पंचलाइट ने जलायी है एक नयी अलख ...

नयी पीढ़ी को सिनेमा हॉल में एक बार फिर से गाँव को दिखाने के लिए प्रेम मोदी का धन्यवाद दर्शकों को देना चाहिए. उन्होने खुद जोखिम भरा काम करने के अलावा एक सकारात्मक सोच का सिनेमा बनाने की कवायद शुरू की...

अतिथि लेखक

रेणु की पंचलाइट आज भी है प्रासंगिक ।

मनीष जैसल

फिल्म तीसरी कसम (1966) के नायक हीरामन (राजकपूर) और नायिका हीराबाई (वहीदा रहमान) को स्मृतियों से भुला पाना हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के लिए आसान नहीं है . हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम को गीतकार शैलेंद्र ने बतौर निर्माता तीसरी कसम में तब्दील किया था . फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य द्वारा किया गया था. नवेन्दु घोष की पटकथा और उनके खुद के जमींदार के किरदार को याद कर उनकी पीढ़ी आज भी आनंदित होती है. हालांकि फिल्म शुरुआत में फ्लॉप रही, बाद में इसका जुनून दर्शकों पर स्वत: चढ़ने लगा था. फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी हुई थी.  

फ़िल्म के बनने की कहानी ही अपने आप में किसी कहानी से कम नहीं थी. यह जानना जरूरी है कि निर्माता को अंडरग्राउंड तक होना पड़ा था. फिर भी वक्त बदलते देर नहीं लगती, आलम यह है कि फिल्म के गीत आज भी हमें सराबोर करते है . हम यूहीं बैठे बैठे कभी भी  शैलेंद्र के लिखे गीत सजन रे झूठ मत बोलों खुदा के पास जाना है गुनगुनाने लगते है .

फणीश्वरनाथ रेणु की ही कहानी पंचलाइट पर हाल ही में बनी फ़िल्म पंचलैट का निर्माण हुआ है. यह कहा जा सकता है कि यह शैलेंद्र जैसे निर्माता की अगली पीढ़ी का काम है. यहाँ काबिले-गौर है कि उस दौर में शैलेंद्र ने तीसरी कसम का विज्ञापन बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर किया था. अनूप टोडी,अनिल सोमानी,और प्रमोद गोयल के संयुक्त धन से बनी फ़िल्म पंचलैट का प्रमोशन भी उन्ही की टीम द्वारा बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर लेकिन काफी लगन से  किया जा रहा है. रात-रात भर कस्बों और शहरों में फ़िल्म से जुड़े लोग पोस्टर को चिपकाते देखे जा सकते है.यह अच्ची पहल का हिस्सा माना जा सकता है. मौजूदा विज्ञापन के दौर में मुख्य धारा के सिनेमा के लिए यह फैसला घाटे का सौदा भी माना जा सकता है. 

Panchlait Imageयह समानता हमें उस दौर की भी याद दिलाती है जब तीसरी कसम फ्लॉप हुई थी. पंचलाइट देखते हुए मुझे भी तीसरी कसम के दौर का भयानक दृश्य (किताबों में पढ़े फ़िल्म के रहस्यों के जरिये) महसूस होने लगा जब शैलेंद्र अपनी फ़िल्म की असफलता के बाद एक एक पाई के लिए परेशान थे. क्या होगा इस देश के सिनेमा के दर्शकों का जहां फिल्मों के चयन को लेकर बड़े विरोधाभाष देखने को मिलते  हो. सौ करोड़िया फिल्मों में  सामाजिक यथार्थ शून्य है  और फ्लॉप फिल्मों  में सामाजिक यथार्थ की भरमार होती है .

प्रेम प्रकाश मोदी के निर्देशन में बनी फ़िल्म पंचलैट अपने स्वरूप की उम्दा फ़िल्म मानी जा सकती है. निर्देशक ने रेणु की कहानी का मूल अंत तक फ़िल्म में जिंदा रखा है. जो साहित्य से सिने रूपान्तरण करने में कई बार कठिनाई भरा होता है. गौरतलब है कि यह निर्देशक की पहली हिन्दी फिल्म है.  

