जी-20 नेतृत्व का आत्मघाती रवैया और वैश्विक समस्याएँ

जी-२० एक संकीर्ण सोच से संचालित संगठन है जिसकी निर्विलंब समाधान चाहने वाले वैश्विक संकटों और समस्यों से कोई मतलब नहीं है. ये विश्व की सामान्य जनता के प्रति न तो नैतिक रूप से जबाबदेह है नहीं बनाने......

नरेंद्र कुमार आर्य

            हैम्बर्ग को पुलों का शहर कहा जाता है; मगर, इस बात की बहुत कम संभावना है कि ये विश्व के नागरिक समाज के सम्मुख उपस्थित बड़ी समस्याओं और चुनौतियों से निबटने के लिए कोई रणनीतिक पुल वैश्विक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनयिकों को मुहैया करा पायेगा.

हैम्बर्ग में होने वाले जी-२० शिखर सम्मेलन मे दुनिया की नज़रें सिर्फ सितारों की तरह सजे-संवारे राज्याध्यक्षों और राष्ट्राध्यक्षों पर हैं. मुख्यधारा का मीडिया हमेशा की तरह प्रतिरोध के स्वरों और दृश्यों को वैश्विक जनमानस की दृष्टि से दूर रखने में सफल है. एक वैकल्पिक और बेहतर विश्व की विचाराधरा में यकीन रखने वाले लोगों की चिंताओं और आवाज़ों को सनसनी और शोर-शराबे की कृत्रिम व् आभासी रौनक़ तले दफ़न कर दिया जाएगा.

एक दिन पहले से ही सम्मेलन के विरोध के लिए बड़े स्तर पर मुहीम चलायी जा रही हैं. इस मुहीम का नामकरण 'वेलकम टू हेल' या ' नरक में आपका स्वागत है' किया गया है.

हाफेनस्ट्रास सड़क पर बृहस्पतिवार को आक्रामक विरोध प्रदर्शन हुए, जो १९८० से ही अराजकतावादियों, वामपंथियों, वैकल्पिक विश्व की मांग करने वाले लोगों की पसंदीदा जगह है. १२००० से अधिक लोग इस विरोध प्रदर्शन में शामिल थे.

शुक्रवार, जिस दिन सम्मेलन अपने शीर्ष पर था लगभग १,००,००० से ज्यादा लोग यूरोप के विभिन्न हिस्सों स्केंडेनिवियाई देशों, इटली, स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों से इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल होंगे. २०,००० हज़ार से भी ज्यादा सुरक्षा बालों की तैनाती करनी पड़ी है. साढ़े सात लाख यूरो खर्च कर कामचलाऊ जेलों और अदालतों की व्यवस्था की गयी है ताकि ये सम्मेलन 'सफलतापूर्वक' संपन्न कराया जा सके. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. यूरोप और दुनिया के अन्य देशों के लोगों का मानना है, जी-२० जैसे सम्मेलन आत्मघाती पूंजीवाद और विश्व के भविष्य के लिए खतरनाक विचारधारा और व्यवस्था की वकालत करते हैं, सामान्य नागरिकों के जीवन और हितों को दांव पर लगा कर. लन्दन में हुए जी-२० सम्मेलन को भी अभूतपूर्व विरोध झेलना पड़ा था. ८०००० हज़ार से ज्यादा पुलिसकर्मियों की तैनाती कर लन्दन को छावनी में बदलना पड़ा था. २००१ में जेनोआ में हुए सम्मेलन में सबसे अधिक आक्रमक और हिंसापूर्ण विरोध प्रदर्शन हुए थे.

जी-२० की पहली बैठक २००८ के वित्तीय संकट के बाद पहली बार वाशिंगटन में हुई थी. इतने बड़े स्तर पर छावनीकरण और सुरक्षा के इन्तेजाम इस सम्मेलन की मूलभूत संकल्पना और प्रस्थापनाओं के जन-विरोधी होने की और संकेत करते हैं.

