2017 की लीक से हट कर कुछ फिल्में

70 और 80 के दशक में समान्तर धारा की ऐसी फिल्में बनी थीं जो बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह सफल रही थीं। लेकिन आगे चल कर ऐसी फिल्में बननी लगभग बंद ही हो गईं......

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

70 और 80 के दशक में समान्तर धारा की ऐसी फिल्में बनी थीं जो बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह सफल रही थीं। लेकिन आगे चल कर ऐसी फिल्में बननी लगभग बंद ही हो गईं। बहरहाल, समय-समय पर कुछ बेहतरीन फिल्में आती रहीं, जैसे 2016 में ‘पिंक’ और ‘दंगल’। इस साल भी कुछ ऐसी फिल्में आई हैं, जिनका बजट तो अधिक नहीं था, पर संदेश बहुत बड़ा था।

- वीणा भाटिया

व्यावसायिकता के इस दौर में बॉलीवुड में कुछ ऐसी फिल्में आती ही रहती हैं, जिनसे लगता है कि आज भी सार्थक फिल्म बनाने वालों की कमी नहीं है। खास बात यह है कि विशुद्ध मसाला फिल्मों से अलग सामाजिक संदेश देने वाली ये फिल्में सफल भी साबित हुई हैं। पहले यह माना जाता था कि दर्शक मसाला फिल्में ही पसंद करता है और यथार्थवादी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिट जाती हैं। पर इस साल रिलीज हुई कुछ फिल्मों ने इस धारणा को ग़लत साबित किया है।

ये फिल्में बहुत ही कम बजट में बनीं और लोकप्रिय होने के साथ-साथ कमाई भी अच्छी कर गईं। इससे पता चलता है कि अगर साफ-सुथरी और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर फिल्में बनें तो दर्शक उन्हें पसंद करते हैं। सच पूछा जाए तो दर्शकों का एक ऐसा वर्ग है जो स्वस्थ मनोरंजन वाली फिल्में देखना चाहता है, पर ऐसी फिल्में बनती ही नहीं के बराबर हैं।

70 और 80 के दशक में समान्तर धारा की ऐसी फिल्में बनी थीं जो बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह सफल रही थीं। लेकिन आगे चल कर ऐसी फिल्में बननी लगभग बंद ही हो गईं। बहरहाल, समय-समय पर कुछ बेहतरीन फिल्में आती रहीं, जैसे 2016 में ‘पिंक’ और ‘दंगल’। इस साल भी कुछ ऐसी फिल्में आई हैं, जिनका बजट तो अधिक नहीं था, पर संदेश बहुत बड़ा था।

हिंदी मीडियम भारतीय मध्य वर्ग के जीवन की ऐसी विसंगति को उजागर करती है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। दरअसल, आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी अंग्रेज़ी एक भाषा से ज्यादा स्टेटस सिंबल ही है। इसी को देखते हुए आज बड़े शहर हों या कस्बे,हर जगह इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गए हैं। इससे कई तरह की विडंबनाएं पैदा हुई हैं, जो कई बार बहुत ही त्रासद और हास्यास्पद भी हो जाती हैं। इसी विडंबना को दिखाने की कोशिश ‘हिंदी मीडियम’ में की गई है। कहा जा सकता है कि यह अपने तरह की खास ही फिल्म है जो दर्शकों को गुदगुदाने, उनका मनोरंजन करने के साथ ही अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है।

दूसरी उल्लेखनीय और काफी विवादास्पद रही फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ रही। शुरू में सेंसर बोर्ड ने इसे प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया था। अदालत के दखल के बाद यह फिल्म रिलीज हो सकी। इसे दर्शकों बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इस फिल्म को विदेशों में भी काफी सराहा गया। इस फिल्म में तरह-तरह की पाबंदियों में जीवन गुजारने वाली महिलाओं के प्रतिरोध की कहानी है। दरअसल, यह फिल्म स्त्रियों के ठहराव भरे जीवन में सपनों के कुछ रंग दिखातीहै। यह फिल्म महिलाओं की आजादी को जकड़ने वाली बेड़ियों पर चोट करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि हमारे समाज में औरतों के दुखों की कहानी एक जैसी ही है, चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाली हों, कुंवारी हों, शादीशुदा हों या फिर उम्रदराज। दुखों से मुक्ति की छटपटाहट में वे किसी न किसी फैंटेसी में जीती हैं और फैंटेसी को सच होते देखना चाहती हैं।

