सिनेमा बनाना ही नहीं बल्कि देखना भी एक कला है

किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह हक़ नहीं कि वह इन फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगाए - मधुर भंडारकर...

हाइलाइट्स

प्रदर्शनकारी कला विभाग का आयोजन

दृश्य और कथ्य : संदर्भ सिनेमा’ पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

·    देशभर के प्रतिष्ठित विद्वानों ने की शिरकत

·    प्रसिद्ध फिल्मकार पद्मश्री मधुर भंडारकर ने ‘फ़िल्मकार फिल्म के साथ’ श्रंखला का किया उद्घाटन

·    विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों से किया संवाद

प्रदर्शनकारी कला (फिल्म एवं रंगमंच) विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (दृश्य और कथ्य संदर्भ सिनेमा) का उदघाटन सत्र विश्वविद्यालय प्रांगण में अवस्थित गालिब सभागार में सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत देश के प्रमुख फ़िल्म विशेषज्ञों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। संगीष्ठी परिकल्पक एवं समन्वयक प्रो. राकेश मंजुल ने विषय प्रवर्तन करते हुए “दृश्य और कथ्य संदर्भ सिनेमा” विषय की वर्तमान समय में जरूरत को रेखांकित करते हुए बताया कि ‘विश्व सिनेमा परिदृश्य में दृश्य की उपस्थिति लगातार बदल रही है। कथ्य के स्वरूप में भी लगातार परिवर्तन देखने को मिल रहा है। मूक सिनेमा के दृश्य की तलाश कैसे करेंगे तथा उस दृश्य का दृश्यपाठ क्या होगा? संगोष्ठी के द्वारा शायद इस सवाल का जवाब हमें मिल जाए जो कि हमारा उद्देश्य भी है।’

विभाग के अध्यक्ष डॉ. ओम प्रकाश भारती द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे विद्वान अतिथियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। सूत की माला, चादर तथा स्मृति चिन्ह से अलग-अलग विद्वानों का स्वागत करवाया गया। विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने विशेष वक्तव्य देते हुए कहा कि तकनीकी विकास ने मानव समाज को जो सबसे बड़ा भेंट दिया है वह सिनेमा है। मनुष्य के लगातार बदलते जीवन व्यवहार में कहीं न कहीं सिनेमा की महती भूमिका है। सिनेमा बनाना ही नहीं बल्कि देखना भी एक कला है। इस संगोष्ठी के द्वारा हम और आप शायद इस कला से रुबरू हो पाएं।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि सिनेमा यथार्थ भी है और किसी बड़े यथार्थ से हमारा सामना भी करवाती है। मनुष्य के सामाजिक जीवन में यह सबसे बड़ा हस्तक्षेप है, जो उसके जीवन व्यवहार में भी लगातार बदलाव लाने में सहायक है। एक आम दर्शक के रुप में हम सिनेमा से कैसे जुड़े तथा इसका पाठ कैसे समझें? इससे संबंधितविमर्श करना संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। सत्र के दौरान प्रसिद्ध फिल्म विशेषज्ञ श्री अमरनाथ शर्मा (फिल्म विशेषज्ञ), श्री त्रिपुरारी शरण (प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक), श्री कमल स्वरूप (प्रख्यात डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार), श्री तेजेंद्र शर्मा (कथाकार-लंदन), श्री विनोद अनुपम (प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार), श्री दिनेश श्रीनेत (फिल्म विशेषज्ञ), श्री अनुज अलंकार (फिल्म विशेषज्ञ), श्री अशोक शरण, श्री दयाशंकर शुक्ल, श्री असीम त्रिवेदी, डॉ. विभावरी, डॉ नीरा जलक्षत्रि एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी गालिब सभागार में मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सतीश पावड़े द्वारा किया गया। सत्र का संचालन श्री अभिषेक सिंह ने किया।

प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं रंगमंच), विभाग महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन की शुरुआत देश के प्रमुख फ़िल्म विशेषज्ञों के स्वागत एवं अभिनन्दन के साथ हुआ।

विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. मनोज कुमार के द्वारा अतिथियों का स्वागत सूत की माला, शाल तथा कैलेण्डर भेंट स्वरूप दे कर किया गया। तत्पश्चात डॉ. नीरा जलक्षत्रि ने “विज्ञापन सिनेमा : दृश्य भाषा में भाषा का महत्व” विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान में विज्ञापन सिनेमा में निहित दृश्य एवं ध्वनि के अलग-अलग प्रभाव से श्रोताओं को अवगत कराया जिसके लिए उन्होंने पांच हिंदी विज्ञापन फिल्मों का चयन बतौर केस स्टडी किया था। जिसे सभागार में दिखाते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। संगोष्ठी समन्यवयक प्रो. राकेश मंजुल ने डॉ. जलक्षत्रि के व्याख्यान पर टिपण्णी करते हुए कहा कि विज्ञापन फिल्मों में अपने दृश्य तथा कथ्य के माध्यम से मनुष्य के सामाजिक जीवन व्यवहार में बदलाव तो लाया ही है साथ ही साथ इसने सिनेमाई विमर्श को अलग दिशा दी है।

गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी दिल्ली से आई डॉ. विभावरी ने कहा कि सिनेमा की अपनी भाषा है जो गतिमय चित्रों के द्वारा अर्थों को संप्रेषित करती है। हिंदी सिनेमा ने जिन साहित्यिक पाठ का सिनेमाई रूपांतरण किया उसमें स्त्री का चित्रण हमेशा से रूढ़ दिखलाया गया है। इसे दर्शकों को समझाने हेतु उन्होंने देव डी तथा देवदास, साहब बीवी और गुलाम तथा साहब बीवी और गैंगस्टर फिल्मों के किल्प्स दिखाते हुए अपनी बात रखी। फ़िल्म विशेषज्ञ दिनेश श्रीनेत ने दृश्य के अभाषी माध्यम विषय पर बोलते हुए कहा कि वर्चुअल रियलिटी ने यथार्थ को एक नया नजरिया देने की कोशिश की है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं जिनकी पड़ताल करने की करूरत है। मुंबई से आये श्री अनुज अलंकार ने फ़िल्म पत्रिकारिता के बदलते स्वरूप पर विस्तार पूर्वक अपनी बात रखी। जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने अपना विशेष वक्तव्य दिया। इस सत्र का संचालन डॉ. अविचल गौतम ने किया।

भोजनावकाश के बाद के सत्र में श्री अशोक शरण (मुंबई) ने सिनेमा सेंसरशिप अभिव्यक्ति और राजनीति, श्री असीम त्रिवेदी (दिल्ली) कला माध्यम और सेंसर, श्री दया शंकर शुक्ल (जम्मू) सामाजिक निषेध और सेंसर के मायने विषय पर अपना व्याख्यान दिया। सत्र का संचालन डॉ अशोक नाथ त्रिपाठी ने किया।          

प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं रंगमंच), विभाग महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन की शुरुआत देश के प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक मधुर भंडारकर के स्वागत एवं अभिनन्दन के साथ हुआ। विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. मनोज कुमार के द्वारा उनका का स्वागत स्मृति चिन्ह, सूत की माला, शाल तथा कैलेण्डर भेंट स्वरूप दे कर किया गया। तत्पश्चात उनकी फ़िल्म ‘मुंबई मिस्ट’ दिखाई गई। फ़िल्म ख़त्म होते ही भंडारकारजी ने स्वयं विद्यार्थी तथा शोधार्थियों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब दिये। पद्मावत फ़िल्म पर हो रहे विवाद के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा कि सेंसर बोर्ड से पास हुई प्रत्येक फ़िल्म का निर्विरोध प्रदर्शन होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह हक़ नहीं कि वह इन फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगाए।

एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए उन्होने अपनी पहली फ़िल्म ‘त्रिशक्ति’ के फ्लॉप होने का कारण मार्केट के दवाब को बतलाया। बाद में उन्होने यह कहा कि त्रिशक्ति के बाद की फिल्मों के निर्माण के दौरान उन्होने अपने दिल की सुनी और नतीजे के रूप में उन्हें कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले। कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक भास्कर के संपादक श्री प्रकाश दुबे कर रहे थे। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि जब फिल्मों से निम्नवर्ग गायब हो रहा था तब मधुर जी ने अपनी फिल्मों में उन्हें स्थान दिया जो काबिले तारीफ है। कार्यक्रम का संचालन प्रदर्शनकारी कला विभाग के मानद प्रोफेसर तथा संगोष्ठी समन्वयक श्री राकेश मंजुल कर रहे थे।  

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