स्वराज की कब्र खोदता जीएसटी

​​​​​​​आखिर स्वराज क्या है? स्वराज न तो हिंदुत्व है, न इस्लामवाद। यह राष्ट्रवाद भी नहीं है। स्वराज का सीधा सा मतलब स्वशासन से है।...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

इस आंदोलन को चला रहे लोगों की अपील है कि जीएसटी के विरोध में हम हैंडलूम उत्पाद बगैर कोई कर लिए या बगैर किसी कर भुगतान के खरीद सकते हैं। कर देने से इनकार करना सविनय अवज्ञा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस अभियान का हिस्सा बन कर आप न सिर्फ गांव के गरीब लोगों की आजीविका बचा सकते हैं, बल्कि अपने वातावरण को प्रकृति के अनुकूल बनाने में सहयोग दे सकते हैं।

सत्येन्द्र पीएस

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने को कर की दिशा में ऐतिहासिक कदम करार दिया जा रहा है, वहीं 1 जुलाई 2017 से लागू कर व्यवस्था में तमाम विसंगतिया सामने आ रही हैं। दक्षिण भारत में इस कर के खिलाफ कर अवज्ञा सत्याग्रह (टैक्स डिनायल सत्याग्रह) चल रहा है।

कर अवज्ञा सत्याग्रह चला रहे ‘सत्याग्रह ग्राम सेवक संघ’ का कहना है कि आजादी के बाद पहली बार हस्तशिल्प को कर के दायरे में लाया गया है। यह गरीब तबके, कुटीर एवं लघु उद्योग चलाने वालों का एकमात्र सहारा है, जिसे अब तक सरकारें संरक्षण देती रही हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र से रोजगार पाते हैं और स्थानीय कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका भी मिलता है।

सत्याग्रहियों का कहना है कि प्राकृतिक उत्पाद स्वाभाविक रूप से महंगे होते हैं। वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि खादी की साड़ी की कीमत सूरत की सिंथेटिक साड़ी से हमेशा महंगी होती है। अब कर लगने के बाद उसका दाम और बढ़ जाएगा।

एक तर्क यह भी सामने आता है कि अगर कोई उत्पाद बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है तो क्यों न उसे बाजार से बाहर हो जाने दिया जाए ? हालांकि साथ में एक अभियान यह भी चल रहा है कि प्रकृति और प्राकृतिक उत्पादों की ओर चलना चाहिए, जो कहीं ज्यादा सुरक्षित और प्रकृति के अनुकूल हैं। प्राकृतिक उत्पादों की ओर जाने का अभियान न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में चल रहा है। वहीं भारत की सरकार ने हाथ से बने सामान पर कर लगा दिया।

उत्तर भारत में तो हस्त शिल्प का ज्यादा महत्त्व नहीं रहा और ज्यादातर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प उत्पाद खत्म होते जा रहे हैं। वहीं तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकारों ने हस्तशिल्प पर विशेष ध्यान दिया। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि दक्षिण में पिछले 100 साल के पिछड़े वर्ग के आंदोलन ने बहुत कुछ बदला है। दक्षिण में न सिर्फ सरकारी नौकरियों में दलितों-पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है बल्कि उन राज्यों ने हस्तशिल्प पर खासा जोर दिया, जिससे लघु व कुटीर उद्योगों को संरक्षण मिला, उनका विकास हुआ। इन उद्योगों में बड़े पैमाने पर दलितों व पिछड़े वर्ग की रोजी रोटी सुरक्षित है। आधुनिक और भारी भरकम तकनीकी फैक्टरियों के साथ दक्षिण में हस्तशिल्प को भी जगह मिली। कुटीर एवं लघु उद्योगों को भी जगह मिली।

भारत में भाषायी विविधता के साथ भौगोलिक दूरी के कारण सामान्यतया लोग नहीं जान पाते कि दक्षिण भारत में क्या चल रहा है। स्वाभाविक है कि इस कर अवज्ञा आंदोलन को भी उत्तर भारत में कोई पूछने वाला नहीं है।

इस आंदोलन को चला रहे लोगों की अपील है कि जीएसटी के विरोध में हम हैंडलूम उत्पाद बगैर कोई कर लिए या बगैर किसी कर भुगतान के खरीद सकते हैं। कर देने से इनकार करना सविनय अवज्ञा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस अभियान का हिस्सा बन कर आप न सिर्फ गांव के गरीब लोगों की आजीविका बचा सकते हैं, बल्कि अपने वातावरण को प्रकृति के अनुकूल बनाने में सहयोग दे सकते हैं।

हस्त शिल्प पर कर लगाए जाने के विरोध में जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश कहते हैं, “क्या महात्मा गांधी के चरखे से काढ़ी गयी और कस्तूरबा की तकली से काती गयी सूत पर भी ये सरकार जीएसटी लगाती ? कुछ तो देश की जनता के हाथों और पसीने का लिहाज़ बचे ! हे राम !”

