नागराज मंजुले : तो क्या बॉलीवुड की चाहत में बनाई मराठी फिल्में ?

हाइलाइट्स

क्षेत्रीय सिनेमा की जब बात होती है तब मराठी सिनेमा को ही औसत दर्जे पर आँका जाता है। सामाजिक मुद्दों की परछाई उनमें देखी जा सकती है। वहीं तमिल टेलगु कन्नड मलयालम उड़िया ने तो अपनी ऐसी मार्केटिंग की है जिससे वो बॉलीवुड को भी व्यावसाइक रूप में टक्कर दे रहा है। मराठी को भी अगर अन्य क्षेत्रीय सिनेमा की तर्ज पर आप ले जाना चाहते हैं तो यह आपकी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी बनती है कि मंचों से सामाजिक मूल्यों को बनाने वाले निर्देशक की मिलने वाली पदवी से अपने आपको दूर करेंगे।

मनीष जैसल

महाराष्ट्र में रहने वालों से अक्सर उत्तर भारतीय दोस्त और परिजन पूछा करते हैं कि मराठी सीख ली क्या ? जवाब में हाँ या नहीं आता है। मुझसे भी कोई यह सवाल करें तो मुझे इसके जवाब के लिए थोड़ा सोचना पड़ता है। दरअसल मराठी सिनेमा देखने की आदत ने मराठी को समझना सिखा दिया। बोलना फिलहाल नहीं आया। समझना भी मुझे मराठी के सुपरस्टार बन चुके निर्देशक नागराज मंजुले के सिनेमा से आया। उनकी फ़ैन्ड्री और सैराट का कायल हूँ। अब आगे शायद ही उनकी बनाई फिल्मों को पसंद कर पाऊँ।

6 से अधिक फिल्मों में एक्टिंग और 3 फिल्मों का निर्देशन कर चुके नागराज पोपटराव मंजुले ने अभी बॉलीवुड को तमाचा मारा ही था कि खुद वो भी उसी माया जाल में फंसने जा रहे हैं। उनकी सैराट इतना व्यावसायिक हिट हो गयी कि निर्देशक अपनी लाइन लेंथ ही बदल बैठा। सामाजिक मुद्दे उठाने वाले संवेदनशील निर्देशक का इस तरह व्यवसाय में लिपट जाना दरअसल सिने प्रेमियों को अखरता है।

सैराट और फैन्ड्री जिस समाज के दर्द को बयान करती है निर्देशक उस समाज को कहीं छोड़ तो नहीं देगा ? क्या इतनी संवेदनशील फिल्में बनाने के बाद उनका बॉलीवुड में व्यावसायिक होने के इरादे से जाना सही फैसला है ? जबकि एक से बढ़कर एक निर्देशक पहले ही जड़े मजबूत किए बैठे हैं। वो सैराट वाले समाज की ही कहानी को मसाला में लपेट कर हमें दिखा रहे हैं। पूछने पर यह भी जवाब देते हैं कि मसाला ही बॉलीवुड ही असली पहचान है। दर्शकों को जोड़े रखने के लिए यह जरूरी है। ऐसे में मंजुले कितना सफल होंगे यह देखना होगा।

मुझे इतिहास में ज्यादा जाने की जरूरत नहीं फिर भी यह कह सकता हूँ शुद्ध भोजपुरिया दर्शकों ने भी कहीं न कहीं सैराट को देखा और समझा होगा। भाषाई बन्दिशों को तोड़ने वाली फिल्मों की श्रेणी में भी तथा इसे सिनेमा के स्लेबस में जोड़ा गया।जिसके बल पर नागराज मंजुले को एक अलग पहचान मिली। फैन्ड्री का आखिरी सीन आज भी देखने पर लगता है कि वह पत्थर हम पर ही लग रहा है। और सैराट की खामोशी और आखिरी में बच्चे का बिलखना हमें गमगीन कर देता है। इसके बावजूद बॉलीवुड में जाना और पैसा कमाना। न पोपटराव न। कहीं गलत फैसला तो नहीं ले रहे आप ? सोचना पड़ेगा एकबार। आपकी लड़ाई सिर्फ समाज से ही नहीं इसी जातिवादी समाज के उन निर्देशकों से भी है जो जरूरी मुद्दों को भी मसाला लगाकर पैसा कमाते है। आप भी उनकी राह पर चलेंगे तो एक फिल्म का निर्देशक बन कर रह जाएगे। यही यह चाहते भी हैं। आपसे अभी मराठी सिनेमा को और भी उम्मीदें हैं। सत्ता के खिलाफ जंग में भी अभी आप उतरे नहीं। दलित आदिवासी महिला विमर्श सिर्फ एक ही फिल्म से नहीं आ पाएगा। खंगालना होगा आपको और भी बहुत कुछ। आपका दर्शक अब तो तैयार हुआ है। बने बनाए दर्शक वर्ग में अपनी पहुंच बनाना फ़ायदे का सौदा तो है लेकिन दूरगामी बिलकुल नहीं।