हैम्बर्ग जर्मनी का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और एक आद्योगिक केंद्र भी जहाँ दुनिया के बीस प्रमुख आद्योगिक देशों के राष्ट्र-प्रमुखों को मिलना है और दुनिया के समक्ष उपस्थित चुनौतियों और समस्याओं के बारे में हल निकलना है. मगर ये सब ढकोसले बाजी की एक परिपाटी के तहत ही होगा. ये देश सिर्फ बीस बड़े देश भर नहीं हैं; बल्कि, ये दुनिया के सबसे बड़े शोषक राष्ट्र भी है. दुनिया की तमाम पूँजी या आमदनी (जीडीपी) और विश्व व्यापार के ८०% पर इन्ही देशों का अधिकार है. इन देशों में दुनिया की ६०-६५% तक आबादी भी रहती है. लेकिन, अगर इसमें से भारत और चीन जैसे अपेक्षाकृत 'गरीब' देशों को निकाल दिया जाए तो ये ग्राफ घाट कर आधे से भी कम हो जाएगा. इस को सरल शब्दों में समझने के लिए हम कह सकते हैं की ये देश मुश्किल से दुनिया की २०% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं किन्तु अपने आर्थिक रसूख , एकाधिकार और दबदबे के चलते दुनिया की समग्र आबादी को अपने तानाशाही निर्णयों के चाबुक से नचाते है. ये धनी, ताकतवर और विश्व के संसाधनों पर वर्चस्व रखने वाले देशों का समूह है. इनकी आर्थिक और सामजिक स्थिति ही इनके निर्णयों और नीतियों में दिखाई पड़ती है.

पूँजीवादी विकास का माडल और सोच विश्व की अधिकांश समस्याओं के लिए जिम्मेवार है और विश्व के सबसे बड़े पूंजीपति राष्ट्रों का ये समूह, पूँजीवाद के निर्भीक और स्निग्ध रूप से चलते रहने के बारे में विचार करता है, न कि उससे होने वाली समस्याओं और वश्विक संकटों के बारे में. ऑक्सफेम जैसे रूढ़िवादी संगठन का मानना है कि दुनिया के सबसे धनी १% लोगों के पास विश्व की ९९% पूँजी है.

पूँजी ही सारे संसाधनों को प्राप्त करने का एक जरिया है लोगों, समुदायों और राष्ट्रों के पास. दुर्भाग्यवश इस पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों का वर्चस्व है जिसका तात्पर्य है उन्हें भुखमरी, गरीबी, बीमारी , महामारी , असमानता,पिछड़ेपन  के बहुमुखी संकटों और समस्याओं से इसी तरह जूझते रह कर अमानवीय त्रासदी से गुजरना पड़ेगा.३२ ट्रिलियन से भी ज्यादा काला धन दुनिया के सुरक्षित कर-निरोधी देशों में ज़मा है.

१९६० के आसपास जब दुनिया से परम्परागत उपनिवेशवाद लगभग ख़त्म हो गया था, विकसित और अविकसित देशों की आमदनी में सिर्फ तैंतीस गुने का अंतर था, लेकिन नवउपनिवेशवाद, नवउदारवाद और वैश्वीकरण के कारण आमदनी में असामनता का अंतर बढ़ कर आज १३४ गुने से भी ज्यादा हो गया है. पूँजी लगातार सिकुड़ती जा रही है इने-गिने देशों और धनाड्यों के बीच.

ये बड़ा ही वीभत्स और अश्लील तथ्य है क्योंकि एक तरफ जी -२० जैसे समूहों से मानवीयता, लोकतंत्रीकरण, आर्थिक स्वतंत्रता और विश्व को एक बेहतर जगह बनाने के लोकप्रिय जुमले जनमानस के दिलो-दिमाग में पैठाने की बात होती है और दूसरी तरफ सच्चाई बहुत ही विपरीत, अप्रिय और हिंसक है. अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में ही वहां के सर्वोच्च ०.०१% अमीर लोग देश की २२% पूँजी पर काबिज हैं और 'पूंजीवादी नियमों के अनुसार व्यवहार न करते हुए' अवैध रूप से, वहां की कराधान व्यवस्था को निरंतर धता बताते हुए अपने सम्पति को पनामा और केयमैन जैसे द्वीपों के करमुक्त बैंकों में जमा कर रहे है.

