भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए जनान्दोलन जरूरी, भाजपा को दिखावे की नैतिकता में भी यकीन नहीं

हर मोर्चे पर विफल रहने के साथ ही पूरी तरह बदनाम हो चुकी है भाजपा...

उपचुनाव परिणाम पर वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार झा का विश्लेषण, जरूरत विपक्ष को भी आत्मालोचना की है। 

हर मोर्चे पर विफल रहने के साथ ही पूरी तरह बदनाम हो चुकी है भाजपा

मनोज कुमार झा

अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं। अभी हाल में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जो बुरी हालत हुई, उससे साफ पता चलता है कि आगे उसका भविष्य क्या है। चार साल के शासन के दौरान हर मोर्चे पर विफल रहने के साथ ही पूरी तरह बदनाम हो चुकी इस पार्टी का सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार व औचित्य नहीं रह गया है, पर भाजपा का यदि नैतिकता से कोई लेना-देना रहता तो यह दो दिन के लिए कर्नाटक में सरकार बना कर अपनी किरकिरी नहीं करवाती। यह तो कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने सूझबूझ के साथ तत्काल काम किया और भाजपा को बहुत बेआबरू हो कर कर्नाटक की कुर्सी छोड़नी पड़ी।

बहरहाल, इस साल राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां भाजपा और भाजपा-विरोधी दलों की ताकत का सही अंदाज लग सकेगा।

भाजपा की हालत बुरी है राजस्थान और मध्य प्रदेश में

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश, दोनों राज्यों में भाजपा की हालत बुरी है। हर वर्ग के लोग भाजपा के शासन से त्रस्त हो चुके हैं और किसी भी हाल में इसे सत्ता में देखना नहीं चाहते।

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की हालत खराब है। यह माना जा रहा है कि भाजपा वहां मुख्यमंत्री पद के लिए कोई दूसरा चेहरा तलाश रही है, पर किसे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने लाए, यह भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रणनीतिकारों की समझ में नहीं आ रहा है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि शिवराज पूरी कोशिश में लगे हैं कि मुख्यमंत्री पद उनकी ही झोली में रहे, पर पार्टी और संघ के दिग्गज नेता इसके लिए तैयार नहीं हैं।

यही हाल राजस्थान में है। वसुंधरा राजे को भाजपा के कई नेता सख्त नापसंद करते हैं। वहां कोशिश की जा रही है कि किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर चुनाव में उतरा जाए, पर किसी नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है। वहीं, कांग्रेस ने इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाये हैं। मध्य प्रदेश में कमलनाथ को कमान सौंप दी गई है। कहा जा रहा है कि कमलनाथ चुनावी शतरंज की बिसात पर नयी चालें चलेंगे। बहरहाल, इन दो राज्यों में जो चुनाव-परिणाम आएंगे, उनका आगामी लोकसभा चुनाव पर असर पड़ना तय है। माना जा रहा है कि कर्नाटक से भाजपा के पतन की शुरुआत हो चुकी है।  

कर्नाटक ने विपक्ष को दी नई ऊर्जा

कर्नाटक में कांग्रेस के गठबंधन में जनता दल (सेक्युलर) के नेता एच.डी. कुमारस्वामी की सरकार बनने से विरोधी दलों में नया उत्साह आया है। उस मौके पर तमाम विरोधी दलों के नेताओं के एक मंच पर आने से यह उम्मीद जगी है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरुद्ध एक मजबूत गठबंधन बन सकता है। इस गठबंधन में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल आदि के साथ आने की संभावना दिख रही है। इस मौके पर सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी भी नजर आए थे। माना जा रहा है कि सीपीएम भी कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल हो सकती है। पर पश्चिम बंगाल में तृणमूल के साथ उसका छत्तीस का जो आंकड़ा है, उसे देखते हुए गठबंधन में शामिल होने पर संदेह भी जताया जा रहा है। जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि वामपंथी दल भाजपा-विरोधी गठबंधन में शामिल नहीं होते, तो उनके राजनीतिक अस्तित्व पर सवालिया निशान लग जाएंगे। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी दल पूरी तरह से कटे-कटे नजर आ रहे हैं। इस पर वाम नेताओं को गंभीर विचार-मंथन की जरूरत है।

सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने से काम नहीं चलने वाला

दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण जो बात है, वह यह कि आने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा-विरोधी दलों को अभी से ही गठबंधन बनाने का प्रयास तेज कर देना चाहिए और साथ ही भाजपा सरकार की नीतियों को लेकर आंदोलनात्मक गतिविधियां भी शुरू कर देनी चाहिए। इससे जनता में इनकी पैठ बढ़ेगी। सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने से काम नहीं चलने वाला। जनता के बीच जाकर संपर्क करना और स्थानीय स्तर पर लोगों को जोड़ना बहुत ही जरूरी है। इसके लिए सभी दलों को अपने स्तर पर सक्रियता दिखानी होगी। इसमें कांग्रेस की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। भूलना नहीं होगा कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर सिर्फ कांग्रेस और उसके नेता ही रहते आए हैं। हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी ने पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर काफी दुष्प्रचार किया है, जिससे लोगों में गुस्सा है।

कांग्रेस समझे चुनाव मैनेजरों के सहारे चुनाव जीत पाना संभव नहीं

कांग्रेस को विकास और अन्य मुद्दों को लेकर जनता से हर स्तर पर संवाद कायम करना चाहिए, तभी कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आ सकता है। चूंकि भाजपा के बरक्स कांग्रेस ही एकमात्र सबसे बड़ा दल है, इसलिए स्वाभाविक है कि उसके नेतृत्व में ही गठबंधन बन सकता है। पर कांग्रेस को जिस आक्रामकता के साथ आने वाले चुनाव की तैयारी में जुट जाना चाहिए था, वैसा वह कर नहीं पा रही है। राहुल गांधी का जनता से संवाद कायम नहीं हो पा रहा है। राजनीतिक मंच पर लगातार उनकी मौजूदगी दर्ज नहीं हो पा रही है। ऐसे में, संशय की स्थिति बनती है। कांग्रेस नेतृत्व को यह समझ लेना चाहिए कि पहले की नीतियों पर चल कर उसे सफलता नहीं मिल सकती। चुनाव मैनेजरों के सहारे चुनाव जीत पाना संभव नहीं हो सकता। उसे उत्तर प्रदेश में अपने हश्र को देखना चाहिए, जहां मूर्खतापूर्ण खटिया सभाओं में उसकी खटिया खड़ी हो गई थी।

भाजपा को दिखावे की नैतिकता में भी यकीन नहीं

जनता का विश्वास जीतने के लिए आंदोलनात्मक गतिविधि चलाना ही एकमात्र विकल्प है। आंदोलनात्मक गतिविधियों के लिए मुद्दों की कमी नहीं है। ऐसे सैकड़ों मुद्दे हैं जिन्हें लेकर विरोधी दल जनता के बीच जा सकते हैं और राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य, जिला और पंचायत स्तर पर आंदोलन खड़ा कर उनमें जनता की भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। कांग्रेस और दूसरे दलों को जनता की शक्ति में भरोसा करना होगा। जनता को अपने साथ जोड़ने के लिए उसके बीच जाना ही एकमात्र उपाय है, अन्यथा अंत में हाथ मलने के सिवा और कुछ भी नहीं बचेगा। भाजपा साजिशों और तिकड़म के बल पर चुनाव जीतती रही है। उसके पास धनबल भी है। दिखावे की नैतिकता में भी भाजपा को यकीन नहीं है। इसलिए कांग्रेस और अन्य दलों को यह समझना होगा कि व्यापक जनसमर्थन से ही वे भाजपा को 2019 में सत्ता में आने से रोक सकते हैं।     

 

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।