अमिताभ के साथ काम करने का फैसला लेकर आपने खुद के व्यावसायिक होने का प्रमाण दे दिया वहीं हीरोइज़्म को भी स्थापित कर दिया। खबरों में अमिताभ यह बता रहे हैं कि मैंने अभी उमेश शुक्ला की फिल्म 102 नॉट आउट पूरी हो गयी है। अगस्त में कौन बनेगा करोड़पति का भी शो पूरा हो गया। सितंबर में ठग्स ऑफ हिंदुस्तान की शूटिंग की तरफ लौटूँगा। फिर मंजुले की फिल्म करूंगा। इसके बाद अयान मुखर्जी की ड्रैगन और फिर सुजीत सरकार और कबीर खान की फिल्मों में लगूँगा।

कुल मिलकर अमिताभ खुद को व्यस्त बता चुके हैं। इसमें कहीं भी सुनने देखने को नहीं मिला कि मराठी सिनेमा का एक संवेदनशील निर्देशक अपनी अगली फिल्म में अमिताभ को कास्ट कर रहा है। फिल्म का विषय क्या है आदि। न खुद अमिताभ इस ओर ध्यान दे रहे हैं। उनके लिए फिल्में व्यवसाय से ज्यादा कुछ नहीं। बोरो प्लस से लेकर नवरत्न तक में लगे रहने वाले सदी के महानायक अपने ही बनाए रिकार्डों को भले ही तोड़ते जाएं लेकिन दर्शकों के बीच उनकी छवि आज भी व्यावसायिक अभिनेता की ही दिखती है।

क्षेत्रीय सिनेमा की जब बात होती है तब मराठी सिनेमा को ही औसत दर्जे पर आँका जाता है। सामाजिक मुद्दों की परछाई उनमें देखी जा सकती है। वहीं तमिल टेलगु कन्नड मलयालम उड़िया ने तो अपनी ऐसी मार्केटिंग की है जिससे वो बॉलीवुड को भी व्यावसाइक रूप में टक्कर दे रहा है। मराठी को भी अगर अन्य क्षेत्रीय सिनेमा की तर्ज पर आप ले जाना चाहते हैं तो यह आपकी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी बनती है कि मंचों से सामाजिक मूल्यों को बनाने वाले निर्देशक की मिलने वाली पदवी से अपने आपको दूर करेंगे। दर्शकों को यह अनुमान अपने आप लग जाएगा कि आप यानि नागराज पोपटराव मंजुले ने बॉलीवुड की चाहत में दो मराठी की खूबसूरत फिल्में बनाई। स्टाइब्लिश किया अपने आप को। फिर कूद पड़े इसी मायाजाल में।

ध्यान रहे हिन्दी सिनेमा का दर्शक का अपना टेस्ट है। ध्यान रहे आपने जिस जोनर पर फिल्में बनाई हैं वो हीरो, सुपरस्टार ,सदी के महानायक जैसे महान लोगों के फिल्म में होने से नहीं बनाई जा सकती हैं। सुपरस्टार हीरो आम तौर पर फिल्म बेचने के लिए रखे जाते हैं। आगे आने वाले दिनों में शाहरुख खान के साथ भी काम करने से भी एतराज नहीं होगा बशर्ते आप अपने आप को व्यावसायिक फिल्म निर्देशक बना लें तो।

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