चक्रव्यूह में फंस गए मोदी... नोटबंदी की राह पर जीएसटी

सवाल ये भी है कि आम आदमी को राहत की बात उसे चुनाव के वक्त क्यों याद आई? क्या यह गुजरात में आचार संहिता का उल्लंघन नहीं  होगा? चुनाव आयोग इस तरह अपने नियमों की छीछालेदर बर्दाश्त कर लेगा या .........

हाइलाइट्स

यशवंत सिन्हा जैसे पढ़े-लिखे लोगों से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह जैसे बड़े अर्थशास्त्रियों ने जीएसटी के प्रावधानों की आलोचना की, लेकिन मोदीजी और उनकी सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। अब गुजरात चुनाव सामने दिखे और नजर आया कि यहां के व्यापारी जीएसटी से नाराज़ हैं। राहुल गांधी उसे गब्बर सिंह टैक्स बता रहे हैं और व्यापारी भी उनसे सहमत नजर आ रहे हैं, तो सरकार को लगा कि जीएसटी के कोड़े पर मखमली कपड़ा लपेट देना चाहिए।

GST on the path of Demonetisation

#HamariRai | 13 NOV 2017 | GST के चक्रव्यूह में फंस गए मोदी| #GST on the path of #Demonetisation

तो सरकार को आम आदमी की याद आ ही गई, लेकिन जब जीएसटी लागू हुआ था, तब तो कहा गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं

राजीव रंजन श्रीवास्तव

एक जुलाई को संसद में आधी रात को प्रधानमंत्री ने आर्थिक आजादी का ऐलान करते हुए जीएसटी लागू किया था। ...और हमेशा की तरह सिर्फ अपने मन की बात सुनते हुए इसे गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स न कहकर गुड एंड सिंपल टैक्स कहा था, जिसके बाद देश में क्या हुआ ये सब जानते हैं।

इस नयी टैक्स व्यवस्था में तालमेल बैठाने को लेकर व्यापारियों और ग्राहकों में हाहाकार मच गया। चीजों के दाम बेमतलब बढ़ गए, जीएसटी के नाम पर ठगी होने लगी, लेकिन इसके उलट मोदीजी और जेटलीजी जनता को उलझन में डालकर गुड और सिंपल का राग गाते रहे।

व्यापारियों के लिए कहा गया कि वे टैक्स बचाने की फिराक में रहते हैं, इसलिए जबरन परेशानियों का रोना रो रहे हैं। एक कहावत है- जबरा मारे और रोने न दे। यानी जीएसटी की मार पड़ रही है और रोने की इजाज़त भी नहीं है। देश के छोटे-मंझोले व्यापारियों की हालत इस वक्त ऐसी ही है।

यशवंत सिन्हा जैसे पढ़े-लिखे लोगों से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह जैसे बड़े अर्थशास्त्रियों ने जीएसटी के प्रावधानों की आलोचना की, लेकिन मोदीजी और उनकी सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। अब गुजरात चुनाव सामने दिखे और नजर आया कि यहां के व्यापारी जीएसटी से नाराज़ हैं। राहुल गांधी उसे गब्बर सिंह टैक्स बता रहे हैं और व्यापारी भी उनसे सहमत नजर आ रहे हैं, तो सरकार को लगा कि जीएसटी के कोड़े पर मखमली कपड़ा लपेट देना चाहिए। जिसका नतीजा ये है कि हाल ही में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में करीब 215 आइटम सस्ते कर दिए गए हैं। 178 आइटम को 28 फीसदी टैक्स स्लैब से निकालकर 18 फीसदी पर डाल दिया गया है। इस रियायत से व्यापारी और ग्राहक खुश हैं, और गुजरात भाजपा के नेता भी, क्योंकि उन्हें व्यापारियों की नाराजगी सबसे पहले झेलनी पड़ रही थी।

वित्त सचिव हंसमुख अधिया ने सरकार के देर से आये इस फैसले पर सफाई देते हुए कहा है कि- “पहले जीएसटी के रेट मैकेनिकल तरीके से तय किए गए थे। इसके लिए पहले के टैक्स रेट में वैट और सीएसटी जोड़ा गया और फिर उसे सबसे करीब के स्लैब में रखा गया। दूसरी बात, कई एक से जैसे आइट्म्स अलग-अलग टैक्स रेट में रख दिए गए थे। इनमें सुधार जरूरी था। और तीसरी बात यह कि आम आदमी के इस्तेमाल की कई चीजों में थोड़ी राहत देने की जरूरत थी।“ 

तो सरकार को आम आदमी की याद आ ही गई, लेकिन जब जीएसटी लागू हुआ था, तब तो कहा गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं। उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीजों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा। तो सवाल ये उठता है कि क्या सरकार अब देश हित की योजनाएं नहीं बनाएगी? 

सवाल ये भी है कि आम आदमी को राहत की बात उसे चुनाव के वक्त क्यों याद आई? क्या यह गुजरात में आचार संहिता का उल्लंघन नहीं  होगा? चुनाव आयोग इस तरह अपने नियमों की छीछालेदर बर्दाश्त कर लेगा या भाजपा सरकार को इसके लिए कुछ कहेगा? गुजरात हाई कोर्ट में तो शुक्रवार को राज्य चुनाव आयोग और जीएसटी काउंसिल के चेयरमैन के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई है। देखना है कि उस पर चुनाव के पहले कोई सुनवाई होती है या नहीं।

राहुल गांधी ने अपने प्रचार में जीएसटी को हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया है। सरकार ने जीएसटी पर राहत दी, तो इसका श्रेय भी कांग्रेस ले रही है। गुजरात के मतदाता सरकार के इस खेल को कितना समझ रहे हैं यह नतीजों के बाद पता चलेगा। लेकिन यह तो साफ नजर आ रहा है कि केवल अपनी मर्जी थोपने के लिए सरकार ने बिना किसी तैयारी के जीएसटी लागू कर दिया था, वैसे ही जैसे नोटबंदी को लागू किया गया था। नोटबंदी के बाद भी सरकार ने उसके नियमों में कई बार बदलाव किए थे, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ा था और अब जीएसटी में भी सरकार का रवैया ऐसा ही नजर आ रहा है।

भाजपा सरकार को यह याद रखना चाहिए कि देश कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां आप जनता की जान दांव पर लगाकर अपनी मर्जी के प्रयोग करते रहें। यह जिंदा लोगों का घर है और यहां जिंदगी बनाए रखने के लिए आपके फैसले अहम होते हैं। आपको देश चलाने की जिम्मेदारी जनता ने दी है, तो आइंदा सोच-समझकर फैसले लें।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।