इसी साल ‘न्यूटन’ भी रिलीज हुई। बिना किसी शोर-शराबे के यह फिल्म आज की चुनावी राजनीति की सच्चाई को सामने लाती है। ऐसी फिल्म दशकों में बनती है। यही वजह है कि इसे  ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया। यह फिल्म लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई है। फिल्म में छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में चुनाव के लिए सरकारी कर्मचारियों का एक दल भेजा जाता है। फिल्म में बगैर किसी लाग-लपेट के एक जटिल राजनीतिक कहानी को बुना गया है। इसमें दुर्गम आदिवासी इलाकों में चुनाव और नक्सली प्रभाव के बीच सत्ता तंत्र के दबाव व द्वंद्व से जूझ रहे आदिवासी हैं, वहीं न्यूटन जैसे ईमानदार अफसर का संघर्ष और जनतंत्र के प्रति उसकी आस्था लोगों में एक उम्मीद जगा देती है। जनतंत्र में चुनाव के नाम पर चल रहे खेल को उजागर करते हुए यह फिल्म देश के सड़े- गले तंत्र को परत-दर-परत खोल कर सामने रख देती है।

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ पर आधारित एक फिल्म भी इसी साल आई। इसमें एक युवक गोधन का मुनरी नाम की एक लड़की से प्रेम होता है, जिसके कारण गांव के लोग उसका बहिष्कार कर देते हैं। एक दिन गांववाले चंदा जुटा कर मेले से पेट्रोमेक्स खरीद कर लाते हैं, जिसे वे पंचलाइट कहते हैं। पूरा गांव उसे देखने के लिए उमड़ पड़ता है, लेकिन समस्या तब खड़ी हो जाती है, जब किसी को उसे जलाना ही नहीं आता। इससे बहुत ही हास्य की स्थिति बनती है। दूसरे गांव से जो लोग पंचलाइट देखने आते हैं, वे मजाक उड़ाने लगते हैं। बाद में मुनरी बताती है कि गोधन पंचलाइट जलाना जानता है। तब गांव वाले गोधन को बुला कर उससे पंचलाइट जलवाते हैं और दोनों को माफ कर देते हैं। रेणु जी का साहित्य जिस तरह आंचलिकता के सौंदर्य से ओतप्रोत है, वह इस फ़िल्म में भी दिखाई पड़ता है। यह बहुत ही मजेदार फिल्म है।

Some movies aside from the leaked 2017कड़वी हवा’ भी इस साल की सबसे महत्त्वपूर्ण फिल्मों में रही। यह फिल्म जलवायु परिवर्तन की समस्या को केंद्र में रख कर बनाई गई है। जलवायु परिवर्तन की समस्या दुनिया की सबसे प्रमुख पर्यावरणीय समस्या बन कर उभरी है। इससे मौसम का चक्र बिगड़ता जा रहा है। प्रदूषण के कारण हवा ज़हरीली और दमघोंटू होती जा रही है। यही नहीं, प्रकृति ने जो चीज़ें सबके लिए सुलभ की है, उस पर भी चंद मुनाफ़ाखोरों ने कब्ज़ा जमा लिया है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि मौसम का चक्र बिगड़ने से खेती कैसे प्रभावित होती है। साथ ही, इसे कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या की घटनाओं से जोड़ा गया है। यह फिल्म कोई कपोल कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थ है और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे लोगों की हालत को दिखाती है। यह एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से निबटने के लिए अभी ही तैयार हो जाएं, नहीं तो स्थितियां बद से बदतर होती चली जाएंगी। 

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