बुलेट ट्रेन के विरोध में मप्र, गुजरात के आदिवासियों का प्रदर्शन

आदिवासी, किसान, मच्छीमार तथा सभी आम भूमिपुत्रों के जीवन में अच्छे दिन आने की बजाय एक के बाद एक संकट मंडराते जा रहे ...

अतिथि लेखक

 

दयानंद कनकदंडे

बीती 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में तलासरी महाराष्ट्र में DMIC, बुलेट ट्रेन,वाढवण बंदरगाह के विरोध में प्रकृति व समाज संवर्धन परिषद का आयोजन किया गया था। यह आयोजन गुजरात एवं महाराष्ट्र के 22 संगठनों का संयुक्त मोर्चा भूमिपुत्र बचाव आंदोलन द्वारा किया गया था। भूमिसेना, आदिवासी एकता परिषद, खेडूत समाज गुजरात, शेतकरी संघर्ष समिति, पर्यावरण संवर्धन समिति, कष्टकरी संगठन, सगुणा संगठण,युवा भारत इसका हिस्सा है। परिषद के पहले महारैली की गयी जिसके कारण मुंबई अहमदाबाद हाइवे ढाई घंटे तक बंद रहा। परिषद में 50000 से भी अधिक संख्या में आदिवासी,किसान एवं मछुआरों ने शिरकत की।

सभा का प्रास्ताविक युवा भारत संगठन के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक शशी सोनवणे, स्वागत भाषण किसान सभा के कॉमरेड लहानु कोंब एवं अध्यक्षता वरीष्ठ आदिवासी नेता एवं इस पूरी समन्वय प्रक्रिया के अग्रणी काळूराम काका धोदडे द्वारा की गयी।

खेडूत समाज के अध्यक्ष जयेश पटेल, महासचिव सागर रबारी, पंजाब से आए किसान नेता सुखदेव सिंह, गुजरात के पूर्व सांसद अमरसिंह चौधरी, महिला नेत्री शोभा करांडे, कष्टकरी संगठन के नेता ब्रायन लोबो आदि वक्ताओ ने सभा को संबोधित किया।

सभा एवं महारॅली के द्वारा विनाशकारी प्रकल्पों को हटाने की मांग की गयी। इशारा दिया गया कि अगर इसे रोका नहीं गया तो मुंबई से दिल्ली तक करो या मरो संघर्ष किया जायेगा। देश में दिल्ली मुंबई इंडसस्ट्रियल कॉरिडॉर के अलावा और 17 कॉरिडॉर बनने की जानकारी सभा में दी गयी।

आदिवासी, किसान, मच्छीमार तथा सभी आम भूमिपुत्रों के जीवन में अच्छे दिन आने की बजाय एक के बाद एक संकट मंडराते जा रहे हैं। विकास के नाम पर बड़े सेठ-साहूकारों, पूंजीपतियों के फायदे के लिए हम सबको हाशिए पर फेंकनेवाले एवं पर्यावरण का विनाश करने वाले प्रकल्पों को लादा जा रहा है।

देशी-विदेशी पूंजीपतियों के फायदे के लिए सरकार 18 औद्योगिक कॉरिडॉर बनाने जा रही है। अकेले दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के निर्माण हेतु 4 लाख 36 हजार 486 स्क्वे. किलोमीटर अर्थात देश की कुल भूमि का 13.8 प्रतिशत, उसमें गुजरात 62%, महाराष्ट्र की 18 % भूमि इसके प्रभाव में आनेवाली है। हमारे देश की 17% जनसंख्या को यह प्रकल्प ध्वस्त कर देगा। इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान तक फैला आदिवासी क्षेत्र पूरी तरह से ध्वस्त होकर आदिवासी समूह हाशिए पर धकेल दिया जायेगा। पहले से ही प्रदूषण के शिकार दादरा नगर हवेली केंद्रशासित प्रदेश का संपूर्ण अस्तित्व ही इस प्रकल्प की बदौलत नष्ट हो जायेगा। इस औद्योगिक गलियारे के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिस्से के रूप में मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन,मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेस-वे,वाढवण बंदरगाह सागरी महामार्ग,समर्पित रेल माल यातायात मार्ग(DFC),MMRDA विकास प्रारूप,नागपूर-मुंबई समृद्धी महामार्ग भूमिपुत्रोपर लादे जा रहे हैं। इन सभी विनाशकारी प्रकल्पों के लिए केंद्र बनने जा रहा नवीनतम पालघर जिला अपना अस्तित्व ही खो देने की स्थिति में होगा एवं अपनी पहचान खो देगा।