अमितोष नागपाल, राजेश शर्मा,ब्रिजेन्द्र काला, प्रणय नारायण, इकबाल सुलतान, ललित परीमू, अनुराधा मुखर्जी, अरूप जागीरदार, कल्पना झा, मालिनी सेनगुप्ता, पुण्यदर्शन गुप्ता जैसे कलाकारों ने कहानी को अपने स्वरूप में बने रहने में काफी सराहनीय योगदान दिया है .

गोधन (अमितोष नागपाल)और मुनरी (अनुराधा मुखर्जी) के प्रेम सम्बन्धों के साथ महतो टोला में नए आए पंचलाइट और उससे समाज में आए प्रभाव को चित्रित किया गया है. महतो टोला की अन्य टोला की भांति अपने मुद्दे है जिनहे फिल्म के सहारे दिखाने की कोशिश की गयी है.

अमितोष में तो राजकपूर की छाप हमें देखने को मिलती है. मेरी नज़र में अगर आवारा का रिमेक बनाया जाए तो अमितोष से बेहतर शायद ही कोई अन्य कलाकार इसे निभा पाने में सक्षम होगा.

गीत कार शकील का गाया हम तुम से मोहब्बत कर के सलम उसकी जुबान पे ऐसा चढ़ा है कि उस खुमारी में पूरा गाँव खोया है. वह खुद दबंग,आरक्षण,रंगरेज और बेशर्म जैसी फिल्मों में अभिनय के अलावा निर्देशन, पटकथा लेखन और संवाद लेखन में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके है. हिन्दी मीडियम फ़िल्म में संवाद लेखन का सराहनीय काम वो कर चुके है.

मुनरी के किरदार में अनुराधा को देखकर पता ही नहीं लगाया जा सकता कि अपने व्यक्तिगत जीवन में स्टाइलिश लड़की ने गवई किरदार निभाया होगा. 

एक छोटी सी कहानी को 2 घंटा 55 मिनट का सिनेमाई रूप देना अपने आप में चैलेंजिंग काम था. जिसे फ़िल्म के लेखक राकेश त्रिपाठी ने बखूबी निभाया .

1955 के दौर की रेणु की कहानी में समाज की जातीय भिन्नता और उनके स्वरूपों को हमने पहले भी पढ़ा होगा लेकिन सिनेमाई पर्दे पर देखने पर एक अलग अनुभूति होती है.

शूटिंग के लिए गाँव का चयन निर्देशक की सूझबूझ दर्शाती है लेकिन गाँव की डेंटिंग पेंटिंग में जिस तरह ज्यादा फोकस किया गया वह मुझे कहीं न कहीं खल  रहा था. घर की दीवारें एशिएन पेंट की टैग लाइन जैसे चीख चीख कर बोल रही थी कि इनमे अलग से लीपा पोती की गयी है. वहीं दूसरी तरफ लोक को जिंदा रखने के लिए निर्देशक ने लोक संगीत का बेहतर इस्तेमाल भी किया  है. पात्रों के पहनावें ओढ़ावे में बंबइया टच देना कहीं से भी रेणु की कहानी के साथ न्याय देता नहीं दिखता. जबकि निर्देशक ने एक दृश्य में दलित / अछूत जाति के पात्र का चित्रण करते हुए उस दौर की उसकी स्थिति के साथ पेश किया. दृश्य में एक साँवली बूढ़ी महिला घड़े पर पानी ले जा रही है और गोधन उससे वह घड़ा लेकर अपने शहरी और पढे लिखे होने का परिचय देता है. तभी महिला का आदमी जो अर्धनग्न है, गोधन से घड़ा ले लेता है.  दृश्य बहुत ही शांतप्रिय है लेकिन और अन्य दृश्यों की  तुलना में काफी अराजक भी.

