भारतीय सेना को चीनी भूमि में प्रवेश नहीं करना चाहिए था :थाई विशेषज्ञ

भारतीय सेना पर सीमा पार करने का आरोप लगाते हुए चीनी विदेश मंत्रालय, चीनी रक्षा मंत्रालय और भारत स्थित चीनी दूतावास ने अलग-अलग माध्यमों से चीन सरकार के रुख पर प्रकाश डाला है।...

नई दिल्ली। भारतीय सेना पर सीमा पार करने का आरोप लगाते हुए चीनी विदेश मंत्रालय, चीनी रक्षा मंत्रालय और भारत स्थित चीनी दूतावास ने अलग-अलग माध्यमों से चीन सरकार के रुख पर प्रकाश डाला है।

थाईलैंड के चुलालोंगकोर्न विश्वविद्यालय के एशिया अनुसंधान केंद्र के प्रोफेसर नुओलनोइ ट्रीराट ने हाल ही में चाइना रेडियो इन्टरनेशनल (सीआरआई) को दिये एक इंटरव्यू में बताया कि भारतीय सेना को चीनी भूमि में प्रवेश नहीं करना चाहिए था ।

सीआरआई की एक खबर के मुताबिक प्रोफेसर नुओलनोइ ट्रीराट ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी मापदंड के अनुसार भारतीय सेना को चीनी भूमि में प्रवेश कर नहीं रुकना चाहिए था। भारत चीनी भूमि पर किसी भी सशस्त्र बल को भी तैनात नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने जहां प्रवेश किया है, अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक वहीं चीनी भूमि है। यह निसंदेह है। भारत की वर्तमान कारर्वाई जायज नहीं है। भारतीय सेना जहां चीनी भूमि में घुस गयी है, वहृ भूटान से काफी करीब है और भूटान एक छोटा देश है। मुझे लगता है कि भारत इस कारर्वाई से चीन को कुछ संकेत देना चाहता है।

भारतीय सेना का सीमा पार करने पर चीनी विद्वान का रुख

हाल में चीनी आधुनिक संबंध अनुसंधान संस्था के अनुसंधानकर्ता ली ली ने सीआरआई के साथ साक्षात्कार में कहा कि तूंग लांग घटना के बाद चीन लगातार राजनयिक माध्यमों से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन 40 से ज्यादा भारतीय सैनिक अभी भी चीन की प्रादेशिक भूमि में ठहरे हुए हैं।

ली ली के अनुसार भारतीय पक्ष को इस घटना की पूरी जिम्मेदारी उठानी चाहिए। निसंदेह तूंग लांग क्षेत्र चीन की प्रादेशिक भूमि रहा है और चीन इस क्षेत्र का कारगर प्रशासन भी करता है। जबकि भारत पक्ष ने इसे भूटान की प्रादेशिक भूमि कहा, जो बिलकुल निराधार है। इस बार भारतीय सेना ने सीमा पार कर चीन में दाखिल हुआ। वास्तव में यह आक्रमण की कार्यवाई ही है। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी नियमों का उल्लंघन किया है। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांत के संस्थापक देशों में से एक होने के नाते स्वतंत्रता के बाद भारत ने पड़ोसी छोटे देशों का समान सत्कार नहीं किया है और भूटान को अपना संरक्षित देश माना है। भूटान की स्वतंत्र प्रभुसत्ता है। भारत के लम्बे अरसे के दबाव डालने से चीन-भूटान सीमांत वार्ता में औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया जा सका। चीन-भूटान का राजनयिक संबंधों की स्थापना भी नहीं हो पायी है।

ली ली के मुताबिक इस घटना के हल के लिए भारत को कुंजीभूत भूमिका अदा करनी चाहिए। चीन चीन-भारत संबंध की परिस्थिति और दोनों देशों की जनता के कल्याण को बड़ा महत्व देता है। आशा है कि दोनों देश हाथ मिलाकर सहयोग और समान विकास कर सकेंगे। साथ ही चीन ने भारत से अपनी प्रादेशिक भूमि की रक्षा करने के चीन के निर्णय को सही समझने की चेतावनी भी दी, ताकि भारत गलत रास्ते में आगे बढ़ने से रूक सके।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।