MMMRDA विकास प्रारूप के वजह से मुंबई महानगर विस्तारित हो वसई-उत्तन तथा रायगड हरित क्षेत्र काँक्रीट के जंगल में तब्दील हो जायेगा। इन सबके के लिए पालघर,थाना जिले का सिंचाई के लिए आरक्षित पानी लुटाया जा रहा है। वाढवण बंदरगाह एवं सागरी महामार्ग मच्छीमार, किसानों की आजीविका पर कुठाराघात साबित होने जा रहे हैं। पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील वाढवण में जेएनपीटी से भी बडा बंदरगाह स्थापित होने जा रहा है। जंगलो को काट, पहाडों को तोड,समुंदर में भराव डाल बंदरगाह निर्माण हेतु 5 हजार एकड़ जमीन निर्माण का उद्देश्य है, इससे सारी समुंदर किनारा, खेतीबाडी, फल के बाग ध्वस्त होने वाले हैं।

इसी तरह गुजरात में नारगोल बंदरगाह के विकास एवं विस्तार के नाम पर सैंकडो एकड़ कृषिभूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इससे हजारों मच्छीमार एवं किसान परिवार ध्वस्त होने जा रहे हैं।

मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेस-वे के बहाने कृषि योग्य जमीन छीनकर किसान, खेतिहर मजदूर, भूमिपुत्रों को ध्वस्त करने का षड़यंत्र सरकार कर रही है। पालघर एवं थाना जिले के 44 गांव तथा गुजरात-दादरा नगर हवेली के 163 गावों की कृषिभूमि लेने का दांव खेला जा रहा है। आम रेल यात्रियों के लिए लोकल ट्रेन आदि को सुखदायी करने की प्राथमिकता को छोड 8 घंटे की रेल यात्रा को ढाई घंटे पर ले आने के नाम पर जनता का 1 लाख 10 हजार रुपया खर्चा कर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन को जनता पर लादा जा रहा है। इसकी कीमत आदिवासियों एवं पशु-पक्षियों को अपना जंगल खोकर देनी होगी।

आदिवासी समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओ के संवर्धन संवर्धन एवं आजीविका, नैसर्गिक संसाधनो के संरक्षण के लिए 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1993 को लिया गया है। 13 सितम्बर 2007 के दिन आदिवासी अधिकारों के घोषणापत्र को UNO की आमसभा में मंजूरी दी गयी। इस घोषणापत्र का उल्लंघन राजकर्ताओं द्वारा किया जा रहा है।

एक तरफ संविधान के द्वारा जीने के मूलभूत अधिकारों की गारंटी,पांचवी अनुसुची तथा स्वयं निर्णय के अधिकार को ध्यान में रख विशेष संरक्षण दिया गया है। दूसरी तरफ संघर्ष के द्वारा प्राप्त एवं हम लोगों द्वारा संवर्धित जमीन, जंगल तथा प्राणी को राजकर्ता जमात धनपतियों के लिए हमसे छीनकर संविधान को खुलेआम पैरों तले रौन्द रही है। सरकार का दावा है कि, यह सब देश के विकास के नाम पर किया जा रहा है। सवाल सीधा है कि मैं मुट्ठीभर लोगों के धंधों के फायदे के लिए करोड़ों लोगों को विस्थापित करने वाली नीतियों को विकास कहे या विनाश..?? और इसकी कीमत हम आम लोगों द्वारा ही क्यों चुकायी जानी चाहीये..??

सभा में आदिवासी संस्कृति की झलक साफ दीखती रही। ज्यादातर आदिवासी अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते, तारपा बजाते रैली में शरीक हुए। सभा समापन के बाद भी यही सिलसिला चलता रहा।

चलते-चलते बता दें कि महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री ने यह जानकारी दी है कि मुंबई से कोलकाता बुलेट ट्रेन का सर्वेक्षण कार्य चल रहा है।

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