पात्रों ने इतने चमकदार और स्त्री किए हुए कपड़े पहने है कि लगता है बाहर से कलाकार लाये गए है न कि खुद उस गाँव के रहवासी है. किसी गांव को जीने के लिए वहाँ घुलना मिलना बहुत जरूरी है. प्रेमचन्द्र की कहानी कफन में घीशु माधव अगर सफ़ेद कुर्ता धोती पहने भुंख और गरीबी की संवेदना व्यक्त करेंगे तो दर्शक उससे कभी भी जुड़ नहीं पाएंगे . 

रेणु की कहानी का मूल ही नयी प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल और उसके आने से होने वाले बदलाव और प्रभाव को दिखाना था. लेकिन फ़िल्म मौजूदा सिने प्रोद्योगिकी का बेहतर इस्तेमाल कर पाने में असफल दिखती है. रात के दृश्यों में भी इतनी ज्यादा ओवर लाइट लगाकर शूटिंग करना कहीं से भी उचित नहीं दिखता.  रासलीला के दृश्यांकन के दौरान के सभी दृश्य बताते है कि खूब तामझाम और प्रकाश व्यवस्था का प्रयोग किया गया है. जो गाँव को दर्शकों के अन्तर्मन में उकेरने में बाधक है. निर्देशक को यह नहीं भूलना चाहिए कि फ़िल्म में रेणु का वह गाँव है जहां अभी पंचलाइट के लिए ही संघर्ष चल रहा है. वहाँ आप आर्टिफ़िशियल लाइट देकर उसे और भी गंदा बना रहे है.

100 से अधिक साल के हमारे सिने इतिहास में हजारों फिल्में गाँव का प्रतिनिधित्व करती हुई बनी है. कई बार     काल्पनिक कहानी में भी गाँव एक पात्र की तरह नज़र आता है लेकिन यहाँ तो कहानी के मूल में ही गाँव है . जहां प्रकाश के लिए संघर्ष हो रहा है . एक टोला की दूसरे टोला से प्रतिस्पर्धा प्रकाश को लेकर ही है. ऐसे में निर्देशक को कहानी का मूल समझने की कोशिश इस एंगल से भी करनी चाहिए थी . इसके बावजूद पंचलाइट में कलाकारों की संवाद अदायगी शानदार है. महतो टोला के पंचों ने अपनी छाप छोड़ी है. इसका कारण उनका खुद का सिने और थियेटर अनुभव भी माना जा सकता है . यशपाल  शर्मा वेलकम टू सज्जनपुर के रामसिंह की तरह यहाँ भी दबंग है और अच्छे संवाद से दर्शकों को अपनी ओर खींच रहे है.  पंच की भूमिका में बृजेन्द्र काला एक बार फिर अपने अभिनय से पर्दे पर छाए है. गीत संगीत की कमी फ़िल्म में खलती है. हालांकि रेणु की कहानी में ही इसके लिए स्पेस कम था. फिर भी लेखक ने गीतों के लिए जगह बनाई है लेकिन वह दर्शकों की जुबान में नहीं चढ़ पाये . आप वाकई अगर साहित्य प्रेमी है तो यह फ़िल्म आपको सिने प्रेमी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी .

साहित्य से सिनेमा का रूपान्तरण बंबइया सिनेमा ने बहुत किया लेकिन प्रेम मोदी की इस फ़िल्म ने यह साबित किया कि अब सिनेमा फिर गाँव की तरफ फिर से लौटेगा और तो और खुद गाँव की मिट्टी से जुड़े लोग इसको बनाने में सफल होंगे.  

नयी पीढ़ी को सिनेमा हॉल में एक बार फिर से गाँव को दिखाने के लिए प्रेम मोदी का धन्यवाद दर्शकों को देना चाहिए. उन्होने खुद जोखिम भरा काम करने के अलावा एक सकारात्मक सोच का सिनेमा बनाने की कवायद शुरू की है. जो सिनेमा के घोर व्यावसायिक युग में किसी आश्चर्य से कम नहीं है.साहित्य से सिनेमा की ओर आने में प्रेम मोदी की पंचलाइट  एक नए दृष्टिकोण को जन्म देगी, क्योकि पंचलाइट का प्रकाश दर्शकों की जेब में डाँका डालने वाले निर्देशकों  को चिन्हित कर सबक सिखाने में  काफी मदद करेगा ....

 

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