सीओपी 24 : क्लाइमेट ट्रेंड्स ने कहा, भारत में असमानता के अंतर को बढ़ा देगा जलवायु परिवर्तन, गरीबों पर पड़ेगी ज्यादा मार

2017 की समस्त बाढ़ की घटनाओं की तुलना में अकेले 2018 की केरल की बाढ़ ने अधिक नुकसान पहुंचाया…...

सीओपी 24 : क्लाइमेट ट्रेंड्स ने कहा, भारत में असमानता के अंतर को बढ़ा देगा जलवायु परिवर्तन, गरीबों पर पड़ेगी ज्यादा मार

Climate Trends said, climate change will increase the difference in disparity in India 

1 . 2017 की समस्त बाढ़ की घटनाओं की तुलना में अकेले 2018 की केरल की बाढ़ ने अधिक नुकसान पहुंचाया…

2 . भारत में हालिया सूखा और बाढ़ के आर्थिक और सामाजिक परिणाम अधिक हैं। और इस प्रकार की चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों के बढ़ने का अनुमान है…

नई दिल्ली, 30 नवंबर 2018। आज "जलवायु परिवर्तन" पर पार्टियों के सम्मेलन का दूसरा दिन है, जिसे सीओपी 24 (COP24) के रूप में जाना जाता है। यह सम्मेलन पोलैंड के कैटोवाइस में हो रहा है।

कल भारत के पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने सीओपी 24 में भारत मंडप का उद्घाटन किया।

इस मौके पर दिल्ली स्थित जलवायु अनुसंधान कंपनी क्लाइमेट ट्रेंड्स ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम गरीबों को ज्यादा झेलने होते हैं और जलवायु परिवर्तन भारत में असमानता के अंतर को और बढ़ा देगा।

रिपोर्ट के अनुसार निम्न आय क्षेत्रों के लोगों की उच्च आय वाले क्षेत्रों में समकक्ष आबादी की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं से मरने की सात गुना संभावनाएं अधिक हैं और छह गुना उनके घायल होने अथवा विस्थापित होने की संभावना है।

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम में कमी की रिपोर्ट का हवाला देती है, जिसमें निम्न और उच्च आय वाले देशों से आर्थिक नुकसान की तुलना की गई है।

यह विश्लेषण हाल में जारी लांसेट काउंटडाउन के साथ आई है, जिसमें दिखाया गया है कि पिछले चार सालों में 200 पीसी भारतीय ग्रीष्म लहर से प्रभावित हुए और भारत पर बदलती जलवायु का सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन में वैश्विक तापमान को पहले ही पूर्व औद्योगिक स्तर से लगभग एक डिग्री बढ़ा दिया है। जब तक उत्सर्जन तेजी से कम नहीं हो जाता तापमान 2040 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2065 में दो डिग्री सेल्सियस 2100 में 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है, जिससे अगले 10 से 12 वर्षों में जलवायु परिवर्तन तेजी से होगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन दुनिया के गरीब लोगों के लिए एक दुष्चक्र रचने की धमकी दे रहा है। चूँकि आगामी गर्मी और अधिक लोगों को गरीबी की ओर धकेलेगी, जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी संवेदनशीलता को बढ़ाएगी।

हाल ही में प्रकाशित जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की विशेष 1.5 सी रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि असमान और कमजोर आबादी को खाद्य असुरक्षा, उच्च खाद्य कीमतें, आय घाटे, आजीवका के खोए हुए अवसर, प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव, और जनसंख्या विस्थापन द्वारा बुरी तरह प्रभावित करेगी।  

भारत में कुल आकस्मिक मौतों की एक चौथाई आकस्मिक मौतें प्राकृतिक आपदाओं के कारण

One fourth of the casualty deaths in India due to natural calamities

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट कहती है कि सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि तीव्र मौसम की घटनाओं के कारण भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5600 लोग अथवा पांच व्यक्ति प्रति मिलियन लोग काल कवलित हो जाते हैं। भारत में कुल आकस्मिक मौतों की एक चौथाई आकस्मिक मौतें प्राकृतिक आपदाओं के कारण होती हैं। यह संख्या कम अनुमानित होने की संभावना है क्योंकि सूखे से हुई मौतें इसमें शामिल नहीं हैं, उदाहरण के लिए 2015-16 के भारतीय सूखे से लगभग 330 मिलियन लोग प्रभावित हुए।

2017 अगस्त में भारी मानसून की बारिश से पूरे भारत-बांग्लादेश और नेपाल में भारी बाढ़ आई, जिसकी वजह से कम से कम 1200 मौतें हुईं। इस बाढ़ से उत्तर भारत के चार राज्य बुरी तरह प्रभावित हुए, जिससे 805183 घर क्षतिग्रस्त हुए और 18 मिलियन लोग प्रभावित हुए। एक वर्ष बाद 2018 के जुलाई अगस्त में भारी मानसूनी वर्षा के कारण केरल में भारी तबाही हुई, जो 1924 से दक्षिण राज्यों की अब तक की सबसे खराब बाढ़ थी। 88 दिनों में 2378 मिमी (2.4mm) वर्षा रिकॉर्ड की गई, जो सामान्य से चार गुना अधिक थी। केरल के बड़े हिस्से उजड़ गए।

अधिकृत सरकारी आंकड़ों के अनुसार 6 नवंबर 2018 को मरने वालों की संख्या 504 थी, 3.4 मिलियन लोग 12300 राहत शिविरों में विस्थापित किए गए और 23 मिलियन लोग इससे प्रभावित हुए।    

