नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

आइए आज आपको गुड़गाँव ले चलता हूं, और दीपक से मिलाता हूं जो कि ऑटो रिक्शा चलाकर अपना जीवनयापन करते हैं।...

अतिथि लेखक
नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

डॉ सैय्यद ज़ियाउल अबरार हुसैन

आइए आज आपको गुड़गाँव ले चलता हूं, और दीपक से मिलाता हूं जो कि ऑटो रिक्शा चलाकर अपना जीवनयापन करते हैं।

जी हाँ, उसी गुड़गाँव में, जो कुछ महीनों पहले इसलिए सुर्खियों में था क्योंकि वहां पर कुछ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुण्डों ने जुमा की नमाज़ पढ़ने वालों से मार पीट की थी और उन्हें नमाज़ पढ़ने से रोका था, इस पर सरकार का जो रवैया रहा वो एक अलग मुद्दा है। बहरहाल इस सारे घटनाक्रम का ये नतीजा निकला कि नमाज़ पढ़ने की जगहें पहले के मुक़ाबले आधे से भी कम रह गईं, और अगले कई हफ्तों तक हम नमाज़ के लिए अलग-2 जगहों पर भटकते रहे, और अंततः एक पार्क, जो कि औरों के मुक़ाबले सबसे करीब और बड़ा था, में जाना तय कर लिया और जुमा की नमाज़ वहीं पढ़नी शुरू कर दी।

सबसे क़रीब होने के बावजूद भी ये पार्क इतना दूर था कि वहां तक जाने के लिए ऑटो रिक्शा करना पड़ता था। ऐसे ही एक जुमा को जब हम नमाज़ के लिए निकले तो ऑफिस के गेट के बाहर दीपक अपने ऑटो के साथ खड़े हुए थे, हमने इनसे जाने के लिए बात की और चल दिए इनके गुलाबी सीट वाले ऑटो में बैठ कर।

पहुंचने के बाद ऑटो से उतरते वक्त मैंने बोला कि भाई देखो हम थोड़ी देर में आ जाएंगे अगर कोई नई सवारी ना मिले तो इंतज़ार कर लेना, हम वहीं वापस जाएंगे।

नमाज़ पढ़कर लौटने पर दीपक को अपना इंतज़ार करता हुआ पाया, बैठे और आराम से ऑफिस वापस। अगले जुमे को जब नमाज़ के बाहर निकले तो दूर से ही दीपक का गुलाबी ऑटो दिख गया, मगर पास जाने पर पाया कि ऑटो ख़ाली है, इधर उधर नज़रें घुमाने पर देखा कि पास की एक सीमेंट की बेंच पर दीपक आराम कर रहे हैं। पास जाकर पूछा तो फ़ौरन जाने के लिए तैयार, और वापसी भी वैसे ही।

फिर तो हर जुमा का ये मामूल बन गया है, मैं जाता हूं, दीपक खाना खाकर आराम कर रहे होते हैं, उनको उठाता हूं और आना जाना इनके गुलाबी ऑटो से होता है।

दीपक जैसे लोग इस बात की ज़िन्दा मिसाल हैं कि जब-2 नफ़रत के ज़हरीले नागों ने अपना फन उठाया है, मुहब्बत अपने छोटे ही सही पर मज़बूत क़दमों से उनको कुचलने के लिए खड़ी हो गई है और आगे भी होती रहेगी।

दीपक जैसे लोग ही सही मायनों में गंगा - जमुनी तहज़ीब के अलमबरदार हैं और हमारे मुल्क में आपसी भाईचारे को बढावा देने में अग्रसर हैं और एक सच्चे हिंदुस्तानी होने का फ़र्ज़ निभा रहे हैं। दीपक जैसे सभी लोगों को सलाम!!

जिगर साहब ने शायद दीपक जैसे लोगों के लिए ही कहा होगा

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे

(डॉ सैय्यद ज़ियाउल अबरार हुसैन एक फार्मेसी शोधकर्ता हैं जो कि वर्तमान में गुड़गांव में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं तथा सामाजिक विषयों में रुचि रखते हैं और लेख लिखते हैं।)

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