सीबीआई बनाम सीबीआई विश्लेषण : पूरी तरह से बेपर्द हो गया मोदी का स्वेच्छाचार !

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा ने मोदी के खास और परम भ्रष्ट अधिकारी आर के अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के एक नग्न मामले में एफआईआर दायर की थी। ...

सीबीआई बनाम सीबीआई विश्लेषण : पूरी तरह से बेपर्द हो गया मोदी का स्वेच्छाचार

अरुण माहेश्वरी

मोदी सरकार किस प्रकार कानून को धत्ता बताते हुए स्वेच्छाचारी तरीके से चल रही है, इसका एक नमूना सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई बनाम सीबीआई मामले की अब तक की सुनवाई से पूरी तरह से सामने आ चुका है।

इस मामले में सब जानते हैं कि सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा ने मोदी के खास और परम भ्रष्ट अधिकारी आर के अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के एक नग्न मामले में एफआईआर दायर की थी। यह एक बड़ी खबर थी, इसीलिये इसकी खबर का अखबारों में प्रमुखता के साथ आना स्वाभाविक था।

आलोक वर्मा ने इस विषय में न कभी कोई संवाददाता सम्मेलन किया और न कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी की। उल्टे पूरे मामले को उलझाने के लिये अस्थाना ने वर्मा पर झूठे आरोप लगा कर सीवीसी के सामने शिकायत कर दी।

और मोदी सरकार ने इसी घटना चक्र को कुछ इस प्रकार रटना शुरू कर दिया कि सीबीआई के दोनों बड़े अधिकारी आपस में कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। और इसी बहाने, सीबीआई की 'साख' बचाने के नाम पर सीबीआई के अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर सीवीसी की तदारिकी के अधिकार का प्रयोग करते हुए 23 अक्तूबर की रात के बारह बजे सीबीआई दफ्तर पर धावा बोल कर उस पर कब्जा कर लिया तथा वर्मा और अस्थाना, दोनों को छुट्टी पर भेज दिया। सीबीआई निदेशक वर्मा की जगह अपने एक पिट्ठू और समान रूप से भ्रष्ट अधिकारी को कार्यकारी निदेशक बना दिया

वर्मा को छुट्टी पर भेजने की एक मात्र वजह यह थी कि उसे मनमाने ढंग से हटाने का अधिकार तो सीवीसी को क्या, केंद्र सरकार को भी नहीं है। उसकी नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यों की कमेटी, जिनमें एक सदस्य प्रधानमंत्री है, दूसरा भारत का मुख्य न्यायाधीश और तीसरा लोकसभा में विपक्ष का नेता होता है।  

सरकार की इस मनमानी कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती पर सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में उसी रटी-रटायी बात को ही दोहराती रही कि सरकार ने यह कार्रवाई इन दो अधिकारियों के झगड़ों से सीबीआई की साख को पहुंच रहे नुकसान को रोकने के लिये की। सीबीआई पर कब्जा करने की सरकार की इससे अधिक झूठी और लचर दलील क्या हो सकती है ?

इस मामले में सीवीसी की इस दलील तो और भी हास्यास्पद थी कि वह सीबीआई में जो चल रहा था उसका मूक दृष्टा बनी नहीं रह सकता था। जिस विषय में दखल करने का किसी को अधिकार ही नहीं होता है, उसमें कोई भी 'मूक दृष्टा' भर नहीं रहेगा तो क्या रहेगा ?

मुख्य न्यायाधीश ने सरकार के वकील से पूछा कि आपने आलोक वर्मा पर कार्रवाई के पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए चयन समिति के सामने विषय को क्यों नहीं रखा। दोनों अधिकारियों के बीच नोक-झोंक जुलाई महीने से चल रही थी तो वह सरकार के लिये अचानक तभी असहनीय क्यों हो गई ?

सरकार की ओर से सोलिसिटर जैनरल भारी तुमार बांध रहे थे कि सीवीसी कानून की धारा 8 के अनुसार उसे सीबीआई पर तदारिकी के सारे अधिकार हैं, तो मुख्य न्यायाधीश ने दूसरा छोटा सा सवाल किया कि क्या उसे सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति की धारा 4(1) को रौंद डालने का भी अधिकार हैं, तो सोलिसिटर जनरल को कहना पड़ा - नहीं।

जाहिर है कि इसके बाद सोलिसिटर जैनरल के पास इधर-उधर की बातों की तुमार बांधते हए सिवाय बगले झांकने को करने को कुछ नहीं बचा रह गया था।

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जल्द ही इस मामले में फैसला सुना दिया जायेगा, क्योंकि एक पंगू कार्यकारी निदेशक के बल पर सीबीआई जैसी संस्था ज्यादा दिन नहीं चल सकती है। लेकिन इसी बीच मोदी सरकार का स्वेच्छाचार पूरी तरह से नंगा हो कर सामने आ गया है।

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