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2017 में भारत में बाढ़ या बारी वर्षा के कारण कुल नुकसान की कीमत 18279.63 करोड़ (2.5 बिलियन यूएस डॉलर) हुआ जिसमें फसलों, मकानों और सार्वजनिक उपयोगिताओं का हुआ नुकसान शामिल है। हालांकि 2018 की बाढ़ और भारी नुकसान का राष्ट्रीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, 2018 की केरल बाढ़ में अनुमानित नुकसान 20 हजार करोड़ (2.7 बिलियन यूएस डॉलर) का आंकड़ा पार कर गया है, जो 2017 में पूरे देश में बाढ़ और भारी वर्षा से हुए नुकसान से कहीं अधिक है।

राज्य में आर्थिक प्रभावों के एक आकलन में पाया गया कि केरल में 2018 की बाढ़ में पांच सबसे प्रभावित जिलों में 4.13 मिलियन कामकाजी लोग प्रभावित हुए। लगभग 3.3 मिलियन लोगों का रोजगार खतरे में पड़ा। व्यापक विनाश के परिणामस्वरूप पर्यटन क्षेत्र का 2019 का आर्थिक उभार सबसे कम रहा।

पर्यटन क्षेत्र के कर्मचारी अप्रत्यक्ष क्षति के प्रति संवेदनशील हैं, क्योंकि पर्यटन आकर्षण स्थल बाढ़ से नष्ट हो गए हैं और पर्यटक, प्रभावित क्षेत्रों में जाने से बच रहे हैं।

चरम मौसम जोखिमों का प्रभाव भी राज्यों पर असमान रूप से पड़ता है। कुछ राज्यों में जलवायु आपदाओं का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से असम, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में। यदि एक राज्य पर कई चरम मौसम घटनाओं की मार पड़ती है, तो यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकता है और अन्य राज्यों की तुलना में इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता को कम कर सकता है। इन आपदाओं के चलते चूंकि किसान अपनी जमीन छोड़ देते हैं, और व्यवसाय करने अन्य राज्यों में जाते हैं, इससे राज्य के भीतर गरीबी का खतरा बढ़ जाता है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में यदि वर्षों नहीं तो कम से कम महीनों लग सकते हैं। ये आपदाएं लोगों को गरीबी के गहरे चक्र में धकेल देती हैं। झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोग खासकर जोखिम में रहते हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए उनकी बहुत सीमित क्षमता होती है, और झोपड़ियों में न्यूनतम सुविधाएं होती हैं।

भारत गर्मी के मानसून पर काफी निर्भर है, जो वार्षिक वर्षा का लगभग 70% है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन मौसम के पैटर्न को बदलता है, भारत में पानी तक पहुंच एक अनिश्चित भविष्य का सामना करती है।

भारत में 600 मिलियन लोगों को पहले से ही पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के अनुसार, भारत के 54% कुओं के भूजल में गिरावट आई है, और 2020 के अंत तक 2120 शहरों में भूजल समाप्त होने की आशंका है, जिससे 100 मिलियन लोग प्रभावित होंगे।

भारत में हालिया सूखे और बाढ़ के आर्थिक और सामाजिक तौर पर दुष्प्रभाव बहुत ज्यादा हैं। और इस तरह की चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ने का अनुमान है। भविष्य में वैश्विक तापमान में और वृद्धि से ज्यादा प्रभाव से वंचित और कमजोर लोग ज्यादा प्रभावित होंगे। यह वंचित और कमजोर लोगों को खाद्य असुरक्षा, उच्च खाद्य कीमतों, आय घाटे, आजीविका के अवसरों की कमी, प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव, और जनसंख्या विस्थापन के माध्यम से प्रभावित करेगा। भारत में एक बड़ी कमजोर आबादी है जो खुद को विशेष रूप से विपत्ति का मारा हुआ पाती है।

"2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने" का प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण जलवायु  से पीड़ित दुनिया में पहुंचाना मुश्किल होगा। उत्सर्जन में कटौती करके जलवायु परिवर्तन को सीमित करना और अनुकूलन में निवेश करना भारत के लिए भारी लाभ लाएगा। जलवायु परिवर्तन से और आर्थिक नुकसान को कम करने का सीधा मतलब है -  कम भूख, स्वस्थ लोग, कम वायु प्रदूषण, अधिक आर्थिक विकास, अधिक नौकरियां और कम असमानता। और इस तरह अतिव्यापी भेद्यता वाले एक देश के लिए जलवायु शमन और गरीबी उन्मूलन को साथ-साथ करना जरूरी है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशिका आरती खोसला ने इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एक आपदा का रूप में इस वर्ष की केरल की बाढ़, जिसने 20 हजार करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई, ने जनता का ध्यान आकर्षित किया। सूखे से लेकर अतिरिक्त बारिश, और ग्रीष्म लहर जैसी चरम मौसम की घटनाएं अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हैं, जिस पर जनता और राजनेताओं को ध्यान देने की जरूरत है।

आरती खोसला ने कहा कि दुनिया के तमाम देश इस समय पोलैंड में जलवायु सम्मेलन में राजनीति पर बातचीत करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तब विज्ञान के प्रति ध्यान नहीं देना अपरिहार्य हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो, एक देश जो एक विश्व शक्ति के रूप में उभरा है, सभी व्यर्थ हो जाएगा।

आरती खोसला ने कहा कि विश्व मौसम संगठन के हाल ही में जारी आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पिछले चार वर्ष में दुनिया सबसे ज्यादा गर्म थी। इसी समय अवधि में 200pc से अधिक भारतीय ग्रीष्म लहर की चपेट में थे। दुनिया तापमान लक्ष्य को प्राप्त करने के ट्रैक पर प्रतीत नहीं होती है।

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