दक्षिण के आंदोलनकारी और ग्रामीणों को उन राज्यों के बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिल रहा  है। बाकायदा फेसबुक और ट्विटर पर #taxdenialsatyagraha हैशटैग से हस्तशिल्प पर लगने वाले कर के खिलाफ लिखा जा रहा  है।

इसके अलावा भी तमाम कर लगाए गए हैं, जो असंगत लगते हैं। सरकार ने तमाम लग्जरी उत्पादों, जैसे सोने के आयात, कारों आदि पर कर कम रखा है। वहीं तमिलनाडु में सबसे ज्यादा प्रचलित वेट ग्राइंडर को लग्जरी आयटम में डाल दिया।

उत्तर भारत के ज्यादातर लोग वेट ग्राइंडर से परिचित नहीं होंगे। हालांकि दक्षिण का डोसा करीब हर भारतीय ने खा लिया है और वह लोगों की जीभ के स्वाद पर चढ़ चुका है। डोसे को बनाने के लिए जिस तरल खाद्य का इस्तेमाल किया जाता है, वह वेट ग्राइंडर से बनता है। कोयंबत्तूर का वेट ग्राइंडर उद्योग अपने ऊपर लगाए गए 28 प्रतिशत कर का विरोध कर रहा है। देश भर में यहीं से वेट ग्राइंडर की आपूर्ति होती है। मूल्यवर्धित कर (वैट) के तहत इस उद्योग पर 4 प्रतिशत कर था।  कोयंबत्तूर वेट ग्राइंडर एंड एक्सेसरीज मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (सीओडब्लूएमए) के अध्यक्ष एम राधाकृष्णन ने एक आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'उत्तर भारत से अच्छी पूछताछ आ रही है, लेकिन 28 प्रतिशत कर लगने के बाद कोई भी खरीदना नहीं चाहेगा।'

http://www.business-standard.com/article/economy-policy/gst-impact-wet-grinder-industry-fears-major-blow-with-28-rate-117060800756_1.html

माना जाता है कि वाशिंग मशीन ने पूरी दुनिया में महिलाओं की जिंदगी बदल दी है। वाशिंग मशीन के चलते न सिर्फ महिलाओं की काम करने की रचनात्मक क्षमता बढ़ी, बल्कि इससे उनके समय का दुरुपयोग खत्म हुआ। इसी तरह से दक्षिण भारत में वेट ग्राइंडर ने महिलाओं की जिंदगी बदल दी। डोसा बनाने के लिए चावल पीसने, घोंटने, उसे मथकर खमीर उठाने की प्रक्रिया में महिलाओं की अच्छी खासी दुर्गति होती थी, लेकिन इस मशीन ने घंटों का काम मिनटों  में करना शुरू कर दिया। राज्य के हर अमीर गरीब परिवार में वेट ग्राइंडर मिलती है। इतना ही नहीं, ठेले से लेकर छोटे मोटे रेस्टोरेंटों में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है।

वेट ग्राइंडर की महत्ता इससे समझी जा सकती है कि मौजूदा अन्नाद्रमुक सरकार ने चुनाव के पहले लोगों से वादा किया था कि अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो वह हर परिवार को मुफ्त में वेट ग्राइंडर देगी। तमिलनाडु सरकार अपने चुनावी वादे के मुताबिक पिछले 4 साल से इसकी आपूर्ति लोगों को मुफ्त में कर रही है। इस दौरान राज्य सरकार ने 3,600 करोड़ रुपये के 1.8 करोड़ वेट ग्राइंडर कोयंबटूर के विनिर्माताओं से खरीदे हैं।

सरकार के इस रवैये से क्षुब्ध उदय प्रकाश कहते हैं,  “आज से 88 साल पहले अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाया था। अब हस्त शिल्प,  दस्तकारी, गांवों के लोगों के हाथों से बने सामग्री पर जीएसटी। आज अगर मध्यकाल के संत कबीर , रविदास, वचनकार, नाभादास, नानक या आज के भारत के महात्मा गांधी ही होते, तो टैक्स देना पड़ता। कैसी उलट बांसी है- तमाम बाबाओं के प्रोडक्ट्स पर टैक्स से छूट और संतों- गांव देहात, कस्बों और शहर के अंतरे-कोने में रहने वाले हस्तशिल्पियों के मेहनत के उत्पाद पर टैक्स। क्या एक और सत्याग्रह नहीं हो सकता? कर-अवज्ञा-सत्याग्रह ?”

अभियान चलाने वाले सत्याग्रही कहते हैं कि आखिर स्वराज क्या है? स्वराज न तो हिंदुत्व है, न इस्लामवाद। यह राष्ट्रवाद भी नहीं है। स्वराज का सीधा सा मतलब स्वशासन से है। उनका कहना है कि अब स्वराज और स्वशासन को नष्ट किया जा रहा है। इस तरह के कर के माध्यम से लोगों के खुद के रोजगार व धंधे छीने जा रहे हैं, जिससे विदेशी कंपनियां ही नहीं बल्कि भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा मिले।

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