दुनिया आज कई गहरे संकटों से गुज़र रही है जिनके समाधान जिम्मेदार और संवेदनशील वैश्विक नेतृत्व के द्वारा ही खोजे जा सकते हैं. मगर हैम्बर्ग का ये शिखर सम्मेलन भी पिछले कई सम्मेलनों की तरह संकीर्ण हितों की राजनीति, राष्ट्र-केन्द्रित सोच, आपसी मन-मुटाव, व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं व् सनकभरी मूर्खताओं की भेंट चढ़ जाने की मज़बूत संभावनाएँ रखता हैं. जलवायु, वातावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन और पूँजीवाद में गहरा रिश्ता है. विकास के जुमले तले पूंजीपतियों की थैलियों का आकर प्रतिदिन बढता जा रहा है; मगर आम जनता तक इसका कोई लाभ नहीं पहुँचता. हमारे प्राकृतिक में लगातार गिरावट आ रही है और वातावरणीय समस्याएँ जैसे कि प्रदूषण, वैश्विक उष्णता, प्राकृतिक ह्रास,जैव-विविधता में कमी, अम्लीय वर्षा तथा जहरीली गैसों का उत्सर्जन, अत्यधिक जनसँख्या दबाब बाद से बदतर व् भयावह होती जा रही है. साल २०१६ में लगभग ५५ लाख लोग प्रदूषण की वज़ह से मारे गए. भारत प्रदूषण के मामले में भी चीन को मात दे चुका है और वर्ष २०१५ में लगभग ११ लाख अकेले विकास और आद्योगीकरण से उपजे प्रदूषण की भेंट चढ़ चुके है. ट्रंप कह चुके हैं कि अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा क्योंकि इसकी वज़ह से २८ लाख अमरीकियों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा. २८ लाख अमरीकियों की जीविका और ५५ लाख लोगों का जीवन का कुटिल समीकरण एक मानवीय संकट का बड़ा प्रश्न है और अमेरिका ऐसे ही प्रश्नों को नकार कर 'महान' बना है. येल विश्विद्यालय द्वार संचलित एक सर्वे में डेमोक्रट्स, रिपब्लिकन और अन्य सभी राजनीतिक सम्बधता वाले अधिकांश लोगों ने अमेरिका के पेरिस जलवायु समझौते का हिस्सा बने रहने की मांग की है जिसे ट्रंप के रूढ़िवादी इजारेदाराना सोच के कारण त्याग दिया गया है. हैम्बर्ग में भी ट्रंप ऐसी ही सोच ज़ाहिर कर चुके हैं. धार्मिक और जातीय युद्ध, टकराव और हिंसा दुनिया की एक और कठिन समस्या है जिस पर वैश्विक नेताओं के द्वारा किसी सकारात्मक निर्णय पर सम्मति बने मुश्किल लगता है. क्योंकि ये स्वयं राज्य द्वारा समर्थित और प्रायोजित हैं. ग़रीबी का मुद्दा भी उपेक्षित रहने वाला है. लगभग ३ अरब लोग गरीबी और लगभग १.३ लोग घोर गरीबी में रहने के लिए मजबूर हैं. ८० करोड़ लोग इतने गरीब हैं कि दैनिक भोजन जुटाना भी एक चुनौती है. इनमे से ६०% लोग जातीय संघर्ष और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित इलाकों में रहते हैं.अत्यधिक गरीबी का समाधान इतना आसन है कि यदि दुनिया का कोई भी 'सुपर रिच' (जैस कि बिल गेट्स,जैफ बेजोस, बारेन बफेट, जुकरबर्ग या फिर कोई और. बारेन बफेट ने कहा भी है कि प्राकृतिक आपदाएं आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक हैं. ) अपनी ६० बिलियन डॉलर की सम्पति को इस उद्देश हेतु खर्च करने के लिए तैयार हो, तो इसे मिटाया जा सकता है. सम्पति के अत्यधिक असमानता की वज़ह से ये लोग भूख से लड़ने में अक्षम हैं.

अशिक्षा आज भी एक चुनौती है जिससे भ्रष्टाचार, अन्याय, बेरोजगारी और आर्थिक अवसरों के उपयोग में कमी तथा जीतीय हिंसा और युद्ध जैसी समस्याएँ पैदा होती है.

