुष्प्रचार रच रहे थे। इन्हीं मीडिया रिपोर्टों के आधार पर एक बड़ी पार्टी के सत्तासीन अध्यक्ष ने ये तक कहा कि इतनी भीड़ को देख न्यायालय को फैसला बदल देना चाहिए था या फैसला टाल देना चाहिए था।

उन पत्रकारों पर भी तरस आता है जो कंगना की फिल्मों में उनके अभिनय से ज्यादा उनके कपड़ों को खास तवज्जो देते आये हैं। कई पत्रकार  ग्लैमराइज़  होने की परिभाषा को कंगना के समकक्ष मानते हैं।

कंगना ने अपने जीवन संघर्ष को अपने अभिनय में भी ढाला है। गैंगस्टर, फैशन, क्वीन, नु वेड्स मनु रिटर्न्स, रिवॉल्वर रानी, कृष जैसी अन्य फिल्मों से वह चर्चित और प्रभावी दिखी भी हैं।

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कंगना को बेबाक और जिद्दी माना जाता है। उनका  यह जिद्दीपन उनकी आगामी फिल्म सिमरन के प्रमोशन में भी देखा जा सकता है। उन्होंने फिल्म को प्रमोट करने के वजाय अपने निजी जीवन को उकेर कर जिस तरह इस माध्यम का प्रयोग किया है वह आगे आने वाले दिनों के दूसरे अभिनेताओं के जरिए अगर प्रयोग हुआ तो वह गलत असर पड़ता दिखेगा। उदाहरण के लिए अगर संजय दत्त या सलमान अगर दर्शकों से अपने अच्छे या बुरे अनुभवों को शेयर कर लुभाएँगे तो दर्शक प्रभावित होगा। उनके किए पर सभी पर्दा डाल लेंगे। 

कंगना आज की सदी की बड़ी अभिनेत्रियों में जगह बना चुकी हैं ऐसे में उन्हे इस समाज से इस तरह की दया दृष्टि मांगने की जरूरत नहीं महसूस होनी चाहिए। यहाँ वही समाज है जहाँ किसी लड़की के साथ रेप होने की दशा में लड़की पर सवाल उठाने से कोई पीछे नहीं हटता। वहीं दूसरी तरफ मोमबत्ती लेकर मेट्रो सिटी में मार्च करते भी लाखों दिख जाएंगे। निर्भया कांड  के बाद से न जाने कितनी घटनाएँ हो चुकीं इसका इस समाज के लोगों पर कोई खास असर नहीं दिखा। हम बलात्कारी बाबाओं के समर्थन में भी आसानी से खड़े हुए देखे जा रहे हैं। सोचिए आप भी, क्योंकि मीडिया आपको सोचने का समय ही नहीं दे रहा। वह वही दिखाता है जो उसे दिखाने को बोला जा रहा।

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कंगना के साथ परिवार वालों ने मानसिक और शारीरिक शोषण, फिल्म उद्योग के दो बड़े नाम आदित्य पंचोली और रितिक रोशन ने शोषण किया। यह कहीं से भी प्रमोशन का मुद्दा नहीं है। इसे इस इवेंट से एकदम दूर रखा जाना चाहिए था। कंगना को सही मंच पर इसका इस्तेमाल करना चाहिए था। ऐसा भी नहीं है कि कंगना ने पहली बार इंड्रस्ट्री और परिवार के खिलाफ़ अपनी आवाज को दर्शकों पाठकों तक पहुचाई है। हम आज जिस कंगना की वाह वाही कर रहें है वो वहीं कंगना  है जो अपनी बहन रंगोली पर हुए एसिड अटैक के बाद भी डरी नहीं, बल्कि इसी समाज से लड़ती रही। फिर भी देखिये क्या बिडम्बना है न एसिड अटैक बंद हुए न पारिवारिक और सामाजिक शारीरिक शोषण। दोनों समानान्तर चल रहे हैं। 

रितिक और कंगना के मसले पर तूल देने से बेहतर है कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया जाए। नहीं तो इस यह समाज फैसला सुनाने में माहिर है। कैसे ?  इसका जवाब आप में ही अंतर्निहित है। एक बार  फिर रोल मॉडल बन चुकी कंगना को भी अपनी बातों को रखने से पहले यह सोचना चाहिए था कि यहाँ उनके बोलने का असर कितना होने वाला है। जब हाल ही में बाबाओं के समर्थकों की कारस्तानी हमने आपने देखी हो।

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भेड़ चाल चलने वाला समाज अपना एक रोल मॉडल तय नहीं कर पा रहा वहाँ ऐसे संवेदनशील मुद्दों को मार्केटिंग टूल्स बना कर कंगना खुद के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रही हैं। जल्दबाजी और उत्सुकता के चक्कर में कुछ भी बोल जाना कहीं से भी फायदे  का सौदा नहीं। फायदे से अगर दिक्कत हो रही है आपको तो ये समझ लीजिये कि कोई भी व्यावसायिक फिल्म बिना फायदे का लक्ष्य दिये शुरू ही नहीं की जा सकती। इसमें तो कंगना ने हंसल मेहता को अपने नाम और शोहरत के जरिये फिल्म को आगे ले जाने की बात भी स्वीकारी है।

कंगना को ध्यान देना चाहिए कि उनकी लड़ाई जितनी परिवार, और इड्रस्ट्री के भाई भतीजावाद,शारीरिक शोषण के किस्सों से है उतना ही खतरा इस दर्शक वर्ग से भी है। इसीलिए बी केयरफुल।

कंगना के अब तक के सबसे पावरफुल वयानों में यही लगा जब वो कहती है कि “मुझे ख़ान के साथ काम करने के लिए बहुत प्रस्ताव आ रहे हैं लेकिन मैं ही नहीं करना चाहती क्योंकि मुझे उनसे ज़्यादा नहीं तो उनके बराबर का काम चाहिए.”.  जिस दिन ये हो पाएगा स्टार धराशाही हो जाएंगे। तीनों खानों को चुनौती देने वाला अभी तक इंड्रस्ट्री में आस पास दिख नहीं रहा। सही समय का इंतजार जरूरी है। लोहार की मार की जरूरत है। मुझे उम्मीद है वो सुबह कभी तो आएगी।

 

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