दामोदर खड़से के उपन्‍यास ‘खिड़कियाँ’ का लोकार्पण

हिंदी विश्‍वविद्यालय में आवासीय लेखक रहे हिंदी एवं मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. दामोदर खड़से के उपन्‍यास ‘खिड़कियाँ’ का लोकार्पण प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री डॉ.जितेंद्र सिंह ने किया

हस्तक्षेप डेस्क
Updated on : 2018-05-08 16:08:43

हिंदी विश्‍वविद्यालय में आवासीय लेखक रहते हुए लिखा था यह उपन्‍यास

वर्धा, 8 मई 2018: महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में आवासीय लेखक रहे हिंदी एवं मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. दामोदर खड़से के उपन्‍यास ‘खिड़कियाँ’ का लोकार्पण प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के करकमलों द्वारा नई दिल्‍ली में सोमवार, 7 मई को किया गया।

इस अवसर पर परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव डॉ. शेखर बसु, अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. के. शिवन, सांसद अजय मिश्रा, सांसद जगन्‍नाथ मिश्रा, साहित्‍यकार ऋता शुक्‍ला, रांची, डॉ. ललिताम्‍बा, बंगलोर, डॉ. टी. आर. भट्ट, धारवाड़, डॉ. आरसु, कालिकट, एवं डॉ. व्‍यंकटेश्‍वर, हैदराबाद प्रमुखता से उपस्थित थे।

विदित हो कि डॉ. दामोदर खड़से महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में वर्ष 2017 में जून से अगस्‍त तक आवासीय लेखक के रूप में वर्धा आए थे। अपने वर्धा निवास के दौरान उन्‍होंने ‘खिड़कियां’ नाम से उपन्‍यास लिखा। यह उपन्‍यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किया गया। इस उपन्‍यास में उन्‍होंने भीड़ में अकेले पड़े व्‍यक्ति की अवस्‍था को पाठकों के सामने रखा है। उनका कहना है कि ‘जब व्‍यक्ति अपनी इच्‍छा से अकेलापन चुनता है तब वह एकान्‍त पा जाता है। फिर इस एकान्‍त में अकेले होकर भी खुश रहता है। ऐसी स्थिति में वह स्‍वयं का तरोताज़ा, सकारात्‍मक और ऊर्जावान रखता है। इस उपन्‍यास का नायक अरुण प्रकाश ऐसा एकान्‍त हासिल करने में यशस्‍वी हो जाते है। वे ‘खिड़कियों’ से कई लोगों के जीवन को अनुभव करते हैं’।

दामोदर खड़से अनेक वर्षों से साहित्‍य सृजन की धारा में कार्यरत है। उनकी कईं कृतियां प्रकाशित हैं जिसमें अब वहां घोंसले हैं, सन्‍नाटें में रोशनी, तुम लिखों कविता, अतीत नहीं होती नदी, रात, नदी कभी नहीं सूखती, पेड़ को सब याद है, जीना चाहता है मेरा समय, लौटती आवाज़े आदि कविता संग्रह, भटकते कोलम्‍बस, आखिर वह एक नदी थी, जन्‍मान्‍तर गाथा, इस जंगल में, गौरैया को तो गुस्‍सा नहीं आता, सम्‍पूर्ण कहानियां, यादगार कहानियां, चुनी हुई कहानियां आदि कथासंग्रह, काला सूरज, भगदड़, बादल राग उपन्‍यास, जीवति सपनों का यात्री, एक सागर और संवादों के बीच यात्रा व भेंट वार्ता जैसी कृतियां शामिल हैं। उन्‍होंने राजभाषा विषयक दस पुस्‍तकें विभिन्‍न विश्‍वविद्यालयों के लिए लिखी हैं। उन्‍होंने मराठी से 21 कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया है तथा मराठी की विशिष्‍ट कहानियां, सूर्यबाला का सृजन संसार, समकालीन मराठी कथा और समलाकीन मराठी कविता का संपादन किया है।

उन्‍हें ‘बारोमास’ उपन्‍यास के लिए साहित्‍य अकादमी का अनुवाद पुरस्‍कार मिला है। उनकी रचनाओं का मराठी, अंग्रेजी, कन्‍नड़, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, राजस्‍थानी आदि भाषा में अनुवाद हुआ है। वे 2011 से 2015 के दौरान महाराष्‍ट्र राज्‍य हिंदी साहित्‍य अकादमी के कार्यकारी अध्‍यक्ष रहे हैं। यह जानकारी महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय की एक विज्ञप्ति में दी गई है।

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