राजनीतिक अस्थायित्व, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव और धर्म व् आर्थिक मसलों के नाम पर हस्तक्षेप के कारण मध्यपूर्व और उतारी अफ्रीका से लाखों- करोड़ों लोग पलायन कर रहे हैं जिससे यूरोपीय राष्ट्र अपनी सभ्यता को लेकर चिंतित हैं किन्तु वे भूल रहे हैं इसके लिए कहीं न कहीं वे भी जिम्मेवार है अपने सामरिक, रणनीतिक ,आर्थिक, व्यापारिक, आर्थिक व् सत्तात्मक हितों के स्वार्थ के चलते. आर्थिक अवसरों का अभाव और बेरोजगारी दुनिया की एक बड़ी समस्या है. गरीब और विकासशील राष्ट्रों के नागरिक इससे सबसे अधिक पीड़ित हैं . सब-सहाराई अफ़्रीकी देशों में ये लगभग २२% तक है और आर्थिक संसाधनविहीन ये राष्ट्र उनकी कोई खास मदद भी नहीं कर पाते हैं. जबकि विश्व उपरोक्त समस्याओं से जूझ रहा है. इनके ऊपर गंभीरता से विचार कर ठोस उपाय खोजने की बजाय जो मुद्दे हावी रहेंगे उनको हम इस तरह से समझ सकते हैं.मसलन, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प अपने कर-विरोधी पूंजीपतियों पर नकेल कसने की बजाय (ताकि राष्ट्र को अधिक से अधिक कर हासिल हो जिसे सामान्य लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर खर्च किया जा सके. इसकी एक वज़ह ये भी हो सकती है कि वे स्वयम इन्ही पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.) नाटो की अनिवार्यता और उसके खर्चे का प्रश्न उठाकर, यूरोपीय देशों पर दबाब बनाकर उनके रक्षा बजट को बढ़ाने पर जोर देंगे. जिससे अमेरिकी सैन्य उत्पादकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँच सके. लॉकहीड मार्टिन जैसी कम्पनी दिवालियेपन की कगार पर है, जिसे उबारने में पहले ही मोदी का सहयोग अपेक्षित माना जा रहा है. पुराने पड़ चुके एफ़-१६ विमानों को ज़बरदस्ती घरेलू अमेरिकी सैन्य कारोबार को जिंदा रखने के दबाब के चलते मोदी हाल ही में अमेरिका का दौरा कर चुके है. राष्ट्रवाद का दंभ भरने वाले दोनों नेता अपने नागरिकों के साथ धोखाधड़ी जैसे कृत्य में संलग्न हैं. चीन और भारत के सीमा-विवाद के चलते तनाव का एक वातावरण जी-२० पर छाये रहने की उम्मीद है जिसे उत्तर कोरिया के उच्श्रंखल व्यवहार, उसको मिलने वाल चीने और रूसी सहयोग तथा दक्षिणी चीन में होने वाली अमेरिकी सक्रियता में बढ़ोतरी और भी तनावपूर्ण बना सकते है.

ब्राजील , दक्षिण अफ्रीका , भारत और रूस में पिछले कई दशकों से भ्रष्टाचार चरम पर है और लाखों लोगों के द्वारा विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचार की वैश्विक महामारी, नेताओं और पूंजीपतियों के दुष्चक्र पर कभी भी इन नेताओं ने कोई कार्यवाई करने का प्रयास नहीं किया है. उलटे जनमानस में यह कहा जाता है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन के पास अरबों डालर की सम्पति है और भारतीय अरबपति अडाणी के कारोबार में अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री मोदी की हिस्सेदारी है. ट्रम्प स्वयं अरबपति हैं और उन्होंने अमेरिकी प्रशासन में कितने ही पूंजीपतियों को पद बाँट रखे हैं.

लब्बोलुआब ये है कि जी-२० एक संकीर्ण सोच से संचालित संगठन है जिसकी निर्विलंब समाधान चाहने वाले वैश्विक संकटों और समस्यों से कोई मतलब नहीं है. ये विश्व की सामान्य जनता के प्रति न तो नैतिक रूप से जबाबदेह है नहीं बनाने का इच्छुक.

(नरेंद्र कुमार आर्य समसामयिक मामलों पर स्वतंत्र टिप्पणीकार होने के अतिरिक्त कवि और आलोचक भी है.)

            

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