घिटोरनी फॉर्म हाउस में सफाईकर्मियों की मौत

सुनील कुमार

अरवल जिला (बिहार) के वीरबल दूबे के पुत्र दीपू और बागपत जिला (उ.प्र.) के ज्ञान चंद के पुत्र अनिल कुमार एक साल से छत्तरपुर रैन बसेरा में रहते थे। दीपू अपने भाई भोला के साथ 100 फुटा रोड, छत्तरपुर रैन बसेरा को ही अपना आवास बना लिये। पूरे दिन काम करने के बाद वे खाना खाकर आते और रैन बसेरा में सो जाते। फिर सुबह उठते और काम पर चले जाते थे। अनिल कुमार इसी रैन बसेरा के पीछे मित्तल फार्म हाउस की जमीन पर बनी झुग्गी में अपने भाई और बहन के साथ रहते थे। दीपू और अनिल दोनों अलग-अलग जाति से थे - एक ब्राह्मण तो दूसरा दलित, एक बिहार तो दूसरा यूपी का रहने वाला। दीपू और अनिल दोनों दिहाड़ी मजदूरी करते थे, जिसके कारण दोनों की दोस्ती प्रगाढ़ होती चली गई। अनिल दीपू के साथ ही रैन बसेरा में सो जाता था, दोनों साथ ही खाते-पीते थे। दीपू और अनिल की कई बातें एक जैसी थी। दोनों ही अकेले थे, दोनों के मां-पिता की मृत्यु हो चुकी थी और वे अपनी कमाई का पैसा भाई-बहन को देते। दोनों का ही अपने गांव से कोई रिश्ता नहीं था या यूं कहें कि गांव की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि दोनों के पास शहर जाकर श्रम करके जिन्दा रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था। इसी रैन बसेरा में अनिल और दीपू की दोस्ती लोकेश से हो गई थी, जो उनके साथ ही दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं। दीपू, अनिल व लोकेश कभी बेलदारी और कभी टेन्ट हाउस में वेटर के काम पर चले जाते थे, तो कभी स्वर्ण सिंह के साथ रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे। वे जो कुछ कमा कर लाते उससे खाते-पीते और जो बचता अपने परिवार वालों को देते थे।

स्वर्ण सिंह के पिता भगत िंसंह राजस्थान के रहने वाले थे, जो करीब 45 साल पहले दिल्ली आकर बोरिंग का काम करने लगे। भगत सिंह के इन्हीं कामों को उनके चार बेटों ने सीखा, जिसमें से एक स्वर्ण सिंह (46) थे। दिल्ली में बोरिंग पर पाबंदी लगने और काम कम हो जाने के कारण स्वर्ण िंसंह रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम भी करने लगे थे। इसके लिए उनको छोटे -मोटे काम का ठेका मिल जाया करता था, जिसको वे बिल्लू और दूसरे मजदूरों के साथ पूरा करते थे। इस काम में स्वर्ण सिंह का बेटा जसपाल दसवीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मद्द करने लगा था। स्वर्ण सिंह को जे के मेहता, घिटोरनी फॉर्म हाउस की ओर से रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम मिला था। इस काम को पूरा करने के लिये स्वर्ण सिंह ने बिल्लू, अनिल, दीपू और लोकेश को 400 रु. की दैनिक मजदूरी पर रखा था।

15 जुलाई, 2017 को अनिल और दीपू सुबह 8.30 बजे एक साथ रैन बसेरा छत्तरपुर से निकले कि जल्दी वापस आकर दूसरे काम (वेटर) पर जा सकते हैं, जिससे उनकी आज की मजदूरी दुगनी हो जायेगी। रैन बसेरा से निकलकर पहले दीपू, अनिल और लोकेश स्वर्ण सिंह के घर अम्बेडकर कॉलोनी छत्तरपुर गये। स्वर्ण सिंह का बेटा जसपाल और इन्द्रजीत उर्फ बिल्लू और दीपू, अनिल व लोकेश एक गाड़ी में सवार होकर जे के मेहता के फॉर्म हाउस घिटोरनी पहुंचे। वहां पर उनकी मुलाकात फॉर्म हाउस के मैनेजर निरंजन और माली ऋषिपाल से हुई। निरंजन ने इन लोगों को काम दिखाते हुए बताया कि यह रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम है, सीवर की सफाई करनी है। बिना किसी तैयारी के अनिल उस सीवर में उतर गया। सीवर में उतरते ही अनिल को गिरता देख उसको निकालने के लिए बिल्लू भी उसमें उतर गया।

एक साथ काम करने और दोस्तों की जान बचाने के लिए दीपू भी उनको बचाने के लिए सीवर में उतर गया। तीनों की आवाज नहीं आने पर जसपाल ने अपने पिता स्वर्ण सिंह को फोन किया। स्वर्ण सिंह 15 मिनट में घिटोरनी फॉर्म हाउस पहुंच गये और तीन लोगों को बचाने के लिए कमर में रस्सा बांध सीवर में उतर गये। लेकिन उतरते ही वे भी जहरीली गैस के शिकार हो गये और नीचे गिरने लगे। उन्हें बचाने का असफल प्रयास उनके बेटे जसपाल ने किया, लेकिन वह भी उस सीवर में गिरकर मुर्छित हो गया। फॉर्म हाउस के मालिक या स्टाफ ने इनको बचाने की कोशिश नहीं की और एक छोटे सीवर में चार लोगों की जहरीली गैस के कारण मृत्यु हो गई। ये चारों अपने घर के अकेला कमाने वाले सदस्य थे। इनकी मृत्यु के बाद इनके परिवारजनों और रिश्तेदारों में एक गहरा दुख व्याप्त है और परिवारवालों को भविष्य का चिंता है।

बिल्लू का घर एक कमरे वाला है। उसके आगे प्लास्टिक सीट टंगी हुई है, जिसमें घर के बाकी समान रखे हुए हैं। घर भी टूटी-फुटी हुई है। घर के आंगन में चारपाई पर उनके रिश्तेदार, मां (माया कौर) और बहन (रानी कौर व निकी) बैठी हुई रो रहे थे। बिल्लू की बहन रानी कौर बताती हैं कि हमारे पास तो रहने का घर भी नहीं है, मां-पिता बीमार रहते हैं। बिल्लू रोज कमा कर लाता था तो घर का चुल्हा जलता था। यही हालत अनिल और दीपू के परिवार की भी है। दीपू की बहन दिल्ली के फतेहपुर में अपने परिवार के साथ रहती है। वह रैन बसेरा में आकर दीपू की मौत के बाद कर्मकांड कर रही है। पास में ही अनिल की बस्ती है जहां पर उसके रिश्तेदार और भाई बैठे हुये हैं। इन लोंगों को आशा है कि सरकार की तरफ से इनके परिवार को क्षतिपूर्ति दी जायेगी। साथ ही साथ वे इन मौतां के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं।

मौत के 14 दिन बाद भी इनको सरकार, मंत्री या किसी नेता की तरफ से कोई मुआवजा या किसी तरह की सहायता नहीं मिली है। वे इस अधिकारी से उस अधिकारी के दफ्तर में चक्कर काटने पर विवश हैं। इनकी मृत्यु के दो दिन बाद दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी आये थे और दस लाख मुआवजा दिलाने के आश्वासन के देकर चले गये। उसके बाद इनके  दुख को जानने के लिए कोई नहीं आया। हां, कुछ स्वतंत्र रिपोर्टर जरूर इनके पास जाते हैं, जिससे इनको आशा है कि न्याय मिलेगा। अभी तक इस केस में जे के फार्म हाउस के मालिक की गिरफ्तारी नहीं हुई है। उसकी जगह पर फॉर्म हाउस के माली ऋषिपाल और मैनेजर निरंजन को ही पुलिस ने धारा 308, 304 व 34 के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया है।

घिटोरनी व छत्तरपरु दक्षिणी दिल्ली का वह इलाका है जहां पर संभ्रांत लोंगों के बड़े-बड़े फार्म हाउस हैं। इन फार्म हाउसों में इस तरह की कितनी मौतें होती होंगी उसे पता कर पाना मुश्किल का काम है, क्योंकि ये फार्म हाउस 10-15 ऊंची बाउंड्री के अंदर स्थित हैं जिनमें किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रेवश पर रोक है। जे. के. फार्म हाउस खुला होने के कारण यह मामला लोगों की नजरों में आ गया। घिटोरनी में बड़ी इंस्टिच्युट होने के कारण पेइंग गेस्ट (पीजी) हाउस का कारोबार जोरों पर हैं। एक छात्र से पीजी में रहने का सात से आठ हजार रू. तक वसूला जाता है। इसी तरह के फ्लैटों का निर्माण जे. के. फार्म हाउस के मालिक द्वारा किया जा रहा था।

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